Saturday, October 28, 2017

लोहे का फ़ाटक


वो हाथ में थैला लिए क़स्बे की एक बड़ी किराणा शॉप की ओर बढे जा रहा था. उसके घर से ये कोई एक किलोमीटर के फासले पर थी. रास्ते में भीड़ भाड़ या ट्रैफिक की कोई समस्या नहीं थी. उसे पता था थोड़ा समय लगना था इसलिए वो अपनी धुन में चला जा रहा था. ये शाम के झुटपुटे का समय था चीज़ें वैसी नहीं दिख रहीं थीं जैसी वे खिली धूप के सम्पूर्ण आलोक में दिखा करतीं है. दिन में बाज़ार जाते वक्त वो इस क़स्बे में ख़ूब गर्दन घुमा घुमा कर दूर तक देखा करता है. शर्तिया अपनी लैंडस्केप पेंटिंग्स में ये क़स्बा बहुत खूबसूरत दिखाई  देता होगा. एक तरह ऊंचे पहाड़, बबूल की कंटीली हरीतिमा, रेतीला विस्तार और मिट्टी की दीवारों से घिरा तालाब. गहराती शाम में क़स्बा उसे धुंए में लिपटा लग रहा  था इसलिए दूरस्थ दृश्यों के बजाय उसका ध्यान सिर्फ अपने आसपास ही था. आसपास भी क्या उसकी आँखें सिर्फ उसके चलते हुए पैरों को ही देख रही थी. उसे लगा सिर्फ एक जोड़ी पैर ही चले जा रहे थे.  कुछ कुछ चमकते हुए.वो कुछ और दिलचस्पी से अपने गतिमान पैर देखने लग गया. उसे उनमें गंतव्य तक पहुँचने की बैचैनी भी दिख रही थी. चलते हुए पैरों के बराबर एक साया भी साथ का साथ चल रहा था. उसका अपना साया. वो अब अपने ही साए को भी चलते हुए देखे जा रहा था. वो अपने दिमाग से चुहल करता सोच रहा था कि अपनी ही परछाईं क्या होती है! एक इंसानी आकृति. जिसका कोई अपना व्यक्तित्व नहीं होता. भावहीन. कोई ख़ास चेहरा नहीं. मूक. खामोश.  तभी उसे लगा एक और साया भी ठीक बराबर चला जा रहा है. उसे कुछ कुछ अंदाज़ा था इसलिए चौंकने की ज़रुरत नहीं थी. उसका दिमाग अपनी चुहल से हट कर उस पर सोचने लग गया जो इन दिनों उसके साथ हो रहा था. एक लड़की जिसे वो जानता था आजकल ज्यादा नज़र आने लग गई थी. एक लड़की थी जो उसके आस पास ही रहती थी. एक लड़की जो उसके और दूसरे लड़कों के साथ तो नहीं पर नज़र आने की दूरी पर अपनी सहेलियों के साथ ही खेला करती थी.

उसे पता था ये बराबर चलती परछाईं पदम ही हो सकती है. घर से बाहर निकलते ही इन दिनों  शायद ही ऐसा हुआ हो कि पदम उसे आसपास न दिख जाए. वैसे वो उसके घर के बिलकुल पास ही रहती थी, पर उसका मन उसकी उपस्थिति से अनजान रहता था. पर कुछेक दिनों से न जाने ऐसा क्या था कि वो उसके दिन के परदे पर कई बार अलग अलग जगहों पर अपने उपस्थिति बिंदु अंकित कर जाती थी.

एक सामानांतर चलते साए का संभावित नाम जानते हुए  भी तस्दीक के लिए उसने  तुरंत मुड़ कर देखा. पर ये कोई और था. उसने एक गहरी सांस ली.

