Tuesday, February 19, 2013

लॉस्ट

हमेशा साथ रहने वाले भाई,बहन पिताजी अम्मा और करीबी दोस्त.किसी को याद नहीं.खुद उसे भी नहीं कि एक कमरा हुआ करता है जिसके झरोखे से वो नीचे झाँक सकता है और आते जाते लोगों को देख सकता है. कमरा लकड़ी के कुछ खम्भों से बने मंदिर का हिस्सा है. उस मंदिर की चार दीवारी के ठीक अन्दर एक नाटा केले का झाड़ है जिसमें मूंग फली जितने केले लगे हैं और जो कभी बड़े नहीं होते. मंदिर से बाहर गाँव की गली है जिसके ख़त्म होने पर एक कीचड़ से भरा तालाब है.इस तरह एक पूरा लैंडस्केप उस रील पर घूमता है जो बंद पड़े प्रोजेक्टर के पास धूल खाए ढेर के रूप में पड़ी है. यादों का जंकयार्ड भी बहुत बड़ा होता है और इसमें कुछ जंग खाया भंगार तो ऐसा होता है जो हमेशा अ-साझा ही रह जाता है.

ये पूरा भूदृश्य उसकी याद में कभी था भी तो जैसे सिर्फ क्लिफ से ही टंगा भर था और अब तो वो कब का कई फीट गहरे खड्ड में गिर चुका था.रोज़मर्रा के याद रखे जाने वाले कामों का परास धीरे धीरे इतना बढ़ता गया कि इसने एक दिन मूंगफलीनुमा केलों को क्लिफ से धकेल दिया.इन्हें वापस लाना किसी बेहद गहरे कुँए से पानी का एक लोटा खींचने जैसा था बल्कि उससे भी मुश्किल.सदियों में एक बार कभी किसी ख़ास नक्षत्र में सूर्य उसके स्मृति- खड्ड में सीधा चमकता तभी वो लैंडस्केप उसके सामने उद्घाटित हो सकता था.एक ब्रह्मांडीय टॉर्च चाहिए थी. पर जैसे रात में ४० वोल्ट के पीले बल्ब में बुझते और सुबह बीड़ी के साथ खांसते किसी क़स्बे के पुराने टीले से फट पड़ता है किसी दिन कोई उससे पुराना उससे बड़ा और वैभवशाली शहर बिना किसी कुदाल या गेंती के चले,वैसे ही एक बार उसका अपना पूरा गाँव उसे मिल गया.ये कैसे हुआ इसका ठीक ठीक पता नहीं. इन दिनों के मेन मार्किट में बने मंदिर के बाहर बिकते फूलों में से कोई ख़ास रंग का फूल दिख गया या किसी चैनल पर दिखा हरा सांप था इसकी वजह, कह नहीं सकते. जो भी हो पर उसे याद आने से ज़्यादा जैसे अपना हारा हुआ,छूटा हुआ इलाका ही मिल गया हो और साथ में वो तमाम चीज़ें भी.

उस गाँव के घरों पर इतनी धूल चढ़ी रहती थीं कि वे दूर से देखने पर दीमक के मृतिका-दुर्ग नज़र आते थे.मंदिर की लकड़ियों का बड़ा हिस्सा बुरादे के रूप में बुहारा जा चुका था.इसकी चौहद्दी के भीतर अक्सर एक हरा सांप दिखाई देता था जो उसी वक्त गुम भी हो जाता था.कमरे के झरोखे से नीचे उसे मंदिर में आते छोटे छोटे लोग दीखते थे.शायद झरोखा काफी ऊंचा था या लोग ही ठिगने थे.केले का नाटा झाड़ नीचे उतरकर देखने से भी नाटा ही नज़र आता था.इसलिए शुबहा था कि लोग भी नीचे उतरकर देखने से ठिगने ही दीखते हों.

वो हुआ करता था कभी यहाँ, पर अब ये जगह उसकी स्मृतियों से परित्यक्त थी.इस तरह कि उसका ज़िक्र भी नहीं था कहीं.पूर्वजन्म में घटी किसी घटना की तरह ही घटी थी ये जगह उसके जीवन में जैसे.

