Friday, April 24, 2015

तीन रोज़ इश्क़- इस प्रिज़्म से कुछ देखते-दिखते हुए

इस किताब को अनगिनत रंगों  से लिखा गया है। पर इसका कोई भी रंग  हमारे किसी कलर कलेक्शन में नहीं है। हैं इसमें भी हमारे देखे हुए रंगों से मिलते जुलते रंग ,पर वे सिर्फ मिलते जुलते ही हैं। इनकी छटा और चमक स्वप्न के रंगों की है।ये रंग ड्राइंग शीट पर सपाट आकारों में भरे रंग नहीं हैं बल्कि अपने प्रवाह और गतिशीलता से एक सचल संसार की निर्मिति करते है।फिर अपने ही बनाए लोक के बाहर भी अपने गाढ़ेपन के साथ बहते भी रहते हैं. 

ये रंग हमारे गिर्द बहते हैं और हमें आवरित कर लेते हैं।सारे के सारे रंग जिस एक प्राइमरी रंग से निकले हैं वो है प्रेम। एक ही रंग प्रेम में रंगी, 'प्रेम-रंजित' होकर भी किताब एकवर्णी नहीं है, बल्कि यहां पूरा का पूरा विब्ग्योर है। बल्कि उससे भी पहले और परे को भी समाहित करती है ये किताब। 

हर कहानी हमारे सामने एक दुनिया खड़ी करती है और हम उस दुनिया को चमत्कृत से देखते रहते हैं।और देखते देखते हम अपना कोण थोड़ा बदलें तो उस दुनिया के नए ही चित्राम  हमारे सामने उजागर होते हैं।

अपनी रचनात्मकता में ये फंतासीलोक लगता है पर इन्हें छूकर या थोड़ा पलटकर देखें तो इसमें हमारी ही दुनियां नज़र आती हैं।प्रकारांतर से ये हमारी दुनिया पर लेखक का रंगावरण है। यूँ कह सकते हैं कि शायद हमारी अपनी दुनिया अपने स्वप्न में अपने आप को कुछ इस तरह का देखती होगी। इसमें भाषा अपने पूर्ण सौंदर्य के साथ दिखती है.

पूनम के चाँद में आलोकित कोई नदी जैसे किसी जगह बल खाकर अपने में बहती चांदनी को देखती हो। हर कहानी में कुछ कुछ ऐसे ही चाक्षुष बिम्ब लड़ियों में टंगे लगते हैं। और जब हम मानने लगते हैं कि सब कुछ चांदनी में नहाया, रूप-मुग्ध है तो आगे अचानक आई धूप में जैसे हमारी ही दग्ध दुनिया में आगे की कथा लौट आती है।चांदनी और धूप दोनों का दाह बराबर पर तासीर में एक दम भिन्न होने के कारण हम स्वप्न और जाग में डूबते उतराते रहते हैं।

इस किताब में इस तरह की दर्शनीयता का जादू इतना लम्बा है कि हम ये मानते रहते हैं कि कहानियां भले ही छोटी छोटी और अलग अलग हैं पर वे एक मधु-ताल में बहते नीले पात हैं जो मद्धम मद्धम एक ही दिशा में बह रहे हैं।

सब कहानियों पर,खैर ये बात लागू नहीं होती। क्योंकि संग्रह  में कई कहानियों हैं जो अलग अलग समय में लिखी गयीं हैं और इन पर अलग अलग चर्चा और तवज्जो की दरकार है। जो सही में इनके साथ न्याय भी होगा।

आकुल,तड़प से भरा,क्रुद्ध,हिंस्र,डबडबाया,मानवीय,दिव्य,वनैला सब तरह का प्रेम इसके पन्नों पर बिखरा है। कहीं नदी की धार में बहते चाहना के नीले दुपट्टों में असल कहानी के शुरू होने का इंतज़ार है,तो कहीं प्रेम में आत्मपीड़न के तीव्र आवेग को उलीच दिया गया है। कहीं वनगन्ध की स्मृतियों को पुकार है,तो किन्हीं पन्नों पर दवात से लुढ़का पड़ा नीला नास्टैल्जिया है। हम चाँद को यहां कई कई बार सिर्फ छूने लायक फासले पर पाते है। 
कितनी छोटी फिर भी कितने बड़ी हैं कहानियां।तहों को में लिपटी कहानियां। तहों को खोलने के लिए कई कई बार कहानियों को पढ़ना होगा। इन कहानियों की भाषा में भी वैविध्य है। इनमें कुछेक में अंगिका का लालित्य भी है। 

