Sunday, May 13, 2012

लालटेन


लालटेन की अभिशप्त रौशनी में अँधेरा अधिक स्याह होकर सामने आता है.उसकी लौ की भभक मानो उचक उचक कर अपनी ही पैदा की गयी चमक को निगलती है. उसे उजाले की दुनिया से निष्कासित कर दिया गया है.वो रौशनी का मिथ्याभास है.उसकी आड़ में अँधेरे को वाचाल होने का अवसर मिलता है.वो आसानी से अपने छल पर लालटेनी रोशनी की बारीक चादर ओढा देता है. और तब अरसे से ज़मींदोज़ हुआ खंडहर भुतहा लगने लगता है.लालटेन की रोशनी इतनी सुदूर है कि उस तक पहुँचने के लिए ठोस अन्धकार को भेदना ज़रूरी है. और इतनी निशक्त कि घर के किसी कोने में टंगी होने पर उसे एक बेचारगी भरा व्यक्तित्व प्रदान करती है.एक स्त्री लालटेन को उठा कर अपने चेहरे के करीब लाती है तो लालटेन उसके युवा चेहरे को झुर्रियों से भर देती है..

उसके कांच के गोले के ठीक बाहर अँधेरे का ठंडा बियाबान है.

किसी भूत को देखने का दावा करने वाला पहला और अब तक का आखरी शख्स जिसने ये दावा सीधे खुद मुझसे किया हो,मेरी दादी थी.उसने इसी लालटेन की रौशनी में रात के तीसरे प्रहर में  किसी मणि बेन को देखा था जिसके बारे में अगले दिन पता चला कि वो तो इलाज के लिए शहर गई हुई थी और जिसे मेरी दादी ने लालटेन के भ्रमित करने वाले आलोक में देखा था वो उसकी बरसों पहले मर चुकी दादी थी जिसकी हूबहू शक्ल लेकर मणि बेन पैदा हुई थी.सच तो जो था वो था पर उसे भी लालटेन सीधा और सपाट नहीं रख पाई. भूत देखने का ये अनुभव इतना व्यक्तिनिष्ठ था कि अंततः किसी भी विपरीत तर्क से मुक्ति पाने के लिए मेरी दादी ने इस सिद्धांत की घोषणा ही कर डाली कि ‘दो लोग एक ही भूत को एक ही जगह एक साथ नहीं देख सकते’.पर खैर उसकी जिंदगी में ‘लालटेन के परिमित-आभासी-उजाले में किसी परिचित चल-आकृति का हमेशा होना’ बना रहा.उजाले को इतना उजाड़ पाना बहुत बड़ी त्रासदी है जो बारिश की नम रात में लालटेन के एकाकीपन को कभी कभार अपनी प्रदक्षिणा से भंग करते कीट से और बढते महसूस किया सकता है.अपने इस एकांत में बिसूरती, डूसके भरती लालटेन इतनी पस्त है कि वो दिन उगने का इंतज़ार करती है जिससे कि वो अपने रौशनीनुमा ‘कुछ’ को तिरोहित कर थोड़ी देर चैन की नींद सो सके.

Sunday, April 15, 2012

कुछ और कवितायेँ



मत आना

बरसों से चुप पड़ी पुरानी खांसी फिर से उभरी है
दिमाग में उठ आया है
हज़ारों दिन पहले का
कोई जंग खा चुका बवंडर


अब जब तुम फिर से आई हो
तो सुनो
तबसे अब तक   
पृथ्वी बहुत फांक चुकी है
सूरज से गिरती आकाशीय धूल
और मेरे मन की जलवायु भी
बदल चुकी है
कमोबेश.
वो पीपल जो युवा था कभी
और हवा के संग मिला लेता था
तुम्हारी आहट से ताल
अब वनैला बरगद हो चुका है
उसकी जड़-शाखाओं से उलटे लटके हैं वेताल
अपने मूर्ख प्रश्नों से जो 
खिल्ली उड़ाते अहर्निश
हमारी समझ की.

मैं तो कहता हूँ मत आओ अब तुम
मेरी देहरी पर इस तरह.


बुदबुदाहट



बुदबुदाता है बूढा
जैसे खुद से ही कह रहा हो
या फिर सीधे ईश्वर से 
किसी तिब्बती मन्त्र की शक्ल में कुछ कुछ 
कि प्रेम में विफल
लड़की को मिलता है कोई
अधेड पति
और
लड़का ले आता है
एक थकी हुई स्त्री
जो खुद
प्रेम से हार कर
पिसती रही है
अफ़सोस की पेषणी में.

प्रेम के खारे समंदर को
मथने के लिए
पर्वत-सी झेरनी चाहिए.   


                    (photo courtesy- alessandra luvisotto)

Saturday, February 18, 2012

कुछ छोटी कवितायेँ


ओट

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डर नहीं है पर

प्रेम करते वक्त छुपो थोड़ा

यूँ समझो कि

इससे एक प्राचीन क़ायदे की

इज्ज़त बनी रहती है.


बस, इतनी भर ओट ही

काफी होगी

जितनी आकाशीय तारों के जलसे में

रहती है

दूज के चाँद की

जितनी वर्षा-भीगे वन के मुखर उल्लास में

रहती है

झींगुरों के शोर की

जितनी अघोरी के नितांत निजी आनंद में

रहती है

चिलम के धुंए की


बस प्रेम को थोड़ी ओट चाहिए



किताब पढते पढते सो जाना

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हर रात

अपने प्रिय लेखक की डायरी

को पढता हूँ

लेटे लेटे

और अक्सर

सो जाता हूँ बीच में ही कहीं

फिर मैं और वो डायरीकार

आमने सामने होते हैं

बैठे चुपचाप

ये अमूमन हमारे मिलने की जगह है

मैं अपनी नींद में निकलता हूँ बाहर

तो वो आकर छुपता है मेरी नींद में.