Sunday, January 13, 2013

चक्कियों से आबाद एक इलाका


उस इलाके में आटा चक्कियों की भरमार थी.मुख्य मार्ग पर आटा उड़ाती चक्कियां.गली के नुक्कड़ पर चक्कियां.गली के अन्दर चक्कियां.पिसाई का दाम दो रूपया प्रति किलो.सब्ज़ी का कोई इक्का दुक्का ठेला ही नज़र आता था और वो भी उसे धकेलने वाले की तरह ही उदास, लड़खड़ाता सा चलता था.बहुत याद आने पर ही सब्ज़ी वाला अल्युमिनियम के जग से सब्जियों पर छींटे डालता था.शायद कुम्हलाई हरी भाजी में कहीं से रौनक लौट आये.इलाके की गलियों से वो बिना किसी को आवाज़ दिए चक्कर काटता रहता था.
किसी प्रेत बाधा से ग्रस्त सब्ज़ी का ठेला जैसे किसी अभिशाप के पूरा होने के इंतज़ार में था.

सोचा नहीं था कि क्या वज़ह थी उस इलाके में असंख्य आटा चक्कियों की.शायद उधर लोग पैक्ड आटा नहीं खाते थे.शायद उनके घर में घरेलू आटा चक्की नहीं थी.शायद वे लोग सिर्फ रोटियाँ ही खाते थे.शायद वे लोग सब्ज़ी नहीं खाते थे.या शायद वे लोग रोटी दूध या फिर दही से खाते थे.जो भी हो मुझे इनमें कोई भी कारण विलक्षण प्रतीत नहीं होता था.समाज शायद अन्न प्रधान था.अन्न प्राशन संस्कार से ही वे आटा खाते आ रहे थे.आटे को लेकर उनमें अद्भुत पाचन क्षमता थी.

इलाका फ्लोर मिलों के उड़ते आटे से धूसर बना रहता था.लोगों के सर पर गेहूं का पाउडर सवार रहता था.गलियों से आटे के परदे से गुज़रती, गणवेश में सजी  बालिकाएं साइकिलों पर स्कूल जाती दिखाई देतीं थीं.फ्लोर मिलों पर काम करने वाले लोग गर्म आटे के धुंए में लिपटे चक्की के आटा उगलने वाले कपडे को झाड़ते नज़र आते. वे कम बोलते पर बोलते तो उनके मुंह से भी आटा ही उड़ता.

ऐसा नहीं है कि इन चक्कियों में सूखे आटे से भरे डिब्बे ही रहते थे.यहाँ मसालों,खासकर सूखी लाल मिर्च भी पीसी जाती थी. कुछ के बाहर अनगढ़ अक्षरों में लिखा रहता था कि वहां गीली दाल भी पीसी जाती थी.पर चक्कियां जानी जाती थीं अन्न की पिसाई के लिए. भागते मोटे कैनवास के बेल्ट और मशीन के पेट में पत्थर की पेषणी अपनी घर्राती चाल में सूखे बीजों को पल भर में पीस कर उड़ा देतीं.चक्की की भारी आवाज़ भरोसा जगाती थी.जब इसके उदर में दाने ख़त्म हो जाते तो ये आकुल होकर कुछ अलग ही स्वर पैदा करने लगती.चक्की वाला तुरंत कोई नया डिब्बा इसमें खाली कर देता.इनके पास खड़े होकर अपने गेहूं के आटे का इंतज़ार कुछ कुछ मोहक दृश्य में तब्दील हो जाता.पड़ौस से कोई औरत अपनी ओढनी को संभाल कर अपने गेहूं के डिब्बे को चक्की वाले के पास ले आती.चक्की वाला उसे उतरवाकर सीधा बड़े से तराजू में रख देता.और तौल के बाद अपनें कान के पीछे से पेन की रिफिल निकाल कर एक पर्ची पर वज़न लिखकर भद्रा को पकड़ा देता.पीछे पेषणी निर्विकार भाव से गेहूं के दानों को मसल कर फेंकती रहती.कभी कभी लगता कि जैसे ही चक्की वाला अपना ध्यान पेषणी के अन्न-पात्र से हटा कर ग्राहक की तरफ लगाता तो चक्की और तेज़ रफ़्तार से अपना काम करने लगती.अपनी क्षणिक उपेक्षा का दाह उसके कलेजे को जलाता और वो किसी कुढ़न में अपनी समूची ताकत उस अन्न पर झोंक देती.