आखरी कहानी इस संग्रह की आखरी कहानी ही हो सकती थी। लेखक कहानियों की मोहिनी रचते रचते इस कहानी के इंद्रजाल में खुद भी आ जाती हैं। एक पात्र की तरह जैसे। खुद लेखक का ही रचा।
एक खूबसूरत, वास्तविक सी लगती दुनिया में लेखक की कलम के पात्र जुड़ जाते हैं और ये सब कुछ इतना सीमलैस है कि रचनाकार के लिए असंभव सा हो जाता है कि वो चयन कर एक परिधि खींच सके। इसमें यही स्वाभाविक है कि जो कुछ रचित है वो भी वास्तविक है क्योंकि उंसकी भी मन पर वैसी ही छाप पड़ती है जो अनुभूत की होती है।

प्रूफ की अशुद्धियाँ अखरतीं नहीं पर इनसे बचा जा सकता था।  

                 

                                

                                           कहानी संग्रह- तीन रोज़ इश्क़ 
                                            लेखक - पूजा उपाध्याय 
                                            प्रकाशक- पेंगुइन इंडिया 
                                 मंगवाने के लिए लिंक्स पर जाएँ-
                                
                                 फ्लिपकार्ट 

                                 अमेज़न
  


Friday, October 17, 2014

हाथ

उसके हाथ बेमेल थे.वे उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाते थे.जहां वो सुंदर सुकुमार सा था, उसके हाथ भद्दे थे.वो अक्सर हँसता नहीं था पर अगर उसे किसी बात पर हंसी आ जाए और उस वक़्त उसे कोई देख ले तो तो यही कहेगा कि कोई बच्चा हंस रहा है.

यद्यपि वो उम्र के लिहाज़ से बच्चा नहीं था.

उम्र उसकी ढलने लग गयी थी.वह अपने पूरे आकार में कोमल प्रतीत होता था.बस उसकी हथेलियां खुरदरी थी.एक बार किसी ने उससे हाथ मिलाने के बाद कहा था कि क्या वो काफी वर्जिश वगैरह करता है.उसने इसका अनुवाद इस तरह मन ही मन में किया कि उसके हाथ मज़दूर के हाथों की तरह सख्त हैं.उसे अपने सख्त हाथों से परेशानी नहीं थी बस उसे इसी बात से तकलीफ थी कि उसके हाथ बेमेल थे. वे बाकी शरीर के साथ असंगत थे.वो कई बार एक हाथ की उँगलियों को दूसरी हथाली के पीछे फेरा करता था.ये स्पर्श उसे सबसे ख़राब प्रतीत होता था.उसे लगता, वो काठ पर पर अपना हाथ फिरा रहा है और ये उसका हाथ नहीं हो सकता.एकदम बेजान हाथ.ऐसा ही दूसरे हाथ के साथ करने पर अहसास होता.

