Friday, May 24, 2019

जब परिचित लोगों में ज़्यादा संख्या मरे हुओं की हो जाती है



इतालो कल्विनो की मशहूर किताब 'इनविजिबल सिटीज़' बहुत समय से मेरे पास है।  किताब को मैंने अपने मुताबिक इस तरह बनाया है कि इसे जब इच्छा होती है कहीं से भी पढ़ सकता हूँ। इसमें मार्को पोलों बहुत सारे शहरों के बारे में बताता है। हालांकि वो तमाम शहरों के हवाले से सिर्फ़ अपने शहर वेनिस की बात ही कर रहा होता है, पर मैं तमाम कल्पित शहरों के टुकड़े टुकड़े वृत्तांतों को भी फंतासी की तरह पढ़ना पसंद करता हूँ। 


किताब से एक अंश - 
(सिटिज़ एंड द डैड - 2 )

मेरी यात्राओं में मैं एडेलमा जितना दूर कभी नहीं गया।
ये गोधूलि का वक़्त था जब मैंने वहां क़दम रखा। डॉक पर जिस जहाजी ने रस्सी खूँटे से बांधी थी वो उस आदमी से मिलता जुलता था जिसने मेरे साथ फौज़ में नौकरी की थी और अब मर चुका था। ये वक़्त थोक मच्छी बाज़ार का था। एक बूढ़ा आदमी सी-अर्चिन से भरी टोकरी गाड़ी में लाद रहा था। मुझे लगा मैं उसे जानता था। मैं  जब तक मुड़कर उसे देखता वो गली के छोर से ग़ायब  चुका था। लेकिन मैंने महसूस किया कि वो मेरे बचपन में देखे उस बूढ़े मछुआरे से काफ़ी मिलता था जो अब, ज़ाहिर है, ज़िंदा नहीं हो सकता।

बुख़ार में तपते उस आदमी को देखकर मैं असहज हो गया जो ज़मीन पर खुद को सिकोड़ कर पड़ा था।  उसके माथे पर कम्बल थी। ठीक इस आदमी की तरह ही मेरे पिता की भी मौत से कुछ दिन पहले आँखें इसी तरह ज़र्द हो गयी थीं,  दाढ़ी बढ़ गयी थी।

मैंने अपनी नज़रें हटा लीं। इसके बाद किसी आदमी के चेहरे में झाँकने की हिम्मत मैंने नहीं की।

मैंने सोचा - " एडेलमा वो शहर है जो  मैं सपने में देख रहा हूँ और जिसमें आपकी मुलाक़ात मृत लोगों से  होती है, तो ये सपना डरावना है। और अगर एडेलमा सचमुच का शहर है, ज़िंदा लोगों का, तो  सिर्फ़ उनकी ओर देखते रहना है और मिलती जुलती परिचित शक़्लें अपने आप मिट जाएंगी, पीड़ा लिए अजनबी चेहरे उभर आएँगे। जो भी हो मेरे लिए सबसे ठीक यही है कि मैं उनकी तरफ़ न देखूं। "

सब्ज़ी- ठेले वाली गोभी तौल कर उसे उस टोकरी में रख रही थी जिसे एक लड़की ने अपने बालकनी से डोर  ज़रिये नीचे लटका रखा था। वो लड़की मेरे गाँव की उस लड़की से हूबहू मिलती थी जिसने प्रेम में पागल होकर अपनी जान दी थी।
सब्ज़ी बेचने वाली ने अपना चेहरा उठाया -  वो मेरी दादी थी।
 मैंने सोचा - "हरेक अपनी ज़िन्दगी में उम्र के उस पड़ाव पर ज़रूर पहुंचता है जब उसके अब तक के परिचित लोगों में ज़्यादा संख्या उनकी होती है जो मर चुके होते हैं, और दिमाग़ इससे ज़्यादा चेहरे और भाव याद रखने से मना कर देता है, हर नए सामने आने वाले चेहरे पर ये पुरानी शक़्लें ही छाप देता है, हरेक के लिए ये उपयुक्त मुखौटा ढूंढ ही लेता है। "   