इलाके में चक्कियों के चतुर्दिक शोर और वातावरण में हर तरफ तैरते पिसे अन्न-कणों के बावजूद वो, आज तीसरा दिन था जब हाथ में पांच किलो बाजरा लिए पिसवाने के लिए मारा मारा फिर रहा था.उसे बचपन का एक धुंधला दृश्य याद था जब एक मेहमान ने अपने स्वागत में बनी गेहूं की रोटी खाने से इसलिए मना कर दिया था कि उसे बाजरे का सोगरा खाये बिना रंजता नहीं था.तब तक बाजरे ने घर की रसोई से अपनी जगह गंवाई नहीं थी.पर संघर्ष तब भी शुरू हो चुका था.रसोई में बाजरे की आटे से भरा टीन का डिब्बा अपने वर्गाकार स्थान के लिए भारी लड़ाई लड़  रहा था.और ये लड़ाई रसोई से बाहर निर्णायक साबित हो चुकी थी.अब तो खैर सिर्फ देहात ही बाजरे की अंतिम शरण स्थली रह गए थे. कसबे और मारवाड़ के थोड़े बड़े कहे जाने वाले शहर बाजरे को विदाई दे चुके थे. पर यूँ उसके जैसे लोग तो आज भी बहुत थे जो सर्दियों में कुछ दिन बाजरी की रोटी खाना पसंद करते थे.ये शौकिया लोगों का वो वर्ग था जो बाजरे को एक एग्ज़ोटिक भोज्य पदार्थ की तरह ज़्यादा इस्तेमाल करते थे,उनके लिए बाजरा सांस लेने की तरह सहज और ज़रूरी नहीं था. 

उसके दोस्त ने गाँव से उसके लिए आठ-दसेक किलो बाजरा भेजा था.बारिश के बाद का पका हुआ.देसी.छोटे छोटे पीताभ दानों वाला.और उसमें से थोड़ा बचा कर, बाकी का एक डिब्बे में लिए तीन दिन हुए वो चक्कियों से आबाद इलाके में पिसवाने के लिए फेरी पर फेरी दिए जा रहा था. चक्कियों पर बाजरा हर वक्त नहीं पीसा जाता.जब कई डिब्बे जमा हो जाते तभी चक्की में बाजरा डाला जाता.बाजरा खाना लोगों के लिए शौक था और चक्कियां सिर्फ शौक पूरा करने के लिए लगाई नहीं जाती.परसों अमावस थी.पिसवाने के लिए बाजरा ले जाने वाला वो अकेला ही था क्योंकि चक्की वाले ने कहा था,आज बाजरा कोई नहीं लाया.उसने अंदाज़ लगाया कि लोग अमावस को शायद बाजरा नहीं पिसवाते होंगे.उसे वापस आना पड़ा.कल फिर वो अपना डिब्बा लिए आटा उड़ाती किसी फ्लोर मिल पर गया.कोई भी खड़े खड़े पीस कर देने को तैयार नहीं हुआ.गेहूं पर बाजरी या बाजरी पर गेहूं नहीं पीसे जाते.शाम को आना.अभी डिब्बा रख जाओ.कुछ इस तरह की बातें की गयीं.डिब्बा रख जाना उसे यूँ मंज़ूर नहीं था कि वो चाहता था पिसाई उसके सामने हो.क्या पता उसे बाद में जो आटा मिले वो मोटे गोल दानों वाला फीका संकर बाजरा हो.चक्की वालों को वो हमेशा शक की नज़र से देखता था.इस मामले में कि वे आपके अनाज से निकले आटे में से कटौती तो करते ही है,कोई दूसरा आटा भी पकड़ा सकतें है या दूसरे आटे की मिलावट कर सकते है.उसे सिर्फ चक्की पर भरोसा था.एक बार घूमना शुरू हो तो फिर सारी ज़िम्मेदारी वो अपने कन्धों पर ले लेती थी.

तो आज तीसरा दिन था और वो फिर किसी चक्की पर खडा था.   

Friday, December 7, 2012

शुभ्र ढलान पर लाल तारा


उसे इस सीज़न का स्वेटर पहने एक हफ़्ता हो चुका था.आज सुबह जब उसकी नज़र स्वेटर की सफ़ेद पट्टियों पर पड़ी जो जगह जगह से ज़ंग खाइ लगने लगीं थीं तो याद आया कि बाज़ार से वो ईज़ी लाना पिछले तीन चार दिन से भूल रहा है. चीज़ें उसे इस तरह से ही याद आतीं थीं.सर पर गिर कर.ठीक उसी वक्त उसे याद आया कि कॉलोनी में पिछले सात दिन से लक्ष्मीनारायण दिखा नहीं है और आज तीसरा दिन है जब उसने सोचा था कि इस बारे में वो किसी कॉलोनी वाले से पूछेगा. लक्ष्मीनारायण उसके ही दफ्तर में चपरासी था और यूँ कॉलोनी का पुरोहित भी. उस तैंतीस घरों की वॉल्ड बस्ती के धार्मिक आयोजनों में कर्मकांडों को वो बड़ी दक्षता से सरलीकृत कर देता था.शक्ल से वो टीबी जैसी किसी बीमारी का मरीज़ भले ही लगता था पर असल में उसे कर्ज़े खाए जा रहे थे.एक दुसरे पर समकोण में और एक दुसरे के समानांतर कुछ अस्थियाँ उसके व्यक्तित्व की मूल ज्यामिति बनाए रख रही थीं.

