Thursday, November 27, 2014

कमरा

बड़ा होने पर तो उसे रोकने वाला कोई नहीं था पर बड़ा होने तक उसे उस कमरे में कभी जाने नहीं दिया गया.वो घर का सबसे पीछे का कमरा था.वो इसलिए घर का सबसे पुराना कमरा भी था.उसे उस घर में हमेशा वो कमरा ही दिखाई देता.घर में बार बार वो चलकर उस कमरे की तरफ बढ़ जाता.और उसके छोटे से दरवाज़े से अन्दर झाँकने की कोशिश करता.कमरे में अँधेरा ही होता.कुछ देर वो वहीं ख़ड़ा रहता ताकि उसकी आँखें अँधेरे की अभ्यस्त हो सकें और उसे कुछ दिखाई दे. कुछ देर बाद उसे कमरे की लाल छत दिखती.वो छत इतनी नीचे थी कि अगर कोई वयस्क उस कमरे में जाता तो उसे झुक कर ही चीज़ें तलाशनी पड़तीं.चीज़ें उस कमरे में बहुत थीं.कमरा घर में सबसे पुराना था.वो घर से भी पुराना था.वही एक तरह से घर था.बाकी सब कुछ जैसे उसी का विस्तार. एक पुराना ताला दरवाज़े की कुण्डी के साथ ही लटका रहता ताकि कमरे को काम ख़त्म होते ही बंद किया जा सके.पर दरवाज़ा दिन में खुला ही रहता क्योंकि घर में रह रहे लोग उसके भीतर बाहर आते जाते रहते.उस कमरे से सामान कम ही बाहर आता था.ज़्यादातर सामान उसके भीतर ही जाता रहता.पर वो सिर्फ स्टोर नहीं था.एक तरह से संग्रहालय था.चीज़ों से भरा एक अव्यवस्थित संग्रहालय.सिर्फ चीज़ें ही क्यों उस कमरे में कई दिन,वार, तारीखें भी जमा थीं.समय का कभी हासिल न किया जा सकने वाला हिस्सा भी किसी खराब टेबल घडी के रूप में अन्दर कहीं ठुंसा पड़ा था.पर वो कमरा किसके लिए ये सब इकठ्ठा करता था?पिछली सात पुश्तों के लोगों को भी उसने अस्थियों के रूप में अपने भीतर जमा कर रखा था.मरने के बाद लोग अपनी हड्डियों में फॉस्फोरस की तरह यहीं किसी टांड पर कुछ अरसा चमकते रहते,फिर बुझ जाते.और घर के चले गए लोग सिर्फ रेशम की पोटली के रूप में कमरे में रह जाते.हथेली भर रेशम में सिमटे यही लोग अपने जीवन काल में कमरे के फर्श पर पांवों के निशान भी जमा कर जाते थे.कमरे के ताप में उन पद-छापों की कितनी ऊष्मा शामिल थी,कहा नहीं जा सकता.

उसे शुरू से ही इस कमरे में जाने से मना किया हुआ था.वो अन्दर जाना चाहता था पर एक डर उसके मन में पहले से ही घर किया हुआ था.असल में कमरे में एक छोटा सा तहखाना भी था.उसकी पहली ज़िद पर घर के लोगों ने उसे बताया कि तहखाने में एक जानवर रहता है.और वो जानवर कभी भी आकर उस अँधेरे कमरे के किसी कोने में बैठ जाता था.अगर उस कमरे में कोई बच्चा चला जाय तो हो सकता था कि वो जानवर उसे खा जाता.

ये कारण बहुत बड़ा था.उसने अपने बड़ा होने तक कभी उस कमरे के भीतर जाने की कोशिश ही नहीं की.पर कमरा उसे हमेशा आकर्षित करता रहता था.घर में लोग इधर उधर चलते फिरते रहते पर वो कमरे के छोटे दरवाज़े के पास बैठा रहता और उसकी आँखें टकटकी लगाए अन्दर के अँधेरे को भेदने की कोशिश करती रहतीं.अन्दर सूचीभेद्य अंधकार था.कई बार उसे लगता कमरे के अन्दर से एक जोड़ी आँखें उसे देख रही है.वो डरकर तब वहां से चला जाता.पर कई बार हिम्मत करके वो अपनी विस्फारित आँखों से सिर्फ देखता रहता.तब फिर कुछ देर बाद कमरे की लाल छत उसे दिखने लगती.उसे घूरती वे आँखें भी तब ग़ायब हो जातीं.असल में वो उस जानवर को देखने की जिद में ये हिम्मत जुटा पाता था कि कभी तो ऐसा होगा कि वो तहखाने से उस कमरे में टहल करने आया हो और उसे वो देख ले.उसने मन ही मन संभावनाएं जता रखीं थीं कि वो जानवर क्या हो सकता था.उसकी सोच थी कि वो शायद घड़ियाल हो सकता है क्योंकि कुत्ता अगर होता तो उसके गुर्राने की आवाज़ भी ज़रूर कभी न कभी सुनाई देती.