उसके पिता सरकारी कर्मचारी थे और उन्हें रहने के लिए दफ्तर की तरफ से एक मकान इस  सरकारी कॉलौनी में मिला हुआ था. कॉलोनी में घर पुराने, ढालू छतों वाले घर थे. संख्या में वे ज्यादा नहीं थे. दफ्तर भी उसी कॉलोनी में बीचों बीच था जो एक विशाल पथरीले जानवर की तरह पसरा हुआ था. ये जाने कौनसा सरकारी महकमा था जहां इतने कम लोग काम करते थे. हालांकि कुछ मुलाजिम कॉलोनी से बाहर अपने खुद के घरों में भी रहते थे. घरों से बाहर किसी तरह की सड़कें और गार्डन नहीं. बस कच्चे रास्ते, रेत और आक, नीम, बबूल और बेशुमार खाली जगहें. यानी थोड़े से घर, एक दफ्तर और पेड़ झाड़ियों से भरा खालीपन. एक तारबंदी का एक विशाल घेरा उस कॉलोनी की सीमा तय करता था. उस तारबंदी के बाहर पूरब की तरफ रेतीला मैदान था जहां हर छह महीने में फौजियों के कैंप लगते थे. ये इलाका अंतर्राष्ट्रीय बार्डर के नज़दीक था. जब फौजी कैंप नहीं करते थे तो घुमंतू जातियों के लोग अपने गधों समेत वहां डेरा डाल देते थे. कुछ दुबले पर फुर्तीले कुत्ते भी उनके साथ होते थे. उसके अलावा बाहर ज़्यादातर बियाबान था.

कॉलोनी के बाहर पूरब की तारबंदी वाले इस हिस्से में उसे जाने में इन दिनों थोडा डर भी लगने लगा था. असल में उसने पिछले दिनों एक घुमंतू  को फेंस से एक बकरे को बांधते देखा था. वो समझ पाता उससे पहले ही तलवार के त्वरित प्रहार से बकरे की गर्दन धड़ से अलग होकर फेंस से झूल गयी थी. उसने देखा थोड़ी दूर से ही था ये सब, पर उसे डर लगने लग गया. रक्त का लाल रंग और उसका वेग बहुत अलग था. इससे पहले उसने ऐसा कभी देखा नहीं था. वो वहां से रवाना होता उससे पहले ही आक की झाड़ी में एक सरसराहट हुई. और उसकी आँखों के सामने पदम थी. उसके चेहरे पर किलोल के भाव थे. आँखों में शरारत साफ़ पढ़ी जा सकती थी जैसे ये सब उसने ही स्टेज किया हो.
“त..तुमने देखा अभी अभी…” वो सिर्फ़ इतना ही बोल पाया और पदम से उसके बेहद कम और दुर्लभ संवादों में से ये भी एक था.
उसके चेहरे पर खौफ देखकर तुरंत वो गंभीर सी हो गयी. खेल और शरारत उसके चेहरे से जाते रहे. वो इस तरह उसके पास आ गई जैसे वो उससे उम्र में बहुत छोटा हो. हकीकत में जबकि वो उससे कुछ बड़ा ही था. पदम् के पास आने से उसका डर जाने लगा. पहले तो उसे लगा उसे खौफ में उसने पकड़ लिया है और ये बात वो बाकी लड़कों को बताकर उसका मजाक बनाने वाली है. पर उसके चेहरे पर संजीदगी ने ये दिलासा कि वो ऐसा कुछ नहीं करेगी बल्कि फ़िलहाल उसे इस दहशत से बाहर निकलेगी. ज़ाहिर बात थी कि पदम के लिए ये कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी. वो सुन चुका था कि खास मौकों से पहले पदम के पिता नारायण जी क्वार्टर के पिछवाड़े में बकरा बाँध आते थे. नारायण जी इसी दफ्तर में ड्राईवर थे जिसमें काम करने वाले लोग इस तारबंदी वाली कौलोनी में रहते थे. वो लम्बी मूंछो वाले थे और उनका चेहरा निर्भाव था. वो गुस्से में है या उनका मूड ठीक है ये कहना मुश्किल था. कॉलोनी के बच्चे जब खेल रहे होते तब वो कई बार बेवजह ही उन पर चिल्लाने भी लग जाते. और कई बार उनके घर में गेंद जाने पर जब किसी कि हिम्मत उनके घर में जाने की नहीं होती थे, वे गेंद के साथ बाहर आकर बच्चों के साथ खेलने भी लग जाते.
ये कॉलोनी एक उनींदे क़स्बे का हिस्सा थी पर उसकी मुख्य बस्ती से थोड़ी बाहर की तरफ थी.क़स्बा सोता जल्दी था और देर तक सोता रहता था.पाकिस्तान से सटे बॉर्डर के पास स्थित होने से इस क़स्बे में कई हिन्दू शरणार्थी विभाजन के बाद अलग अलग लहरों में यहाँ आकर बस गए थे.उनका अपनी ज़मीन  से निष्क्रमण पास स्थित किसी प्राचीन देवभूमि पर बसने के लिए नहीं था जहां उनके पूर्वजों को मोक्ष मिल सके बल्कि वे बेहद तकलीफ में थे और अपनी जड़ों से उखाड़  लिए गए थे और कहीं भी आसरा और दो वक्त की रोटी तलाश करते यहाँ आ गए थे.वे अपने बच्चोँ के भविष्य को अच्छा देखना चाहते थे इसलिए यहाँ आते ही सम्मानजनक रोज़गार की जुगत में लग गए. उनका जीवत और जज्बा अदभुत था.  

