
मैं इस पर कुछ दिन पहले लिखना चाहता था जब विषय वस्तु और चित्रावलियाँ अपने सघन रूप में मौजूद थीं और मन इसी के आस पास टिका था.तब सोच भी बार बार इसी सवाल के गिर्द थी कि सब कुछ भयावह के बावजूद प्रेम यहाँ कितना सुंदर है! धीरे धीरे सरलतर होता हुआ अंततः जिसका रेशमी सूत्र सुंदर और ऋजु होकर हमारे पास रह जाता है.अब फिल्म की कई बातें तभी दिमाग में आएँगी जब इसे फिर से देखा जाएगा पर कथानक की चौहद्दी और उसका असर अभी भी सुरक्षित सा है.
जितना याद रह गया है उसके मुताबिक़ फिल्म ' नेवर लेट मी गो' दो लड़कियों और एक लड़के की कहानी है जो परस्पर प्रेम के त्रिकोण में कैद हैं.ये तीनों बचपन से ही एक रिहायशी स्कूल में पढते हैं जहां बहुत सारे दूसरे बच्चे भी रहते हैं. एक दिन एक टीचर उन्हें बताती है कि वे सब असल में दूसरे लोगों को अपने महत्वपूर्ण अंग दान करने वाले है और उनकी जिंदगी का और कोई मकसद नहीं है. उन्हें इसी लिए दुनिया में लाया गया है ताकि थोड़े बड़े होने पर उनके अंग एक एक कर बीमार लोगों में प्रत्यारोपित किये जा सकें.
वे सब एक नज़रिए से अपने शरीर को शनैःशनैः गिराते किसी भूतहा हिमालय की यात्रा पर है जहां से मृत्यु तक वे एक पूर्व निर्धारित मार्ग से पहुंचेंगे.
इस जानकारी के बाद मृत्युबोध लगातार एक कूबड़ की तरह साथ बना रहता है.दोनों लड़कियों में से एक का प्रेम उदात्त है और दूसरी का ईर्ष्या, अधिकार और जीतने के भाव वाला.इस तरह ये असल में त्रिकोण न होकर एक जटिल ताना बना है जो अपने सरलतम रूप में तभी आ पाता है जब देह अंग विहीन होती छीजने लगती है.आखिर में एक लड़की अपना अधिकार ईर्ष्या और जय सब छोड़ देती है और बाकी दो विशुद्ध प्रेम में आतें हैं और पहली बार मृत्यु के आयत से बाहर आने के लिए असफल प्रयास करतें है.
इस कल्पित दुनिया में जीने वालों के लिए भी बेहतर जीवन के साधनों की आकांक्षा नहीं पनपती. जो सहज रूप में उनमें उपजता है वो है प्रेम. हम नहीं जानते कि जिनकी देह एक विराट प्रयोग का हिस्सा भर है और आत्मा सिर्फ मृत्यु बोध से भारी उनमें प्रेम किस तरह आता है पर फिल्म बताती है या ये कल्पना करती है कि उनमें भी प्रेम सहजता से आ सकता है. जटिल समाजों से उपजी स्मृतियों के बिना भी प्रेम अपने गुम्फित ताने बाने के पूरे लाव लश्कर के साथ आ सकता है. और वो आखिर में जीवन की तीव्र लालसा पैदा करता है. वो जीवन मांगता है. 'मृत्यु के साथ और उसके बाद भी' वाला किताबी प्रेम यहाँ खारिज है. उसे जीवन चाहिए लंबा नहीं पर भरा भरा सा.
जितना याद रह गया है उसके मुताबिक़ फिल्म ' नेवर लेट मी गो' दो लड़कियों और एक लड़के की कहानी है जो परस्पर प्रेम के त्रिकोण में कैद हैं.ये तीनों बचपन से ही एक रिहायशी स्कूल में पढते हैं जहां बहुत सारे दूसरे बच्चे भी रहते हैं. एक दिन एक टीचर उन्हें बताती है कि वे सब असल में दूसरे लोगों को अपने महत्वपूर्ण अंग दान करने वाले है और उनकी जिंदगी का और कोई मकसद नहीं है. उन्हें इसी लिए दुनिया में लाया गया है ताकि थोड़े बड़े होने पर उनके अंग एक एक कर बीमार लोगों में प्रत्यारोपित किये जा सकें.
वे सब एक नज़रिए से अपने शरीर को शनैःशनैः गिराते किसी भूतहा हिमालय की यात्रा पर है जहां से मृत्यु तक वे एक पूर्व निर्धारित मार्ग से पहुंचेंगे.
इस जानकारी के बाद मृत्युबोध लगातार एक कूबड़ की तरह साथ बना रहता है.दोनों लड़कियों में से एक का प्रेम उदात्त है और दूसरी का ईर्ष्या, अधिकार और जीतने के भाव वाला.इस तरह ये असल में त्रिकोण न होकर एक जटिल ताना बना है जो अपने सरलतम रूप में तभी आ पाता है जब देह अंग विहीन होती छीजने लगती है.आखिर में एक लड़की अपना अधिकार ईर्ष्या और जय सब छोड़ देती है और बाकी दो विशुद्ध प्रेम में आतें हैं और पहली बार मृत्यु के आयत से बाहर आने के लिए असफल प्रयास करतें है.
इस कल्पित दुनिया में जीने वालों के लिए भी बेहतर जीवन के साधनों की आकांक्षा नहीं पनपती. जो सहज रूप में उनमें उपजता है वो है प्रेम. हम नहीं जानते कि जिनकी देह एक विराट प्रयोग का हिस्सा भर है और आत्मा सिर्फ मृत्यु बोध से भारी उनमें प्रेम किस तरह आता है पर फिल्म बताती है या ये कल्पना करती है कि उनमें भी प्रेम सहजता से आ सकता है. जटिल समाजों से उपजी स्मृतियों के बिना भी प्रेम अपने गुम्फित ताने बाने के पूरे लाव लश्कर के साथ आ सकता है. और वो आखिर में जीवन की तीव्र लालसा पैदा करता है. वो जीवन मांगता है. 'मृत्यु के साथ और उसके बाद भी' वाला किताबी प्रेम यहाँ खारिज है. उसे जीवन चाहिए लंबा नहीं पर भरा भरा सा.

