Sunday, December 6, 2009

कुछ भी शाश्वत नही


शहर के बाहरी छोर पर बने कैफेटेरिया से, अपने दोस्त के साथ एक बेहद आत्मीय सम्बन्ध का औपचारिक समापन कर वो वापस लौट रहा था. दोनों ने वहीं मिलना तय किया था . एक एक कॉफ़ी और समापन की औपचारिक घोषणा. बड़ी विचित्र बात थी कि हाथ मिलाने की औपचारिकताओं से शुरू हुआ ये रिश्ता ऐसी ही औपचारिकताओं से ख़त्म भी हो गया.हाँ इन दो छोरों के बीच कभी बहुत कुछ था, सब कुछ था. तरल,पारदर्शी,स्वच्छ.पर कुछ समय पहले बीच का तरल विस्तार सूखने लग गया था और जल्द इस सम्बन्ध का जीवन-द्रव सूखे भुरभुरे बंजर में बाकी रह गया.

बहुत ज़रूरी था इस सच को स्वीकार करना और भार से हल्का होना.
'मैं तुम्हे मुक्त करता हूँ' दोनों ने जैसे एक दूसरे को कहा.
कॉफ़ी का आखिरी घूँट बड़ा था.दोनों के चेहरों पर हलकी मुस्कान उभरी. किसी ने नही कहा कि पिछला साझा वक्त हमेशा याद रहेगा पर उस मुस्कान में कृतज्ञता का भाव ज़रूर था.
'तुम जियो हमेशा क्योंकि मेरे लिए मरना नहीं है'. घिसी पिटी किंतु अमर पंक्तियाँ. कहने की ज़रूरत नहीं थी पर उस मौन में ऐसा ही कुछ ध्वनित हुआ. दोनों कॉफ़ी के दौरान एक जैसा बोल रहे थे, मौन में भी.असल में ये स्वीकारोक्तियां थी. कैफेटेरिया से बाहर बाइक पर बैठते ही उसे तेज़ ठण्ड का अहसास हुआ।दिसंबर की कोई
रात थी,और इन दिनों में यहाँ ठण्ड के तेवर कड़क ही रहते थे.पिछले दो दिन से पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ गिर रही थी और ठण्ड के झपट्टे यहाँ अच्छी तरह महसूस हो रहे थे। बाइक चलाते समय उसे ठण्ड का अहसास और तेज़ होने लगा .वो शहर की तरफ जा रहा था और उसे शहर की रौशनी दूरस्थ आभा की तरह भी दिख रही थी पर फासला खगोलीय दूरियों में तय होता लग रहा था. पूरा रास्ता अँधेरे से एकाकार था.ऊपर आसमान भी गहरा काला था जो ठण्ड में और गाढ़ा हो गया था.बाइक अब ब्रह्माण्ड के सर्द अवकाश में चल रही थी.ठण्ड उसकी आत्मा को परम शून्य ताप में धकेल रही थी. एक रिश्ते की गर्मी ख़त्म होने से इसका कोई सम्बन्ध था या नहीं ये सोचने का फिलहाल उसके पास वक्त नहीं था.

शहर की रौशनी अब कुछ और नज़दीक रही थी। उसकी जीभपर कॉफ़ी का खारापन अभी भी मौजूद था। और ये शहर में दाखिल होते ही जाता रहेगा ये भी उसे मालूम था.एक जगह बाइक रोक कर उसने कांपते हाथों से सिगरेट सुलगाई और आसमान की ओर देखा। सितारे ब्रह्मांडीय ठण्ड में मुर्दा रौशनी फेंक रहे थे।इनमें से कुछेक करोड़-दो करोड़ साल और गर्म रहने की कोशिश करेंगे फिर दम तोड़ देंगे।एक रिश्ता भी इसी तरह अपनी चमक खोकर उसके आकाश से विदा हो चुका था।

वो फिर से बाइक पर था।ठण्ड उसे चीर कर गुज़रती रही.वो एक गति से शहर की ओर भाग रहा था.आखिर एकजगह उसे लगाकि वो रिश्ते के साथ ठण्ड को भी पीछे छोड़ता जा रहा था।दिन के उजाले में जो किला शहर के हर कोने से एक अकड़,ऐंठ के साथ दिखता था इस समय बिजली की चिमनियों में उसकी चमकती हुई पीलाभ बुर्जों का दिखना उसे सुकून दे गया। ये संकेत था कि वो सच में शहर की ओर ही जा रहा था. अब तक तो जैसे वो किसी निर्जीव आकाश गंगा की धूल उड़ाता अलक्ष्य ही दौड़ रहा था.