Monday, March 18, 2019

ढाबा


वो इस मैदानी शहर की सर्द रात थी। अरसे  बाद वो यहां आया था। इस शहर की एक ख़ासियत थी। ये शहर जल्दी सो जाता था।  दिन भर ये शहर भीड़ भाड़ ,गाड़ियों की चिल्ल पौं, मॉल्स, और फैशन की  चमक दमक के बीच इतराता पर रात के पहले कुछ घंटों में ही इसका शहर शहर खेलना बंद हो जाता, और ये अपना शहरी मुखौटा उतार देता। किसी मासूम बच्चे की तरह ये शहर रात ढलते ही जैसे सोने की तैयारियों में मुब्तिला हो जाता। और फिर सो जाता। जल्द। आप रात के 10 बजे शहर में घूमना चाहें तो सड़कें अमूमन वीरान ही मिलेंगीं। और फिर ये तो रात के 11 बजे के बाद का वक़्त था। वो चौराहे से एक तरफ कोने में दबे पान के केबिन के पास खड़ा था। वो भी बंद हो चुका था। आसपास कोई हलचल नहीं। इक्का दुक्का कोई गाड़ी आकर उस जमे हुए ठोस सन्नाटे को भंग कर रही थी। उसने एक नज़र कुछ ही दूर उस जगह पर डाली जो कभी वो कॉलोनी हुआ करती थी जहां वो रहता था। जी हाँ, अब उस जगह कॉलोनी नहीं, बल्कि कई मंज़िल ऊंची कोई मीनार थी। इस मीनार में जगह जगह लोहे की मशीने लगी थीं जो उसे कोई दैत्यनुमा अजूबा बना रही थी। आसपास ही कहीं एक चाय की दुकान भी हुआ करती थी जो किसी ज़माने में उसकी पसंद का अड्डा हुआ करता था। चायवाला 30-35 की उम्र का आदमी हुआ करता था। उसके चेहरे पर गरीबी, बेचारगी और अपराधबोध की त्रयी के स्थायी भाव छपे थे। बिना कुछ किये चेहरे पर ग्लानि के निशान ग़रीबी के अस्थियों की मज्जा तक घुस जाने से बनते हैं। ये तय था कि वो चायवाला अब तक तो धरती के गाल से भी साफ़ किया जा चुका  था। उस चाय की थड़ी का भी अब दूर दूर तक कोई चिह्न नहीं था।  ज़ाहिर था अब ये जगह उसके लिए नितांत अपरिचित थी। पर शायद नहीं। उसकी नज़र सामने पीली मरी हुई रौशनी में टिमटिमाते एक भोजनालय पर गई। आसपास की रौशन मीनारों के साये में भी ये दुर्बल ढांचा अभी बना हुआ था इस बात में आश्चर्य था।  उसे कुछ याद आया।  हाँ इसी जगह तब भी एक भोजनालय हुआ करता था जब वो यहां रहता था। नाम ज़रूर बदला हुआ लग रहा था पर उसे महसूस हो रहा था कि दिखने में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ था। वैसे नाम पर उसने कभी गौर नहीं किया था पर चूँकि वो सामने ही रहता था और कितनी ही बार उसका वहां से गुज़रना होता था इसलिए उसे याद था इसका नाम - बजरंग बली वैष्णव भोजनालय।

उसे अचानक घर जैसा महसूस होने लगा।  इस सर्दी में उसे सामने दीखते ढाबे में से अपनेपन की धीमी आंच आने लगी थी। सर्द एकांत में उसे ढाबे का खुला होना बड़ा भला लग रहा था। वो इस नाउम्मीद समय में उम्मीद की तरह रोशन था। ढाबा अगर था तो तय था कि उसमें भट्ठी थी। और अगर खुला था तो तय था कि उसकी भट्ठी में ताप था। "कितना सुखद होता है किसी चूल्हे का ताप!" उसने सोचा। अपनी अंदरूनी भित्तियों से आभा बिखेरता, तमतमाया चूल्हा कितना सुंदर लगता है! एक किस्म की लाल रौशनी में चमकता। उसे सहसा तेज़ भूख का अहसास होने लगा। उसने फ़ैसला किया, वो ढाबे में जाकर छक कर खाना खाएगा। जो भी उपलब्ध होगा उस वक़्त, उसे अच्छा ही लगेगा।

बीच की सड़क पार कर वो ढाबे पर पहुंचा। उसे तसल्ली हुई की उसमें कुछ लोग थे।  खाना खाने वाला ग्राहक शायद कोई नहीं था,  स्टाफ ही खाना खाने की तैयारी में था।
खाना मिलेगा भाई साब ? उसके सवाल पर एक आदमी ने उसकी ओर देखा और काफ़ी देर तक कोई जवाब नहीं दिया। उसने स्टाफ की तरफ देखा और वहां से तसल्लीबख़्श जवाब आने पर उसे अंदर आने का इशारा किया।
 वो एक ख़ाली टेबल पर बैठ गया।


"कभी यहां बजरंग बली वैष्णव भोजनालय हुआ करता था..."