        कस्बे में एक तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ थे तो दूसरी तरफ रेत के टीलों का दूर तक फैला विस्तार था. रेत के विस्तार में कई प्रेम कथाएँ थीं तो पहाड़ में पौराणिक चरित्रों के किस्से गूंजते थे. पांडवों का अज्ञातवास, भीम की भुजाओं में तुलती शिलाएं, अर्जुन के बाण से बना कूप. और न जाने क्या क्या.पहाड़ों में एक प्राचीन तालाब और उसमे पड़ा हरा पानी कुछ कुछ जादुई लगता था.
उसका अपना घर यहाँ से कोई सौ पचास किलोमीटर की दूरी पर एक शहर में था जहा वो छुट्टियों में घरवालों के साथ जाया करता था.वैसे होश सँभालने से लेकर अब तक उसने अपने को इस कसबे में ही पाया है और शहर में उसका घर असल में उसके पिता और उनके पिता और फिर उनके पिता का था. उसका घर इस सरकारी कॉलोनी का घर ही था. लेकिन क्या असल था और क्या काल्पनिक कहना मुश्किल था. उसे इस कॉलोनी में रहना सपने सा लगता था. जहां मन की, मर्जी की की जा सकती थी या उसके बारे में सोचा जा सकता था. जहां अचानक छुप कर दुनियां से गायब हुआ जा सकता था. और शहर में पिताजी के घर में कुछ दिन रहना बहुत ठोस और खुरदरा सा लगता था. उसके कज़न्स उससे एक दूरी बनाकर रखते थे. वे अपनी किताबों को उसे हाथ लगाने नहीं देते थे. खिलौनों से खेलने की उम्र रही नहीं थी. और महल्ले के खेल उसके लिए कुछ अलग तरह के थे. उनमें ताश शामिल होती थी. उसे ताश से हद दर्जे की बोरियत थी. उसे लगता था शहर में जाकर झट से किस्से कहानियों के किताबे खरीद कर वो लौट आए.
उसे कॉलोनी में बड़े नीम पर चढ़ने की याद आती रहती. नीम की सबसे ऊंची प्रत्यास्थ डाल पर लटक कर वो वापस ज़मीन पर कूद जाता था. नीम पर फुनगी से कुछ ही दूरी तक वो चढ़ जाता और वहां से किसी चिड़िया के घर में झांकना उसे एक सुख से भर देता. फिर वहां से डाल पर रेंगता वो सबसे अंतिम सिरे पर पहुचकर धप्प से ज़मीन पर कूद जाता.कॉलोनी के उसके दोस्त भी उसके साथ ये खेल खेलते.  
कॉलोनी में पांच सात लड़के हम उम्र थे. और दो तीन लडकियां थी. लड़के अलग खेलते, लडकियां अलग. उसे लगता जब लड़के खेलते थे तो वे दुनिया की नज़रों में नहीं होते थे. घर वालों में एक खास तरह की बेफिक्री उन्हें लेकर रहती थी. सब एक दूसरे को जानते थे और उनमें कामचलाऊ घरेलू व्यवहार और रिश्ते थे. ये सहजीवन जैसा नहीं था पर बीच में साझापन था. लड़के लड़कियों में ज्यादा घुलने मिलने को लेकर सख्त नियम जैसे नहीं बना रखे थे बस एक अलिखित सा समझौता उस जगह स्थापित था कि लड़के लड़के अलग रहेंगे और लड़कियां अलग. सब जानते थे कि कभी कोई बात हुई तो उसे बढ़ने से पहले ही ख़त्म कर दिया जायेगा.