किसी ने इसे चर्म विज्ञानी के नज़रिए से देखा और कहा चमड़ी की कोई अलर्जी है ,किसी ने समुद्र विज्ञानी के नज़रिए से देखकर कहा, ये श्रमजीवी का हाथ है.और कोई इसे कौटुम्बिक लक्षण मानता जो पीढ़ियों से चलकर उस तक आया है, और आगे भी जारी रह सकता है.एक ओझा ने कहा कि इसके मूल में कोई प्राचीन शाप है.उसका दावा था, कि वो बता सकता है कि उसके किसी पूर्वज को क्या करने पर ऐसा शाप दिया गया था और जिसे आने वाली कई संततियों तक चलना था.उसे एक बार लगा कि उसे ओझा को पूछना चाहिए कि उसके पुरखे ने ऐसा क्या कर दिया था जिसका भुगतान उसे अब इतने साल बाद,न जाने कितने साल बाद,करना पड़ रहा है.और क्या मूल शाप अपनी तीव्रता में शक्तिहीन होता गया है या वैसा का वैसा ही है.अगर शाप ने अपनी शक्ति खोयी है तो अपने मौलिक रूप में वो कितना कष्टकारी रहा होगा?वो इसमें दिलचस्पी लेता तो शायद शाप के बारे में और खुलासा हो सकता था पर बिना पूछे ही उस सिद्ध ने इतना और जोड़ दिया था कि ये शाप किसी स्त्री का दिया है. इस बात को जान लेने के बाद उसकी इस बारे में और जानने की रूचि ख़त्म हो गयी.वो किसी भी रूप में अपने दादा का उपहास नहीं होने देना चाहता था.उसकी इच्छा जब इस दिशा के उपाय में थी ही नहीं तो इसमें आगे किसी दिलचस्पी का प्रश्न भी नहीं उठता था. असल में उसे अपने हाथों या कहें हथेलियों से कोई शिकायत नहीं थी. उसकी दिक्कत थी इनकी असंगति से. उसे लगता, उसके हाथ उसके नहीं हैं.  उसके मस्तिष्क से भेजे जाने वाले संदेशों की अनुपालना करने में भी हाथ तत्पर थे,उसके सभी काम वही करते थे,उन्हीं हथेलियों में से किसी एक पर तिल देखकर उसकी प्रेमिका ने कहा था कि ये अच्छे भाग्य का प्रतीक है,इन सब के बावजूद वो अपने हाथों से खुश नहीं था. अपने हीहाथों को लेकर उसकी नाराज़गी जायज़ नहीं थी,उसकी प्रेमिका ने कभी हाथों को लेकर ऐसी टिप्पणी नहीं की थी,यद्यपि उसने ये भी कभी नहीं कहा था कि उसे उसके हाथ कुछ ही खास प्रिय हैं.उसे याद आया कि वो अपनी प्रेमिका का हाथ अपने हाथ में लेना प्रायः स्थगित करता रहा है.वो अपने हाथ उसके कन्धों पर ज़्यादा रखता है.या फिर कटिप्रदेश के गिर्द.पर ये भी तय है कि आप किसी से प्रेम करें और वो आपका हाथ अपने हाथ में न लें,ये हमेशा चलते रहना संभव नहीं है.

वो कुछ कुछ डरने लगा.कहीं प्रेमिका उसके हाथ की वजह से उसे छोड़ न दे.अभी इसकी सम्भावना नहीं थी,बल्कि वो ऐसा सोच भी नहीं सकता था पर आगे प्रेम की सड़क में कितने बल हैं कहा नहीं जा सकता.उसने नारियल का तेल अपनी हथेलियों पर लगाना शुरू कर दिया.फिर भी उसे लगा हाथों का रूखापन गया नहीं है.हथेलियों की त्वचा पगथलियों  की चमड़ी की तरह सख्त ही बनी रही.वो झुंझला कर सोचता भगवान ने मेरी हथेलियां बनाते वक्त गाय के खुर की सामग्री तो काम में नहीं ली.वो ज्यादा मात्र में नारियल के तेल का इस्तेमाल करने लगा.कई एक बार वो जैतून का तेल भी ले आया पर उसे लगा हर लिहाज़ से नारियल का तेल ठीक है.उसकी हथेलियां अतिशय स्नेहन के कारण धूल मिटटी को चिपकाती जातीं और फिर वे गन्दी काली सी नज़र आने लगीं.पर वो हाथ धोकर फिर तेल लगाना नहीं भूलता.उसकी प्रेमिका ने भी इस बात को नोट कर लिया.काफी अरसे तक उसने इशारों इशारों में ऐसा ही कुछ इससे सम्बंधित कह दिया पर कोई औपचारिक शिकायत नहीं की.पर जब उसके सलवार और कुरते पर चीकट लगने लगी तो उसने शिकायत नहीं की,बल्कि वो जोर जोर से रोने लगी.शिकायत की स्थिति को लांघ कर सीधे ही ये आगे की अवस्था में पहुंचना था.उसके इस रुदन में उसे छोड़कर जाने का फैसला भी साफ़ सुनाई  दे रहा था.