वो कमरा किम्वदंतियों से भरा था.क्या कमरे में वाकई ठोस छूने लायक चीज़ें भी थीं? या कि सिर्फ किस्से और कहानियों से ही कमरा भरा था,अटा था?या पुरानी सारी चीज़ें किम्वदंतियों में बदल गयीं थी?तब क्या कमरे में रेशम की पोटलियों में बैठे लोग भी किम्वदंतियां हो गए थे?उनकी अस्थियों ने अपना भार छोड़ दिया था और वे रेशम हो गए थे.

अपने बड़ा होने पर भी कभी कभी वो इस तरह से सोचा करता था.  
                                 
                                         

 (फोटो गूगल करके,आभार सहित)

8 comments:

  1. ऐसे कमरे कई बार मन के अंदर भी होते हैं ना? चोर कमरे...जिनमें झांकने में डर लगे कि अंदर जाने कितनी तकलीफें हैं...कैसी यादें हैं जो खा सकती हैं...डर ये भी तो लगता है कि कमरे में गये और किसी ने सांकल लगा दी तो? कितने रेशम हुये लोग होते हैं...कितनी कहानियाँ, कैसे सफ्हे, कैसी तो टूटी कलम, दवात रहती है।

    इस कमरे को पढ़ते हुये इसकी तलाश में कहीं चले जाने को जी चाहता है...रेगिस्तान की स्मृति में मन में एक रेगिस्तान बसता गया है...वहाँ ऐसा ही कमरा दिखता है। तस्वीर बेहतरीन लगायी है आपने। लगता है कि वाकई ऐसा ही होता होगा वह कमरा।

    क्या क्या न सकेरते चलते हैं हम जीवन भर...जबकि रह जाना है बस मुठ्ठी भर रेशम।

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    1. खूबसूरत है ये पूजा जी।काश ये पोस्ट का हिस्सा होता और फिर उस सब पर कुछ और लिखतीं आप। पर फिर शायद उसे भी पोस्ट में शामिल किये जा सकने का लालच बना रहता।

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    2. "फिर वहीं लौट के जाना होगा,
      यार ने कैसी रिहाई दी है"

      https://www.facebook.com/upadhyay.puja/posts/804123419623935

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  2. कमरे के इस बेहतरीन शब्दचित्र को देखते हुये आज मेरे लफ़्ज़ चुक गये से लगते हैं, संजय भाई! उधार ले रहा हूँ अल्फ़ाज़ चचा गुलज़ार के और कोशिश कर रहा हूँ कहने की अपने दिल की बात. पता नहीं कहाँ तक एक्सप्रेस कर पाता हूँ अपने दिल की बात:
    खिड़कियाँ खोलके कुछ चेहरे मुझे देखते हैं,
    और सुनते हैं जो मैं सोचता हूँ
    एक, मिट्टी का घर है
    इक गली है जो फ़कत घूमती ही रहती है
    शहर है कोई, मेरे सर में बसा है शायद!!

    और उस बन्द कमरे के बाहर लगे बिजली के खम्बे (आपने ही दिखाया था वो नज़ारा) को देख
    कर

    वो खम्बा अब भी वहीं खड़ा है
    फ़तूर है यह, मगर मैं खम्बे के पास जाकर
    नज़र बचाकर मोहल्ले वालों की
    पूछ लेता हूँ आज भी ये -
    वो मेरे जाने के बाद भी, आई तो नहीं थी?
    वो आई थी क्या??

    आज उधार के अल्फ़ाज़ के लिये मुआफ़ी!!

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  3. हमारा वर्तमान अपने पुरखों का देखा अनदेखा सपना ही तो है ।ठीक वैसा तो नहीं जैसा उन्होंने देखा होगा, या जैसा वे चाहकर भी नहीं देख पाए,लेकिन कुछ देखे कुछ अनदेखे सपने ही तो हमारा जीवन बनते हैं/बनाते हैं । जितना भविष्य आशान्वित या आशंकित करता है, अतीत उतना नहीं करता ।जो तय हो गया,जो बीत गया उसकी ताक़त का पता चल गया ,उसकी कमज़ोरी भी सामने आ गयी ।लेकिन दुनिया की रीति-नीति से उस पर भी रहस्य का एक झीना पर्दा उग आता है और हम उसके पार झाँककर देखना चाहते हैं कि गुज़रा हुआ वक़्त जो छोड़कर गया है वह हमारे वर्तमान को किस मोड़ पर ले जाएगा और भविष्य को क्या दिशा देगा । ...कब कुत्तों की जगह घड़ियाल धमक आए और कब हमारी चेतना का कमरा धसक पड़े ...कब पुरखों के पुरुषार्थ की रेशमी पोटलियाँ लुढ़कती हुई तहखाने में जा गिरे...कब हम पर उन पोटलियों को तहखाने में से ढूंढकर लाने का दायित्व आ जाए ।ऐसी ही अनेक संभावनाएं और डर जीवन के आर -पार खिंचे हुए रहते हैं । उम्मीद ही रखें कि हमें उन अँधेरे बंद कमरों में आने-जाने की छूट और अवकाश मिलेगा, ताकि हम अपने पुरखों की हड्डियों में दफ़्न जीवनकणों को अगले जीवन का दान दे सकें।

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    1. शुक्रिया डॉ. परिहार साहब।

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