अक्सर उस क़स्बे में बाहर से मदारी जादूगर आते थे। उनका मजमा जब भी लगता वो गाँव के कौतुहल का केंद्र बन जाता। इन दिनों फिर कोई मदारी अपने साथ जमूरे और बन्दर के साथ आया हुआ था। भीड़ का वर्तुल उसके चारों ओर था। वो अपने हाथ में किसी जानवर की खोपड़ी में देखते ही देखते आग लगा देता। बन्दर से करतब करवाता। और आखिर में जमूरे से मजमा देख रहे लोगों से फीस वसूल करवाता। वो भी इस मजमे का हिस्सा था। कुछ ही देर में जब उसने भीड़ में पदम् को भी वहीं देखा था उसका ध्यान मजमे से बार बार हटने लगा। पदम का ध्यान भी उसकी ओर गया। वो अब बीच बीच में एक दूसरे की ओर देख रहे थे। मजमा से उनका ध्यान एक दूसरे पर जाने लगा। पूरी भीड़ सिर्फ मदारी को देख रही थी पर वे मदारी के सम्मोहन से आज़ाद हो गए थे। उसे लगा इससे ज़्यादा एकांत में उसने पदम् को इससे पहले कभी नहीं देखा था। पदम् को अकेले में देखने पर उसे लगा वो बहुत खूबसूरत थी. क्या वो भी उसके बारे में ऐसा ही कुछ सोच रही होगी? ये सवाल उसने उस वक्त नहीं बरसों बाद अपने आप से पूछा था।




इस तरह के मज़मे बड़े एंटी क्लाइमेक्स पर ख़त्म होते थे। जिस ख़ास जादू को दिखाने का दावा मदारी करता था वो कभी दिखाया नहीं जाता। वो पहले ही उस भीड़ से सरक गया।  




ये छुट्टी का दिन था. सर्दी का दिन दुपहर तक चढ़ गया था फिर भी बाहर कोई हरकत नहीं लग रही थी था तो ये आम छुट्टी के दिन की तरह ही,नया कुछ नहीं, पर इसमें बड़ा अकेलापन था.उत्तर से रह कर सर्द हवाएं हड्डियों की मज्जा तक को जमा रही थीं. उसने स्वेटर, कोट सब पहन रखा था पर शरीर ठण्ड से फिर भी ऐंठा जा रहा था. न जाने क्यों आज कॉलोनी का कोई लड़का बाहर नहीं था.वो अकेला कोलोनी के फाटक के पास जाकर खड़ा हो गया.तीन तरफ से कॉलोनी को तारबंदी घेरे थी पर दफ्तर के सामने वाले हिस्से में छ सात फीट ऊंची करीब पचासेक फीट लम्बी पक्की दीवार थी जिसमें ये फाटक जड़ा था.अब जंग खा चुका ये फाटक खुला ही रहता था.वो फाटक के पास खड़ा कुछ देर ऐसे ही अन्यमनस्क खड़ा रहा. फिर इस इरादे इसे कि फाटक से होता दीवार पर कहीं बैठ जायेया, फाटक के ऊपर चढ़ने लगा. फाटक बरसों से बिना दबाव और भार झेले ऐसे ही खड़ा था पर वो उस मुद्रा में तभी तक खड़ा रहने की जुर्रत कर सकता था जब तक कि उस पर कोई बोझ न पड़े. असल में वो इशारे से ही दीवार से बंधा था. तो फिर लोहे के फाटक में में बीच के खाली स्थानों में अपनी उँगलियाँ फंसाए वो चढ़ने की कोशिश में ही था कि अचानक फाटक का वो दरवाज़ा उसे साथ लेता, उसे ज़मीन पर गिराता उसके ऊपर गिरा.वो चित्त था और फाटक उसकी कमर से उसे दबोचे हुए था. वो चिल्लाता उससे पहले उसने पदम को उसकी ओर भागते हुए देखा. उसने फाटक को पूरी ताकत लगाते हुए थोडा ऊपर किया वो रेंगता फिसलता बाहर आ गया. फाटक का वज़न हटने पर भी उससे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था.पदम ने उसे सहरा देने कि कोशिश की तो वो लुढ़क कर सीधा हो गया.अब उसे उठाकर सीधा करने की कोशिश में पदम ने उसेक दोनों हाथ पकड़ लिए.वो थोडा उठा और पदम को अपने साथ लेता धप्प से फिर गिर गया.पदम उसके ऊपर गिरती उससे पहले उसने हाथ से उसे रोक लिया.उसकी हथेली पर पदम की छाती टिक गयी.बस इसी क्षण दोनों की नज़रें मिलीं. और... पदम तेज़ी से भागने लग गयी.  पिछले कुछ दिनों से दोनों के बीच दोस्ती जैसा होने वाला हो रहा था पर इस अजाने स्पर्श ने दोस्ती के स्थाई रासायनिक यौगिक को बनाने की जगह एक बहुत बेचैन, तप्त और विस्फोट की संभावनाओं से युक्त किस अपरिभाषित से पदार्थ को जन्म दे दिया था.वो कुछ मुश्किल से खड़ा हो पाया फिर धीरे धीरे चलता हुआ घर की ओर रवाना हो गया. उसकी कनपटियाँ लाल हो चुकीं थी.सर बुखार में तपने लग गया और बाकी धड़ ठण्ड से कांप रहा था. घर पहुँचते ही सीओ सीधे रसोई में भागा. उसे लगा दुनिया में सबसे नर्म और गुनगुनी जगह रसोई होती है.