शहर के चौराहे पर बहुत ऊँचाई से रौशनी फेंकता हाई मास्ट जो दिन में जासूसी करता लगता था अब उसके स्वागत में खड़ा था.घर पहुँचने की उसे जल्दी नहीं थी. आखिर उसे वहीं जाना था पर इससे पहले वो शहर की आंच को सोख लेना चाहता था.परिचित चाय वाले को देख कर उसने बाइक वहीं खड़ी कर दी.
photo courtesy- sarabbit

24 comments:

  1. फ़ासले जो दरमियाँ होते हैं उनको नाप पाना असंभव सा ही है. हाथ को थामे हुए भी कई बार कुछ अहसासों का संचरण न हो पाना हो सकता है इस दूरी के बढ़ने टोकन हों. बोझ जो आत्मा पर पड़ा होता है वह उतर जाये तो उपजा हुआ खालीपन अधिकतर भयावह लगने लगता है. इस राहत को बर्दाश्त करना भी आसान नहीं होता... बहुत बढ़िया लिखा है. मेरे मन के भीतर भी चहलकदमी लायक जगह बनी.

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  2. एक ब्लॉग पर कुछ साहित्य विरोधियों के प्रलाप पढ़ कर यहाँ आया हूँ।
    राहत मिली। आज कल की जिन्दगी से जुड़ाव सुकूँ देता है - साहित्य सा।
    मन करता है - फीका सा हँस दूँ!
    हँस लूँ?
    मेरे दोस्त, हम भी कभी बैठेंगे कॉफी हाउस की टेबल पर दुकेले .. हमारे परिवार अपने अपने घर डिनर और होमवर्क में व्यस्त होंगे...
    मैं फिर छोटा सा हँसा हूँ।

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  3. हम इस छोर पे आ गए थे
    या तुम उस छोर पे छूट गए थे
    इससे क्या मतलब है

    सच तो ये है कि बीच में नदी अब भी बहती है

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  4. बहुत बढ़िया लगी यह पोस्ट.........

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  5. अहसासों की बेहतरीन बानगी!

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  6. अच्छी अभिव्यक्ति ।

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  7. एक सुंदर रिश्ते का सुंदर समापन होते हुए भी शुन्यता और दर्द पीछा नहीं छोड़ते...

    बेहद नाज़ुक और बेहतरीन पोस्ट !

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  8. बहुत सुन्दर! मैं तुम्हे मुक्त करता हूँ पढ़ तो लिया, पर पोस्ट का स्वाद तो मन में घूम रहा है!

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  9. सम्बंधों की आहुति से उपजे पल, कैसे सहज होंगे क्षण भर में ? बस ऐसी ही लगी आपकी ये रचना. कसावट है, फीलिंग्स है, डिटेल्स है और एक ऐसी अनुभूति है जो सच सा अहसास कराती है. मुझे लगता है जैसे आप खुद चले आ रहे हैं बाईक पर... यही इस रचना की सार्थकता है.

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  10. undoubtedly matchless and nice story...n thanx a lot for ur comments n support...plzz do visit n post ur comments for incouraging me...

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  11. कहानी तो जैसे बन गयी है बस । अनुभूतियाँ है दृश्यों के साथ, समय की निरन्तरता में ।

    ऐसे क्षणॊं में बस मौन ही बोलता है । कहे कौन ? जबान बड़ी दरिद्र होती है - गहरे क्षणों में उसे ठहर जाना आता है ।

    कहानी की फीलिंग्स जबर्दस्त हैं । आभार ।

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  12. कल रात ही पढ़ ली थी। लेकिन उस समय कुछ लिखना मुनासिब न लगा...पूरी रात देहरादून के एक गैरेज में खड़ी अपनी बाइक को मिस करता रहा। चोट लगने के इस ढ़ाई महीने बाद एक विचित्र सी बेचैनी जागी कि मैं अपना बुलेट चलाते समय बाँयी हैंडल ठीक से संभाल पाऊँगा या नहीं..?:-)

    खैर, अभी इस पोस्ट को फिर से पढ़ा अपनी रात वाली बेचैनी को परे रख कर। कुछ भी तो शाश्वत नहीं। सच। कहानी-सी कोई कहानी...स्केच-सा कोई स्केच। जो भी था{है}, बड़ा अपना-सा लगा ये आपका लिखा हुआ। शायद ऐसे ही किसी रिश्ते की समाप्ति की याद...शायद ऐसी ही ठंढ़ में एक बाइक-राइड की याद....शायद ऐसे ही दूर शहर की टिमटिमाहट नजदीक आती हुई....वो क्या कहते हैं देजा वू...हाँ, कुछ वैसा ही।

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  13. संजय
    रचना लेखक को जितना सुकून देती है और रिलैक्स करती है , पाठक को उतना ही बेचैन करती है .
    रिश्तों में जब बीच का तरल विस्तार सूखने लग जाये तो आत्मीय सम्बन्ध भी निहायत औपचारिक हो जाते हैं .ऐसे संबंधों के भार को ढोना मृत संबंधों की लाश को कंधे पर डाले पल पल जीना और पल पल मरना होता है . इनसे मुक्त होना जीवन के लिए जरूरी है .मगर क्या तब गुजरा वक्त लौट कर नहीं आता ?क्या सचमुच मुक्ति संभव है ? क्या वे ' बेहद आत्मीय सम्बन्ध 'सचमुच आत्मीय थे ?जैसे कई प्रशन खड़े करती है कहानी .