अब तक उसके घर में नीले प्लास्टिक का ढेर लग चुका था.जहां देखो वहा नारियल के तेल की शीशियाँ.संकरे मुंह वाली,चौड़े मुंह वाली.छोटी मंझली और बड़ी.सब तरह की.पर उसके हाथ अभी भी मुलायम होने की मांग कर रहे थे.  

Sunday, September 28, 2014

फैरिस व्हील

अक्सर मेलों में उसने देखा था विशालकाय चक्करदार घेरे को.वो, जो ले जाता है लोगों को अपने में बिठा कर.ऊंचे,ख़ूब ऊंचे.इतना ऊंचे कि एकबारगी तो सबसे ऊपर पहुंचे लोग आसमान में कहीं गुम हो गए लगते हैं.पर फिर फिरता फिरता,गोल गोल घूमता,वही चकरा उन्हें नीचे ले आता है.नीचे आकर लोग फिर धीरे धीरे अपने झूलते कमरों में बैठे ऊपर उठते जाते हैं.उनके आरोह और अवरोह का ये क्रम चलता ही जाता है जब तक कि वो बड़ा सा चकरा थम नहीं जाता.ये लोहे का विशालकाय घेरा मेला परिसर में चहल-पहल से थोड़ा हटकर लगा होता है.वैसे उसने अम्यूजमेंट पार्कों में इस घेरे को स्थायी लगे हुए देखा था पर उसकी स्मृति का गोल चकरा मेले में लगा बड़ा व्हील था जो मेला उखड़ने के साथ ही उखड जाता था.कहीं और लगने को. मेले के मैदान से जब लोग शाम की तमाम खरीददारी से निवृत होकर घर लौटने को होते तो उनके साथ आये बच्चों की ज़िद उन्हें थके थके क़दमों के साथ उस विशाल चक्र की तरफ ले आती.शायद इसमें उनके अन्दर के बच्चे की जिद भी कहीं न कहीं शामिल होतीं.

बचपन से अबतक कस्बों और शहरों में मेले लगते उसने देखे हैं.मेलों की सजावट में फर्क बढ़ते देखा है.उसे ठीक ठीक याद नहीं कि उसने सबसे पहले मेलों में इस चक्करदार झूले को कब देखा था.उसे इतना ज़रूर याद है कि जब उसने इसे पहली बार देखा था तब तक वो खासा समझदार जैसा हो गया था. ये भी कोई मेला ही था जो विशाल मैदान  में लगा था.दशहरे पर रावण और उसके सहोदरों के पुतले यहीं जलाये जाते थे.पुतलों के पेट में आग लगने के बाद से कुछ देर चलने वाली आतिशबाजी से आसमान में रौशनी कोंधती रहती थी.और हवा में बारूद की गंध तो बहुत देर तक टंगी रहती.इस दिन के अलावा इस मैदान में कई बार खरीददारी के मेले लगते.वो कई बार इन मेलों में जाता था.अकेला भी.बल्कि अक्सर अकेला ही.ऐसा नहीं था कि मेले कि रौनक उसके इस मेलों में जाने के पीछे बड़ी वजह थी.शुरू में तो वो ज़रूर रौनक के चक्कर में ही जाता था पर बाद में इन मेलों में जाने के पीछे कोई और ही वजह थी.वही लोहे का गोल घेरा.मेले की रौनक से भी वो घेरा बड़ी आसानी से दिख जाता था.मेले वाले इसे लगवाते भी इसीलिए होंगे कि बाहर से आये परदेसी को भी दूर से घेरा देखकर पाता चल जाय कि खरीद का कोई मेला चल रहा है.ये कुछ कुछ बिजली के तारों से टंगे ताश के पत्तों सा था जो दूर से भी हवा में फड़फडाते दिखकर शेरू उस्ताद के गाय छाप दंतमंजन का विज्ञापन करते.गोल घेरा मेले के बिकते तमाम अंजनों-मंजनों का विज्ञापक था.