उसके बाद पदम उसे आने वाले कई दिन नहीं दिखी. कई दिन बाद वो दिखती और गायब हो जाती. वो दिखती तो भी उससे अनजान ही नज़र आती. वो जानबूझकर उसके दिखने के ठिकानों के आसपास मंडराने लगा. उसके घर के पिछवाड़े, खेलने की जगहों, उसकी दोस्त हेमी के घर के आसपास.सब जगह. पर वो कहीं नहीं दिखती. कोई इस तरह से भी ग़ायब हो सकता है! वो सोचता. ये तय था कि वो अपनी मर्जी से सामने नहीं आ रही थी. उसेक घर वाले उसे घर में नहीं रखे हुए थे. उसका कारण एक तो उन दोनों के बीच अब तक कोई रिश्ता था ही नहीं और जो था वो सद्यःजात, अद्वितीय, रंग-गंध-नामहीन, बेचेहरा, और प्रतिपल परिवर्तित होने की संभावनाओं से भरा था. ये रिश्ता अगर था भी तो दिलासा देने वाला नहीं, बेचैन करने वाला और लगभग डराने वाला था.






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वो फिर इसी कॉलोनी में था.बरसों बाद. उसके पिता यहीं से रिटायर हो रहे थे. उसके पिता ने तबादले के बारे में कभी सोचा नही नहीं. वो और भाई बहन सब शहर पढने चले गए फिर और जगहों पर नौकरी करने या उसकी खोज में जाते गए पर उसके माता पिता इसी कोलोनी के घर में रहे. अब पिताजी के रिटायर्मेंट का समय था. उसके बचपन और तरुणाई के इस घर ने कितने ही वसंत देखे थे.

वो कॉलोनी के रेतीले रास्तों पर घूमने लगा.
नीम का सबसे ऊंचा पेड़ ग़ायब था. उसे लगा उसे उसकी स्मृतिओं के लोक से अपदस्थ कर दिया है. वो लोहे का फाटक जिसने उसे उसके जीवन के पहला कोमल सम्बन्ध दिया था अब भी वहीं था पर उस पर पेंट हो चुका था और वो इतना मजबूती से दीवार में जड़ा था कि अब वो किसी पर गिर नह्नीं सकता था. उसने सोचा, कुछ चीज़े जो गिर नहीं सकतीं कितनी सख्त और निष्ठुर होती हैं!

स्मृतियों के धुंधला होने से पहले आप उन्हीं जगहों पर जाएं जहां वे जन्मी थीं तो वे फिर से चटख हो जाती हैं। वो फिर उन्हीं ठिकानों पर जाने की सोचने लगा, पर ठहर गया।
मेला ही तो था ये सब। मेले में जाना अच्छा लगता है। अगले दिन फिर जाते है। आखिर एक दिन मेला अपने माल असबाब सहित कहीं ओर चला जाता है। रह जाता है एक खाली रेतीला मैदान। वो समय भी जा चुका था सिर्फ उसकी केंचुल पड़ी थी. रेत घड़ी में रेत नहीं फिसलती समय फिसलता है। वही रेत कांच के बर्तन में पड़ी रहती है। वक्त कहीं चला जाता है।   

  

1 comment:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज के युवाओं से पर्यावरण हित में एक अनुरोध “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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