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  14. एक ग़ज़ल याद आ गई--

    फासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था
    सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था


    the longest journey is the journey within thyself. रिश्ते शुरुआत में एक खास रूमानियत रखते हैं.. लेकिन बहुत शाइस्ता रिश्ते भी आँच लगे तो टूट जाते हैं.. ऐसे में इन रिस्तों को बे-वजह ढोते रहना रूमानी भले ही लगे, लेकिन प्रैक्टिकल नहीं होता। अगर तस्वीर टूट जाये तो उसे जोड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिये। क्योंकि जुड़ भी जाये, तो किर्चें बची रह जाती हैं। हर बार हाथ फेरने पर ज़ख़्म बनने का पूरा मौका रहता है। शायद कोई सही कह गया है-

    जिस ’फ़साने को अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
    उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना ही अच्छा..

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  15. मैं यहां आया था...


    ..... बस इतना ही

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  16. aadami chaahata to nahin hai, lekin sach ye jaroor hai ki pata nahin kyon, ek samay ke baad rishte apani chamak kho hi dete hain. achchhi lagi aapaki ye post.

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  17. बात कब हुई हमारे बीच ?

    तुम अपनी एक बात दुहराते रहे
    मैं अपनी एक बात रटता रहा
    तुम अपने किनारे पहुँच गए, मैं अपने ।

    किसी ने किसी को सुना ही नहीं
    बात कब हुई ?

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  18. सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है जो प्रशंग्सनीय है! बधाई!

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  19. देर से आने के लिए मुआफी संजय ....आप मेरे पसंदीदा लोगो में से एक हो ....जिनके लिखे में प्रत्यक्ष ओर परोक्ष बहुत कुछ होता है .....आज मन खिन्न है इसलिए चुन कर जाते वक़्त दो ही लोगो को पढ़ा .....सागर को ओर आपको.......मेरे पास एक मोटर साइकिल है यामहा....आगे कुछ नहीं कहूँगा.....अभी इस रचना को साथ लिए जा रहा हूँ ....

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  20. संजय,
    आपकी कहानी की बुनावट खूबसूरत है.सार्थकता भी है.रिश्तो के मायने समाप्त हो जाने के अहसास की सहज अभिव्यक्ति भी है.
    ''औपचारिकताओं से शुरू हुआ ये रिश्ता ऐसी ही औपचारिकताओं से ख़त्म भी हो गया.''
    ''मैं तुम्हे मुक्त करता हूँ' दोनों ने जैसे एक दूसरे को कहा.
    कॉफ़ी का आखिरी घूँट बड़ा था.दोनों के चेहरों पर हलकी मुस्कान उभरी. किसी ने नही कहा कि पिछला साझा वक्त हमेशा याद रहेगा पर उस मुस्कान में कृतज्ञता का भाव ज़रूर था.''
    ''तुम जियो हमेशा क्योंकि मेरे लिए मरना नहीं है''
    ''अब ब्रह्माण्ड के सर्द अवकाश में चल रही थी.ठण्ड उसकी आत्मा को परम शून्य ताप में धकेल रही थी. एक रिश्ते की गर्मी ख़त्म होने से इसका कोई सम्बन्ध था या नहीं ये सोचने का फिलहाल उसके पास वक्त नहीं था.''
    कहानी की खूबसूरती इसके शब्द बयान कर रहे है.
    हाँ,
    फिर भी यह कहानी अपनी पूर्णता को तलाश करती सी लगी.यह अपने आप में कहानी न लगकर उसका एक अंश लग रही थी.यह कमी थोड़ी सी मुझे महसूस हुई..हालाँकि इससे इसकी उद्धेश्य परकता प्रभावित नहीं हुई है...

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  21. कहानीकार कितने जटिल होते हैं... कैसी गहरी नज़र रखते हैं... और क्या क्या देखकर कह देते हैं... अद्भुत...

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  22. आपकी कहानी पढ़कर एक पुरानी पंक्ति फिर से कान में गूँज गयी, "हमारी दोस्ती में अब वह गर्मी क्यों नहीं रही?"

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  23. This comment has been removed by the author.

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  24. बहुत खारापन है कैफेटेरिया की काफी में. मोटरसाइकिल पर खुदको देख रहा हूँ.

    रिगार्ड्स,
    मनोज खत्री

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