जैसलमेर(पीले पत्थरों का शहर)

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ईश्वर ने

लालटेन जलाकर

शहर को देखा

और फिर


लालटेन बुझाना भूल गया.

Saturday, February 4, 2012

माचिस की डिबिया

तीली

माचिस की हरेक तीली की नोक पर पिछले दस हज़ार सालों का इतिहास दर्ज़ है. उस नोक की एक रगड़ से उत्पन्न आग इंसान की पैदा की गयी पहली आग की स्मृति है.और ये सिर्फ उस ताप की स्मृति ही नहीं है उस ज़ायके की स्मृति भी है जो पके हुए खाने के जीभ पर आने से पहले खुशबू के रूप में पहली बार फैला होगा.माचिस की तीली अपनी डिबिया में मौन रहती है.एक रगड़ भर का फर्क है इसके मूक से वाचाल होने में.

डिबिया

माचिस की डिबिया एक तीली की तरह पुरातन धुंए में लिपटे खाना पका रहे सबसे पहले चटोरे आदमी के दर्शन भले नहीं कराती पर कुछ साल पहले ही पीछे छूटे बचपन को ज़रूर हमारे सामने प्रकट करती है. कम से कम मेरे बचपन को तो ज़रूर. शौक था उन दिनों खाली माचिस की डिब्बी के ऊपरी चौकोर भाग को इकट्ठे करने का जिस पर ब्रांड-नाम के साथ चित्र बना होता है.इसे छाप कहते थे. उस वक्त बन्दूक छाप और मुर्गा छाप माचिसें आम मिला करती थीं. इन डिबियाओं की छापें जमा करना प्रिय शगल हुआ करता था जिन्हें इकट्ठे करने के लिए खुर्दबीनी नज़र के साथ काफी आवारा भी होना पड़ता था. इन माचिसी कला नमूनों से एक खेल भी खेला जाता था जिसमें लड़के अपनी छापों को एक समतल धरातल पर इकठ्ठा कर एक पत्थर से उन्हें उनके घेरे से बाहर निकालने का प्रयास करते थे. जिस खिलाड़ी के वार से जितनी छापें बाहर वो उतने का मालिक.हां इन छापों के अंक तय थे.बन्दूक वाली का एक तो मुर्गे के पांच.ये अंक ही हार जीत का फैसला करते थे.

सर पर धूल

असल बात तो ये थी कि ये शौक हमें भटकने का मौका देता था. क्योंकि बेहतरीन नमूने बीनने के लिए अपनी और महल्ले की चौहद्दी को लांघना पड़ता था. ये काम बेशक घर वालों से छुपकर ही होता था. माचिस की छापों का शौक घरवाले निहायत रद्दी मानते थे, क्योंकि घर के बाहर माचिस का इस्तेमाल सिगरेट जलाने में होता था और घरवाले माचिस और सिगरेट की अनूठी दोस्ती से आशंकित रहते थे. इनकी आपस में संगति इतनी पक्की मानते थे कि जहां डिबिया बीनने का शौक हुआ नहीं, वहीं धुंए उड़ाने में देर नहीं लगने वाली. कुछ इस तरह की सोच थी उनकी.पर भटकने का अपना सुख है. एक नियत भूगोल को लांघने का सुख.और लगभग वर्जित क्षेत्र में विचरने जैसा भी.

घर से रेलवे स्टेशन दूर था और माचिस के नए नए नमूने वहीं मिल सकते थे, यानी उसके आसपास की दुकानों में, क्योंकि कई तरह के लोग वहाँ आते थे.ऐसी ही किसी शाम मैं माचिस की खाली डिबियाएं बीनने-ढूँढने के चक्कर में दूर निकल गया और रास्ता भूलता रहा. जितना चलता उतना ही भूलता.जब तक डर शुरू होता तब तक ये भी पता चला कि भटकते भटकते गुम जाने का एक अलग ही नशा होता है. एक अन्जान भूगोल में आना, उस ख़ास समय में अपनी नागरिकता बदल देने जैसा होता है. आपका हर जुड़ाव छिन्न भिन्न हो जाता है.एक अनाम खोज का थ्रिल महसूस होता है.

मुझे अनंत तक के लिए भटक जाने का रूपक बहुत आकर्षित करता है.इसे मैंने महसूस किया काफ़्का की एक कहानी में जिसमें हंटर ग्रैकस को ले जाती मृत्यु-नौका अपना रास्ता भटक जाती है और वो सदियों तक जीवित और मृत के बीच की स्थिति में, इस किनारे से उस किनारे, पार्थिव पानियों में यात्रा करता रहता है. मेरा मानना है भटकन में कितनी ही संभावनाएं और भी खोजी जा सकती है.भटकन में सूखे होठों की प्यास है, भटकन में इन होठों पर फिरती लालसा की जीभ है,अन्जान पानियों की यात्राएं हैं,अज्ञात कंदराओं में गुमशुदगी है, और भटकन में लापता हो जाना है खुद में... और खुद का.



(photograph of a painting by Henri Rousseau,courtesy- wikimedia commons)