वो मेले में जाता और चकरे को देखकर खुश हो जाता.फिर तो मेले में जाने के पीछे वजह ही ये व्हील हो गयी थी.

एक बार मेला देखने के बाद जब वो लौटने को था,उसकी नज़र फिर उस विशाल चकरे की तरफ चली गई.मेले में घूमने के दौरान तो उसने कई बार इसे देखा ही था.इस बार उसकी इच्छा हुई कि इसे पास से देखा जाय.वो उस जगह चला गया जहां ये घेरा लगा हुआ था.इस दैत्याकार चक्र को नज़दीक से देखकर उसके अन्दर कुछ बदल गया.उसे लगा उसके अन्दर कुछ चटक गया है.उसे यकीन था कि उसने कोई आवाज़ भी सुनी थी अपने अन्दर कुछ टूटने की.वो उस विशाल घेरे को देखता रहा.उसमें लगे कई सारे छोटे छोटे केबिन,जिनमें लोग बैठे थे.वो देर तक वहां खड़ा रहा.वो घेरा जब घूमने लगा तो उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो उसमें बैठे लोगों को आसमान की सलेटी पपड़ी तोड़ कर अन्तरिक्ष के ठन्डे अँधेरे में फेंक आएगा.पर कुछ ही देर में वो उन्हें नीचे ले आया.चकरा ऐसा ही करता रहा.वो कुछ को ऊपर से नीचे ले आता तो साथ ही साथ कुछ सवारों को अनंत ऊंचाई पर ले जाता.जब ऊपर से लोग नीचे आ जाते तो उसे राहत महसूस होती.वो प्रार्थना करता कि घेरा यहीं रुक जाय.पर वो फिर लोगों को ऊपर की ओर ले जाता.उसे इसमें संदेह भी होने लगा कि ऊपर से वापस नीचे पहुंचे लोग वही हैं जो कुछ देर पहले ही घेरे के साथ ऊपर चढ़ने लगे थे.उसका मानना तो यही था पर उसके भरोसे में ठोस जैसा कुछ नहीं था.क्या ऐसा तो नहीं हो रहा कि ऊपर जाकर ये घेरा उन लोगों को फेंक कर कोई और ही चीज़ इंसानी शक्ल में नीचे पहुंचा रहा हो?'पर इस तरह की सोच का भी कोई आधार नहीं है'-वो सोचने लगता.

उसकी बड़ी इच्छा हुई थी इस व्हील में बैठने की.पर साथ ही एक अजाना सा डर उसके अन्दर पलने लग गया था.हो न हो,उसे लगा,इस डर की वजह कहीं न कहीं उससे ज़रूर है जो उसके अन्दर कहीं बिड़क गया था.उसे लगा ये व्हील असल में उसे ललचा रहा है.ये लगाया गया ही इसलिए है कि उसे ललचा कर अपने में बिठा ले और फिर कभी वापस न ले आये.

वो चक्के में कुछ जिंदा शै देखने लग गया था.कई बार उसने कोशिश की कि मेले में घूम लेने के बाद वो उस चक्के की तरफ देखे ही ना पर बहुत दूर आ जाने के बाद जब वो पीछे मुड़ कर देखता तो वो चक्का उसे ही घूर रहा होता.वो पूरे शहर से दिखाई देता था.उसके घर की छत से भी वो दिखाई देता था.इसका परिणाम आखिर ये हुआ कि बाद में उसने, मेले के दिनों में, छत पर जाना छोड़ दिया था. फिर जब मेला आखिर मेला ही उखड गया तब जाकर वो चक्का भी उखड़ गया.