उस मुसाफिर ने बात इस तरह अधूरी छोड़ी कि उसमें और कुछ न जोड़ा जाय तो भी काम चल जाए। पर उसकी बात का गज़ब असर हुआ और जिस आदमी ने उसे  खाने की टेबल पर बैठने का इशारा किया था उसकी आँखे चौड़ी हो गयी। उसकी दिलचस्पी मुसाफ़िर में  अचानक से बढ़ गयी। वो टेबल पर मुसाफिर के सामने आकर बैठ गया। उसकी इस हरकत से रात के इस वक़्त बचा हुआ स्टाफ हरकत में आ गया। तुरंत पानी रखा जाने लगा। प्याज़ और मिर्ची काट कर रख दिए गए। और टेबल पर एक थाली और दो कटोरियां रखीं गयी।

मुसाफिर समझ गया था कि उसी बात का असर है और ढाबे का मालिक या संचालक या जो भी वो था, उसके सामने यों ही नहीं बैठ गया था। मुसाफिर ने आखिर उसे पूछा-
" आप इस ढाबे के मालिक है? क्या आप वाक़िफ़ हैं कि यहां बजरंग बली भोजनालय हुआ करता था ?"
ढाबे का मालिक या संचालक कुछ नहीं बोला। मुसाफिर ने अपने पहले कहे में कुछ ओर जोड़ते हुए कहा -
" मैं असल में, सामने कभी गणेश कॉलोनी हुआ करती थी उसमें रहता था। यही कोई बीस बरस पहले...." उसकी बात को अधूरा छोड़ने की शायद आदत थी। या शायद उसका बोलने का तरीका जो बात पूरी होने पर भी अधूरे की तरह छोड़ने वाला था।

" जिसकी तुम बात कर रहे हो वो ढाबा तो कब का बंद हो चुका, " आखिर ढाबेवाले ने असह्य रूप से भारी और गाढ़े हो चुके मौन तोड़ते हुए कहा, " वो भी क्या दिन थे" - वो कहीं जाता जा रहा था - " मैं तब उसमें कुक था और मुझे बनवारी यहां लाया था। बनवारी इस ढाबे का पहला मालिक। वो हनुमान जी का पक्का भक्त था। इसलिए सोचने की ज़रुरत थी ही नहीं और बजरंग बली भोजनालय इस दुनियां में आया। अपने आने के कुछ ही दिनों में ढाबा रौनके भी ले आया। ग्राहकों की ठीक ठाक भीड़ रहने लगी। ढाबे के अंदर धुआँ, सिके गेहूं और मिर्च के बघार की गंध का अपना एक संसार बन गया।"
कुछ देर तक फिर से एक चुप्पी पसर गई। उसने आख़िर अपनी बात फिर शुरू करते हुए कहा -
" एक असगुन अचानक बनवारी की ज़िन्दगी में आ गया। बनवारी की बेटी की शादी के ठीक दस दिन पहले वो मर गई। किसी ने उसका क़त्ल कर दिया। बनवारी को पता नहीं था पर लोग ऐसा मानते थे कि लड़की के प्यार में पागल एक शख़्स को उसकी शादी किसी और से मंज़ूर नहीं थी और वहशी ने उसका क़त्ल कर दिया। बनवारी गुड्डो से बहुत प्यार करता था और उसके साथ  ऐसा होने पर पागल हो गया। बनवारी इस सदमे से कभी बाहर  नहीं आ पाया। वो अचानक किसी के भी पीछे भागने लगता और चिल्लाता जाता, पकड़ो ! यही है कातिल। "

"कई महीनों तक बंद रहने के बाद ढाबा बिक गया।"
" फिर इसे महादेव ने ख़रीदा।  नाम दिया ' ए-वन' भोजनालय। "
"बहुत गन्दा खाना था इस नए ढाबे का। फिर भी ये चलता रहा। यहां लोग खाना खाने की बजाय चाय पीने ज़्यादा आते थे। यहां की चाय बहुत फेमस हो गई थी। ढाबे से ज़्यादा ये टी स्टाल था। तमाम तरह के लोग यहां आते थे। कॉलेज के छोरे छोरियां, नौकरी वाले, रिटायर्ड , पार्षद, मंत्री नेता सब। गंजेड़ी, भंगेड़ी, भिखारी भी। खूब चला ये ठिकाना, पर महादेव के मन में सिर्फ चाय की दूकान होने की कहीं न कहीं टीस थी। वो नाम के अनुरूप इसे प्रॉपर ढाबा बनाना चाहता था। लोग जहां अपनी फॅमिली के साथ आएं और खूब डट कर खाना खाकर जाएं। महादेव ख़ुद कुक ही था। ढाबे का मालिक बनने के बाद भी उसके अंदर का रसोइया जागा रहता था।  असल में वो अपने आप को बहुत मंझा हुआ रसोइया मानता था। वो कलकत्ते में मारवाड़ी सेठों का रसोइया रह चुका था। इस बात की उसके मन में बहुत आंट थी। गुरूर किस बात का था उसे ये मैं समझ नहीं पाया। जब ढाबा अपने खाने के लिए शुरू से ही नहीं चला तभी उसे समझ जाना चाहिए था कि ये हुनर उसके पास नहीं है। हाँ मालिक होने के नाते वो किसी ढंग के कुक को रखकर कमा सकता था। और फिर चाय उकाळ उकाळ कर  पैसे तो वो ठीक ठीक खड़े कर ही रहा था।"