उसने सोचा आज ही लक्ष्मी के बारे में किसी से पूछेगा पर तभी मोबाइल की घंटी बजी और उसे फिर इसी बहाने याद आया कि सुबह ही उसकी गर्ल फ्रेंड ने फोन पर बताया था कि आज शाम वो उसे उसके दफ्तर के बाहर मिले.ये डेट जैसा ही कुछ था, उसने सोचा.साथ ही लडकी ने ये भी कहा था कि पक्का तो वो शाम पांच बजे फोन करके ही बता पाएगी. इस फुटनोट के बाद उसका आकलन ये था कि डेट वाली बात को भूल जाना चाहिए क्योंकि उसका फ़ोन नहीं आने वाला था.ऐसा कई बार हो चुका था.ये रिश्ता लगभग ख़त्म होने वाला ही था.इसके बने रहने का कारण था कि कोई भी नीच या घटिया नही होना चाहता था.वैसे वो उसे पसंद करता था पर इस पसंद करने का वो क्या करने वाला था इस बारे में वो श्योर नहीं था.वो कई बार लड़की की गर्दन के पीछे लाल मस्से को लेकर भावुक हो जाया करता था.काले मस्से को वो अनाकर्षक मानता था पर उसकी नज़र में उसके दूधिया शरीर पर लाल मस्सा बहुत फबता था.एक शुभ्र ढलान में लाल तारे की तरह चमकता था वो दैवीय सा निशान.इससे उसे लगता था कि लड़की कोई क्लोन नहीं बल्कि विशिष्ट है,अपने में अनूठी.कुछ दुर्लभ आत्मीय क्षणों में जब वो उसकी गर्दन के पास अपना मुंह ले जाता था,लड़की समझ रही होती कि वो उसे चूम रहा है, दरअसल वो लाल मस्सा देख रहा होता था.लाल मस्से को देख कर वो खासा वर्कड अपभी हो जाता था और ये ठीक भी था. इसे लड़की उस वक्त की वाजिब प्रतिक्रिया ही समझती थी.

पर आज शाम उसके फोन कर डेट को पक्का करने की बात को याद रखने की कोई वजह रही नहीं थी.उसके इन दिनों के फ़ोन कॉल्स पर उसने हूँ हाँ की अन्यमनस्क प्रतिक्रिया ही दी थी.दोनों की तरफ से फ़ोन पर बात करना आवाज़ देने,पुकारने की ऐसी रस्म अदायगी जैसा था जिसमें ये डर भी शामिल था कि दूसरा कहीं सुन न ले.

अभी जो घंटी बजी थी उसमें सामने अनिल था.उसका खासा पुराना दोस्त.उसे याद नहीं था कि आखरी बार अनिल से बात कब हुई थी.इसे हफ्तों, महीनों या सालों में नहीं देखा जा सकता था.बस इतना था कि एक प्राचीन धूल उनके बीच में थी.एक लम्बी अजनबियत उनकी पुरानी दोस्ती पर पसरी हुई थी.जैसे किसी पहचाने रास्ते पर बरसों बाद चलने पर लगता डर.एक सहमापन.ठिठकते जाना.

फ़ोन पर अनिल की आवाज़ में भी खरखराहट थी.धूल खाए कैसेट से बजती कोई रिकार्डेड आवाज़.अनिल ने बातचीत में शाम को साथ में फिल्म देखने का प्रस्ताव दे डाला.उसके पास इसे मानने के अलावा शायद कोई विकल्प नहीं था क्योंकि उस वक्त वो ये जांचने में ज़्यादा लगा था कि फ़ोन पर कहीं उस शख्स की बरसों पुरानी फीते पर अंकित आवाज़ तो नहीं है जिसे इस दुनिया से रुखसत हुए ज़माना बीत गया है.