(हारुकी मुराकामी की किताब 'स्पुतनिक स्वीटहार्ट' में मियु नामकी महिला का ऐसे ही विशाल चक्र के गंडोला में रात पर फंसे रहने का ज़िक्र है.बिग व्हील उसके कैबिन के ऊपर पहुंचते ही रुक जाता है और रात भर वहीं,ऐसे ही रुका रहता है.मियु वहां से दूरबीन के ज़रिये बिलकुल सामने ही दिखते अपने फ्लैट को देखती है.फ्लैट की खुली खिड़की से जो कुछ वो देखती है,वो हतप्रभ रह जाती है.फ्लैट में वो एक वैकल्पिक यथार्थ में खुद अपने को ही ऐसे आदमी के साथ बिस्तर पर देखती है जिसे वो सख्त नापसंद करती है.वो आदमी उसे निर्वस्त्र कर उसके शरीर का भोग करता है.फ्लैट में सोई 'दूसरी वो'उसके इस कृत्य में मूक सहमति सी देती प्रतीत होती है.

फेरिस व्हील में इतने ऊपर से ही वो एक दूसरे आयाम में चलती दुनिया देख पाती है.)

Tuesday, September 2, 2014

गोलगप्पे

उसे मुंह में सुबह से ही कुछ फीका फीका सा महसूस हो रहा था.ज़बान पर एक बेस्वादी सी परत चढ़ी थी.वो जीभ को मुंह में घुमाता,गालों की अंदरूनी दीवारों पर,मसूड़ों पर, नीचे, सब जगह. पर कहीं कोई ज़ायके का अणु नहीं था.यहाँ तक कि तालू पर से भी मिठास ग़ायब थी.उसकी इच्छा हुई कि सिगरेट पी जाय.वो पीता नहीं था.बस कभी कभार ही उसने दोस्तों के साथ  छल्ले उड़ाए थे और हर बार उसे सिगरेट पसंद नहीं आई थी.देर तक सांस के साथ तमाखू की गंध लदी रहती.आज उसके मुंह के इस अजीब से फीकेपन ने ही उसे अन्यथा नापसंद सिगरेट के जैसे विकल्प की ओर सोचने को मजबूर कर दिया था.वो सिगरेट के धुंए से इस फीकेपन को जला देना चाहता था.सिगरेट के ज़रिये ही उसे अपनी स्वादहीनता से लड़ना था, बस इसी वजह से कुछ हिचक सी बाकी थी.ये झिझक कुछ देर और बनी रही और इसका परिणाम ये हुआ कि निर्णय पर पहुँचने से पहले ही उसने इस विकल्प को खारिज कर दिया.उसे लगा इससे शायद बात नहीं बनेगी.वो एक अजीब सा मिक्स बन जाएगा.फीकास में जैसा जला हुआ कोयला रगड़ दिया हो.वो बहुत उत्साहित नहीं हो पाया था और उसने ये विचार छोड़ दिया.

वो चलता जा रहा था.शहर में बिना नक्शा देखे वो कहीं से भी घर पहुँच सकता था. और घर से कहीं भी जा सकता था.शहर उसका देखाभाला था.आज,पर वो शहर में जहां चल रहा था वो उसे जानी पहचानी सड़क नहीं लग रही थी.उसे इसका कारण समझ में नहीं आया.ऐसा उसकी साथ देती याददाश्त में कभी हुआ नहीं था.पर फिलहाल उसका ध्यान इसका विश्लेषण करने पर बिलकुल नहीं था.इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि शहर में वो किस जगह या गली मोहल्ले में चल रहा है.वो कहीं से भी, कभी भी घर पहुँच सकता था.उसे फिलहाल मुंह के बिगड़े जायके से परेशानी थी.ज़बान को जैसे लकवा मार गया था.उसके सारे ऊद्दीपन ख़त्म हो गए थे.