वो ढाबे के दूसरे मालिक की कहानी सुन रहा था पर न जाने क्यों उसकी दिलचस्पी इसके बाद थोड़ी कम हो  गयी थी। उसे तगड़ी भूख सता रही थी। सिके गेहुओं की गंध उसके दिमाग़ में उत्पात मचा रही थी। उसने अपने मेज़बान की तरफ देखा तो वो चौंक गया। उसकी आँखों की पुतलियां ऊपर चढ़ी हुई थी। साफ़ तौर पर वो समय के किसी और ही तल पर खड़ा था। उसने अपनी भूख को भरसक काबू में रखा और फिर से उसके बोलने का इंतज़ार करने लगा।

" मदादेव " - उसने फिर बोलना शुरू किया - " दो कौड़ी का रसोइया था ये बात खुद महादेव की समझ में आ जानी चाहिए थी। पर वो कहाँ समझने वाला था। उस पर तो कलकत्ता का रसोइया सवार था। एक दिन उसने चाय का भगौला बाहर फेंक दिया और ढाबे पर नया बोर्ड टांग दिया ' महादेव भोजनालय' । उसने चाय बनाने वाले कारीगर को नौकरी से निकाल दिया और तमाम लोगों से कह दिया कि चाय यहां नहीं मिलेगी।"
" और इस तरह ये भोजनालय एक दिन फिर से बंद हो गया। चाय पीने वालों ने शहर में नया अड्डा ढूंढ लिया। अच्छा खाना जिनको चाहिए था उनके लिए तो ये वैसे ही काम की जगह थी नहीं। लोग इस जगह को जल्द ही भूल गए। मैंने महादेव से यहां काम माँगा था पर उसने मुझे दुत्कार दिया, कहा, दो रसोइये यहां क्या करेंगे। मैंने कहीं और काम कर लिया। मुझे असल में बनवारी के इस ढाबे पर काम चाहिए था। मुझे काम की कमी नहीं थी। पर खैर.."

मेहमान भूख से उतावला हो रहा था पर उसने अपने मेज़बान को वापस इस रात पर आने तक इंतज़ार करना ठीक समझा।

"बरसों तक ये ढाबा फिर बंद पड़ा रहा। इस बीच इस इलाके का काया पलट होता रहा। गणेश कॉलोनी बिखर कर सपाट हो गई। उस पर एक मीनार खड़ी हो गयी। कई कंपनियों के टावर इधर उधर लगते रहे। इलाके में जगह जगह सफ़ेद लाइटें लगती रहीं। पर इस बंद जगह पर चूल्हा बना रहा। बुझे चूल्हे में शायद कोई चिंगारी जली रह गयी।"
 " बनवारी को चैन शायद इस जगह पर ही मिलता था। बरसों तक पागलपन और नीमबेहोशी के बाद आख़िर वक्त के हाथों मरहमपट्टी से वो कुछ होश में आने लगा। उसके पास ज़्यादा कुछ था नहीं पर गाँव का खेत बेचकर उसने फिर से इस ढाबे को खरीद लिया। मैं फिर उसके साथ आ गया। आखिर बनवारी मेरा दोस्त जो था। अब वो दिन भर यहीं बैठा रहता है। बहुत ज़्यादा रौनक तो नहीं पर थोड़ी बहुत से ही उसका मन लगा रहता है।"

उसने अपनी भूख के बीच पूछा - " अब तो लोगों की पसंद का ठिकाना होगी ये जगह?"
" अरे अब कहाँ, अब लोगों के लिए घर की रसोई कहाँ चाहिए। अब तो विदेशी नाम वाली चीज़ें काबिज़ हो गयीं हैं। गेहूं की रोटी ने अपनी पकड़ खो दी है।  अब तो ठीक है .. कोई परदेसी आ जाए, या गाँव से कोई  भूला भटका..