किनारे पर थोड़ी दूर उसे गोलगप्पे का ठेला दिखाई दिया.गोलगप्पों का वो कोई फैन नहीं था.बल्कि कई बार वो इन्हें ओवररेटेड कमोडिटी कहता था.क्या था इनमें?खट्टा-नमकीन द्रव और उसे थामती एक कमज़ोर सी भित्ति.इस तीखे से पानी को स्वादिष्ट तो कैसे कहा जा सकता है?और इसके पतले खोल को भी चबा जाने के पीछे का कारण स्वाद से जुड़ा नहीं हो सकता.बल्कि इसे खाया जा सकता था इसलिए खा लिया जाता था.अगर ये रबर या प्लास्टिक का बना होता तो शायद च्युइंग गम की तरह थूक दिया जाता.
क्यों लोग फिर भी गोलगप्पों के पीछे भागते थे?वो इस तरह के सवाल इसीलिए सोच पा रहा था क्योंकि अगर उसका मुंह इस तरह फीका नहीं होता तो वो गोलगप्पे खाने के बारे में सोचता भी नहीं.गोलगप्पों को लेकर इस हालत में भी उसके मन में द्वंद्व ही था जिसकी परिणति उसके मन में इस तरह के सवालों के रूप में हो रही थी.

वो सोचता जा रहा था कि क्या वजह हो सकती है कि लोग ख़ूब तादाद में 'पानी -पतासों' के पीछे लगे रहते थे और कई बार तो ठेले वाले के आगे पहले दिए जाने को लेकर चिरौरिया तक की जातीं थीं.बहुत वाजिब और ठोस तर्क तो उसके पास नहीं था पर उसका कुल मिलाकर यही सोचना था कि गोलगप्पा मुंह में जाकर एक दम से फूट जाता था और एक तीखा सा हमलावर किस्म का स्वाद सहसा मुंह में छा जाता था.खाने वाला इसी घटना के फिर होने की स्थितिया पैदा करने के लिए एक और खाने की ओर प्रेरित होता होगा.उसके बाद फिर एकऔर.यूँ एक और एक और की स्थितियां बनती रहतीं होंगीं.ये सब स्वाद से ज़्यादा एक खेल का असर छोड़ता था.जैसे ये स्वाद के साथ एक तरह का खेला गया खेल था.

गोलगप्पों का ठेला थोडा हटकर था.ट्रैफिक से हटकर.ठेले के पास खड़े होकर ट्रैफिक को खासी दूरी से ही आवाजाही करते देखा जा सकता था.शाम का वक्त था और अँधेरा ख़ूब जमा हो गया था इसलिए वो गाड़ियों को लाल पीली धारियों में खिंचते या कभी रोशन बिन्दुओं में विखंडित होते देख रहा था.इसमें उसकी दिलचस्पी जल्द ही ख़त्म हो गयी.वो ठेले के आसपास केन्द्रित हो गया.ऊपर पीपल की झुकी हुई डालियाँ थीं.पत्तों पर कहीं से कृत्रिम प्रकाश गिर रहा था.उसने पत्तों में कुछ असामान्य देखा.ये उन पर गिर रही रौशनी की वजह से तो नहीं था.पत्तों से जैसे रंग छूट रहा था.वे जगह जगह से बेरंग हो गए थे.पत्तों पर जैसे अमूर्त सी आकृतियाँ बनी हुई थी.कुल मिलकर ये सब इतना असुंदर था कि उस तरफ देखने का मन ही नहीं करता था.आसपास कहीं भी पीपल का तना नहीं दिख रहा था.शायद पेड़ पास की पुरानी दीवार से सिर्फ टहनियों जितना ही निकला था.दौड़ते भागते हांफते शहर के पास ये जगह कितनी चुप-सी थी?ऊपर से पीपल के पत्तों से झरता सन्नाटा.पुरानी दीवार की दरारों से झांकता बियावान.ठेले वाले की मटकी प्राचीन मृदभांड की ओर इशारा कर रही थी.उसे लगा वो किसी निर्जन ढूह पर खड़ा है.दूर किसी और समय में कोई शहर अपने दिन को ख़त्म कर घर की ओर भाग रहा था.उसके पास भी कम से कम एक आदमी तो और खड़ा ही था.और ये भी कोई कम तसल्लीबख्श नहीं था.