एक हल्की धप्प की आवाज़ से नौकर ने मेहमान की थाली में रोटी रख दी। साथ में ग़र्म, तेज़ मसाले वाली पीली दाल उसकी कटोरी में डाल दी। अब उससे रहा नहीं गया। उसने बिना मेज़बान की ओर ध्यान दिए उतावला होकर खाना शुरू कर दिया। मेज़बान को उसका ध्यान ही  था। उसकी आँखों की पुतलियां अब भी उल्टी हो रखी थीं। वो अब भी बनवारी का पहला कुक बना हुआ था। 

Wednesday, September 26, 2018

इंडियन स्पाइसेज़




(1)

वो ज़्यादातर चुप रहता था. इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता था किउसकी आदत कम बोलने की थी या उसे ज्यादा बोलना पसंद नहीं था . एक बात जो काफी भरोसे के साथ कही जा सकती थी कि उसके भीतर बोलने को लेकर कोई हिचक या संकोच जैसी बात नहीं थी. उसके चेहरे पर एक खास तरह की दृढ़ता थी. वो शर्मीला कतई नहीं लगता था. उसका चेहरा काफी बड़ा था. उसके चेहरे के भूगोल का बड़ा हिस्सा रूखा, भावहीन और सपाट था. एक निर्जन समतल मैदान की तरह. अगर किसी तरह के भाव उसके चेहरे पर होते तो वे ज़रूर दिखते और कहीं से आकर उभरते तो भी दिखते. चेहरे पर कोई भी हलचल नुमाया हुए बिना नहीं रह सकती थी. वो भावहीन चुप्पा किस्म का इन्सान था.

मैंने पहली बार उसे टिफिन सेंटर की कुर्सी पर बैठे देखा था. ये कोई कॉर्पोरेट ऑफिस नहीं था इसलिए उसकी कुर्सी और उसके गिर्द के परिवेश में कोई नफासत नहीं थी. जहाँ रोटियाँ बन रहीं थी उस जगह और सब्ज़ी दाल के बड़े भगौनों के पास का खांचा उसका ऑफिस स्पेस था. एक कुर्सी रखे जाने जितनी जगह. पर ये जगह उसने अपने लिए खुद मुक़र्रर की थी. वो ही इस टिफ़िन सेंटर का मलिक और एकमात्र मैनेजर संचालक जैसा कुछ था. इस तरह के किसी नामकरण को लेकर उसकी कोई चेष्टा नहीं थी. आसपास रहने वाले विद्यार्थी और सेल्समैन - मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव के कमरों में यहीं से टिफ़िन में खाना पहुँचाया जाता था. कई अनियमित ग्राहक यहाँ ख़ुद आकर भी खाना पैक करवाकर ले जाते थे. ये संचालक की कुछ वक़्त पहले जगी महत्वाकांक्षा लगती थी कि उसने अपने टिफ़िन सेंटर में अतिरिक्त स्पेस निकाल कर टेबलें लगवा ली थीं. ताकि ग्राहक सीधे गरमागरम खाने को उसी जगह भोग लगाने बैठ सकें. इस तरह ये टिफ़िन सेंटर और रेस्टोरेंट का हाइब्रिड मॉडल था. अपने लिए उसने इन्हीं सब वजहों से कुछ ख़ास जगह नहीं छोड़ रखी थी. उसे इसकी दरकार भी नहीं थी. उसके मिज़ाज को भी नहीं.

उसकी बगल में गैस के एक बड़े से चूल्हे पर दो एक लोग रोटी बनाने का काम करते थे और पीछे एक आदमी टिफ़िन पैक करने का काम करता था. उसके पास ही एल्युमीनियम के भगौनों में दाल और सब्जियां रखी होती थीं जिन्हें वो पॉलिथीन की थैलियों में माप के अनुसार डालने का काम करता था. रोटी दाल सब्जी के अलावा एक कम्पलीट टिफ़िन में थोडा कच्चा प्याज़, कटा हुआ आधा नीम्बू और आधा पापड़ भी शामिल था. नियमित रूप से टिफ़िन मंगवाने वाले के लिए कम पैसे में ये एक्स्ट्रा चीज़ें सेंटर मालिक की तरफ से उदार होकर दिए जाने वाले तोहफ़े थे. यहाँ अचार का ज़िक्र रह गया, वो भी टिफ़िन में उपलब्ध होने वाले तोहफों में शामिल था.

रोटियाँ बेलने और सेकने वाले लोगों और टिफ़िन पैक करने वाले स्टाफ़ के बीच भी यदा कदा ही कोई संवाद होता था. ज़्यादातर ग्राहक नियमित थे. ज़्यादातर कस्टमर ऐसे थे जो इस जगह से किसी न किसी रूप में जुड़े थे और अपरिचित नहीं रह गए थे. पर कभी कभार कोई बिलकुल नया बन्दा यहाँ आता तो संचालक से अपेक्षा थी कि वो व्यवसाय सुलभ मुस्कान से उनका स्वागत करता. पर ये बिलकुल अलग ही किस्म की मितव्ययिता थी.
वो ग्राहक के आर्डर को लगभग मशीनी अंदाज़ में लेता. ग्राहक खाने के बारे में कहता जैसे कि - ' एक खाना पैक करके दीजिये'. इस पर वो कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं देता और पीछे खड़ा आदमी उसके आर्डर पर पैकिंग शुरू कर देता. स्टाफ के लिए ग्राहक के आर्डर पर मालिक की प्रतिक्रिया से ज्यादा उसकी पवित्र उपस्थिति भर ही अनिवार्य होती थी. मालिक का काम पैसे लेने का ज़रूर होता.

मालिक, स्टाफ और उपस्थित ग्राहकों में एक हैरान कर देने वाला रिश्ता पूरे समय बना रहता था. ये सब मिलकर एक मशीन बना रहे थे जिसके पुर्जे अलग अलग समय में हिलते थे पर उनमें तारतम्य पूरा दिखाई पड़ता था.
मालिक फिर भी कुछ हद तक एक मज़ेदार आदमी था. वो कम से कम एक बार मुस्कुराया था. एक ग्राहक ने ये बात इस दावे के साथ बताई कि इसे लगभग प्रमाण के तौर पर शुमार किया जा सकता है. ग्राहक ने पैसे दिए. उसने पैसे लिए और गिने. गिनने के बाद और उसके किसी और काम में व्यस्त होने के बीच के बारीक अंतराल में ग्राहक ने धन्यवाद कहा. इस अनपेक्षित अभिवादन पर वो शिष्टाचार वश आधा अधूरा मुस्कुरा दिया था.

कुछ था यहाँ कि यहाँ एक बार आया आदमी लौट कर ज़रूर आता था.

(2)

उस लड़के का सारा खेल ठेले पर चलता था. वो चायनीज़ का ठेला था. मंचूरियन ड्राई और विथ ग्रेवी में उसे महारत जैसी हासिल थी. लोगों की फरमाइश का वो ध्यान रखता था. जैसे कोई कहता बहुत स्पाइसी बनाना तो वो आग परोसता था, कोई कहता बच्चों के हिसाब से ज्यादा तीखा नहीं तो वो उस तरह कस्टमाइज कर तैयार करता था. उसकी उम्र ज्यादा नहीं थी. और वो नेपाली नहीं था. उसके ठेले का नाम कोई स्थानीय देवी के नाम पर था. उसके साथ चायनीज़ जुड़ना थोड़ा अलग लगता था. पर नाम पर कौन गौर करता था. एक भीड़ उस लड़के के भरोसे जुटी रहती थी. शाम को उसका ठेला लगते ही लोगों का उसके ठेले पर मंडराना शुरू हो जाता था. कई वहां बैठ कर या खड़े खड़े ही ज़ायके का लुत्फ़ लेते, कई अपने बच्चों के लिए पैक करवा कर घर ले जाते. कई अपनी प्रेमिकाओं के साथ उनकी ख़ास माइश पर वहां आते.

लड़के के हाथों में ग़ज़ब की फुर्ती थी. वो एक ही काम को हज़ारों बार कर चुका था. वो रोज़ न जाने कितनी ही बार मसालों के सटीक मिश्रण और ठीक ठीक आंच की कीमियागरी के साथ बिलकुल एक जैसा ज़ायका परोसता था. गैस चूल्हा, कड़ाही, छन छन और कई पदार्थों में झपट पड़ता उसका हाथ आखिर में कड़ाही में छूटता था. उसके हाथ से कच्ची सामग्री के कड़ाही में छूटते ही छन्न की आवाज़ के साथ मसालेदार धुंए का एक छोटा बादल कडाही के गिर्द तैरने लग जाता. लोग मंत्रमुग्ध से उसे देखते थे. कई लोगों को संदेह था कि वो चीन से ट्रेनिंग लेकर आया है. ये संदेह कई लोगों के लिए दावे में बदल जाता. उसे लेकर उसके प्रशंसक अतिशयोक्तिपूर्ण दावे भी करने लगे. जैसे कुछ नियमित ग्राहकों का मानना था कि अकेले में वो चीनियों की तरह चॉप स्टिक्स से खाता है. कुछ लोग यहाँ तक भरोसा करते थे कि वो मंदारिन जानता है. तो कुछ की सनक उसे चीनी जासूस घोषित कर रही थी. खैर... ज़्यादातर का मानना था कि चीन तो दूर की कौड़ी है पर हांगकांग ज़रूर वो गया होगा. यद्यपि उसे देखकर कोई भी समझदार तो यही कहेगा कि वो इस शहर से बाहर शायद ही कभी गया होगा. और ऐसा ही था.

उसका काम सिर्फ कुछ न कुछ बनाना ही था. पैकिंग का काम एक दूसरा लड़का करता था. एक बार आर्डर जितना बनाने के बाद वो दूसरे आर्डर पर लग जाता, फिर तीसरे और बाद में चौथे. इस तरह अपने आप को हर बार दोहराता था. उसका व्यक्तित्व आर्डर लेने की प्रतिक्रिया से बनता था फिर हर आर्डर पर अपने को दोहराता था. उसे किसी ने बोलते हुए सुना नहीं था. उसके आस पास से कोई आवाज़ आती थी तो वो छन् की आवाज़ थी. वो मसालों की तीखी गंध वाले धुंए में लिपटा रहता था. आस पास खड़े लोगों के नथुनों की श्लेष्मा झिल्ली को रगड़ता तीक्ष्ण धूम्र ही उसका कुल व्यक्तित्व था.

आप उसकी तारीफ नहीं कर सकते. 'कुछ अच्छा बना है' कहने से न तो वो खुश होता था, न ही नाराज़. कोई नई बात नहीं थी ये कहना कि तुम एक उम्दा कारीगर हो.

3

उस जगह ख़ासी चहल पहल थी. ये फ़ास्ट फ़ूड का एक जटिल संकुल सा था जो शहर के एक बेहद जाने पहचाने चौराहे से कुछ ही दूर था. चौराहे पर एक बड़ा गोलाकार पार्क बना हुआ था जहां शाम के समय बच्चे जिद करके अपने परिवारों को लाया करते थे. वे सब उस पार्क में एकाध घंटे बिताकर वहां से वापसी करते. वापसी का ये रास्ता सीधे घर की ओर नहीं जाता था, बल्कि आग गंध और स्वाद के इस बेतरतीब भीड़भरे लेकिन मादक जंगल से उलझता हुआ घरों की ओर लौटता था.

चायनीज़ सबकी पहली पसंद था. मुम्बैया पंजाबी और साउथ इंडियन भी पसंद में होड़ लेते थे. चायनीज़ के नाम पर जो कुछ भी दिया जाता था वो बीजिंग में परोसे जाने वाले वेज जंक से कितना मिलता था, मिलता भी था या नहीं ये सब सवाल बेमानी ही थे. इस तरह के सवाल अगर होते भी थे या किये भी जा सकते थे तो उसकी जगह फेसबुक थी.

खूब सारी टेबल्स और प्लास्टिक की कुर्सियां फ़ास्ट फ़ूड की कई सारी दुकानें.
जय भोले चायनीज़ से मुंबई जंक्शन तक. नामों में कहीं इनोवेशन लगता तो कहीं चलताऊ रवैया सामने आता था..

तेज़ रौशनी चुभती सी और यहाँ वहां उड़ते कीट.

वे दोनों मेरे पास वाली टेबल पर आमने सामने बैठे थे. लड़के ने खूब दाढ़ी उगा रखी थी जो उसके चेहरे पर ठीक ठाक लग रही थी और उसके बेतकल्लुफ होने को और मजबूती से सामने लाती थी. लड़की कुछ ओवरवेट थी. माफ़ करें अगर ये कहना गुस्ताखी लगे. अगर आप मानते हैं कि आजकल ओवरवेट के लिए प्लम लफ्ज़ इस्तेमाल होना चाहिए तो मैं अपना शब्द वापस लेकर कहूँगा कि वो लड़की खाते पीते खानदान से ताल्लुक रखती थी. उसका चेहरा गोल और बड़ा था.
वे दोनों कुछ देर से आमने सामने चुप बैठे थे. वे बड़ी देर तक चुप बैठे रहे. कोई एक दूसरे की तरफ़ भी नहीं देख रहा था. किसी के चेहरे पर रंज़ या गुस्सा नहीं. शायद वे दोनों प्रेमी थे. बहुत थोड़ी सम्भावना उनके ठीक ठाक दोस्त होने की भी थी. पर सिर्फ दोस्त होने में जो बेतकल्लुफी होती है वो उनके बीच नहीं थी. स्थगित संवाद के बावजूद मन ये मानता था कि वे आपस में प्रेम में थे. वे अपने अपने काम से थक कर आये हो सकते थे. बल्कि ऐसा ही था. लड़की के सुंदर चेहरे पर थकान साफ़ दिख रही थी. लड़के के चेहरे पर दाढ़ी ने बेशक उसे छुपा रखा था पर वो जिस तरह से टेबल के नीचे पाँव पसार कर बैठा था उससे साफ़ था कि वो भी थका हुआ था. वे दोनों इतने थके हुए थे कि कुछ भी बोलना उनके लिए और थकाने वाला काम था. लड़के ने वेटर के इस बार फिर पूछने पर कुछ आर्डर दिया. थोड़ी देर बाद वेटर आर्डर रखकर चला गया. वे दोनों खाने लगे. खाने को लेकर कोई गहरा राग उनमें नहीं था. उनके आसपास रौनक थी. हर कोई अपनी पसंद की चीज़ें खाने में व्यस्त था. बच्चे खासे खुश. उनके मां बाप भी एक अच्छे दिन के शानदार समापन में लगे थे. खुशियों के बीच वे दोनों अपनी थकान के दायरे में थे. वे चुपचाप खा रहे थे. वे एकाध बार एक दूसरे की ओर देख रहे थे. उन दोनों का एक दूसरे की ओर देखना अलग अलग समय में हो रहा था. लड़की जब दाढ़ी वाले लड़के की ओर देखती तो वो लड़का नीचे नज़र किये खा रहा होता. लड़का जब लड़की की ओर देखता तो लड़की 'कहीं ओर देखती पर कहीं नहीं देखती' धीरे धीरे मुंह हिला रही होती. इससे दोनों को कोई शिकायत नहीं थी. इससे किसी को कोई शिकायत नहीं थी. न आसपास के लोगों को. वे पास बैठकर ही संतोष में थे शायद. कुछ कहने बोलने की ज़रुरत महसूस नहीं की जा रही थी.
अब मुझे ये विश्वास हो गया था कि वे असल में गहरे प्रेम में थे. मेरे इस विश्वास के बहुत बाद लड़की ने लड़के को एक भरपूर नज़र से देखा. और उसके बहुत बाद लड़के ने पैसे चुकाए और वे दोनों वहां से साथ साथ निकल गए.

                                               ( इमेज साभार गूगल )

Wednesday, January 3, 2018

फ़ीके रंग वाला फूल


कितने आक्रामक लगते है ये चटख रंग.
कांच के टुकड़ों की तरह आँखों में घुसे जाते हैं. गमलों में उगे कोमल और कृशकाय पौधों पर किसने इतने गहरे रंग के फूल उगा दिए? क्या जंगल में भी ऐसे ही तीखे रंगों का सैलाब उमड़ता है? या ये प्रयोगशालाओं के रसायनों से पनपे है ?
झील के किनारे फूलों की प्रदर्शनी लगी है. किनारे पर माहौल में रूमान है. हल्का संगीत पानी की सुस्त लहरों से संगत करता है. लम्बे प्रोमेनाड पर लोगों की चाल में शांति है. पता नहीं चलता कि इस बारिश में छलक उठी झील का टनों गैलन पानी अपनी डूब में आई धरती को कितना ज़ोर से भींचे हुए है. दिगंत में कोई पक्षी सांवली रेखा उकेरता उड़ता चला जाता है.
यहाँ कतारों में लगे हैं बेशुमार गमले. गमलों की मिट्टी में उगे बौने पौधे और उस पर उसके आकार और कद से कहीं ज़्यादा लगे फूल. इनका रंग हैरान करता है. चमकदार बैंगनी, लाल, रानी और गाढ़ा आसमानी.
बेरंग मिट्टी में पस्त से हरे पत्तों के बीच रक्ताभ फूल.जैसे ठंडी आग बैठी है इस गमले में.
रंगों की इस चकाचौंध का पोषणकैसे होता है? क्या एक गमले की मिट्टी काफ़ी है इस वैभव को सींचने में ?
कोई फ़ीके रंग का फूल चाहिए मुझे, भले ही वो मेरी हथेली के आकार से बहुत छोटा हो. इस लम्बी कतार में देखता हूँ शायद कही छुपा बैठा हो. वैभव के बीच उपेक्षित सा कोई हल्के रंग का फूल.