वो सोचने लगा कि मल्टीस्क्रीन की लिफ्ट के पास जब वो उसे देखेगा तो कैसा दिखेगा.कुरेदकर उसने अनिल का चेहरा याद किया.उसका चेहरा एक शिशु का था.या एक शर्मीली लड़की जैसा.स्त्रियोचित सुन्दरता से भरा.हलकी मूंछें उसके होठों पर ऐसे लगती जैसे किसी बच्चे ने नकली मूंछे चिपका ली हो.उसे स्वभावतः गुस्सा बहुत आता था पर स्वाभाविक नहीं लगता था उसके चेहरे पर.

शाम ही थी ये.कुछ जल्दी हो गयी थी पर शाम ही थी.अपने स्कूटी यान पर वो सिनेमा के लिए जा रहा था.चौराहे पर घर लौटने वाले व्यग्र खड़े थे.लाल बत्ती उन्हें कुछ पलों के लिए थामे खड़ी थी.हवा में धुंए के छर्रे आँखों में चुभ रहे थे.अपने व्यस्ततम समय पर ये शहर का सबसे व्यस्ततम चौराहा था.मैकडोनाल्ड वाला बर्गर के साथ यहाँ आलू टिक्की भी बेच रहा था. समोसों में ढलते रोज़ टनों मैदे को चाटने से इस शहर का पाचन बिगड़ चुका था.सेक्स क्लिनिक्स के नाम पट्ट फीके पड़ रहे थे, फर्टिलिटी क्लिनिक्स की बाढ़ थी.एक दिवंगत नेता की पुष्पमाल उछालते प्रतिमा इन सबसे से उदासीन थी.


हरी बत्ती हो गयी थी और वो फिर अपने यान पर चलायमान था.सिनेमा कुछ ही दूर था.उसने मन में सोचा कि बेसमेंट पार्किंग में जब वो स्कूटी पार्क करके लिफ्ट की तरफ बढेगा तो वो लोहे का कमरा कितना ठंडा और अपरिचय से भरा होगा.क्या अनिल के शिशुवत चेहरे की गर्मी उस शीत में राहत दे पायेगी?

Friday, November 9, 2012

किशोर चौधरी का कहानी-संग्रह---'चौराहे पर सीढियां'


किशोर चौधरी का पहला कहानी संग्रह चौराहे पर सीढियां बस आने ही वाला है.इसमें कुल चौदह कहानियां है,जिनमें से एक कहानी चौराहे पर सीढियां भी है.संग्रह के उपलब्ध होने से पहले कहानियों पर बात करने का अधिकार लेखक के पास ही होता है और ख़ास कर जबकि लगभग सारी ही कहानियां मुद्रित रूप में पहली बार सामने इसी संग्रह के ज़रिये आयेंगी, इन पर कुछ कहा भी कैसे जा सकता है? पर शायद ये कहना एकदम ठीक नहीं होगा.यहाँ स्थिति ऐन ऐसी नहीं है. सारी की सारी कहानियां किशोर जी के ब्लॉग के ज़रिये हम सब के पास बैठ चुकी हैं, बतिया चुकी हैं और कुछ तो अब तक हमारे आस पास ही हैं.इसलिए कहानियां या कहानियों के ड्राफ्ट पाठक पहले ही पढ़ चुके हैं. और मैं मित्रता के अधिकारवश भी कहना चाहूँगा कि परंपरा में मिली किस्सागोई,स्थानीय मुहावरे और परिवेश से ठेठ देसीपन को सुरक्षित रखते हुए किशोर की कहानियों का संसार विशिष्ट रूप से मौलिक है.

वे जटिल मनोभावों और उनकी ऊहापोह के शिल्पी हैं.
उनके यहाँ अमूर्त भाव भी छुए जा सकते हैं,वे कई रंगों में रंगे हैं,उन्हें कभी किसी कोने में तो कभी एकदम सामने देखा जा सकता है.लगता है जैसे वे टोकरी में पड़े फल हैं...  

इस अति संकोची और विनम्र कहानीकार के पहले संग्रह पर मेरी बधाई और ढेर सारी  शुभकामनाएं. संग्रह के आने के बारे में अब पर्याप्त संख्या में लोग जानते हैं इसलिए इसके हाथों हाथ लिए जाने पर कोई संदेह नहीं है.एक समय वो भी था जब भाई किशोर कहानियों को जिल्द रूप में लाने को लेकर खासे अनमने थे पर मुझ सहित कई लोगों की जिद कुछ ऐसी थी कि वो आखिर अपने ब्लॉग की कहानियों पर कुछ परिश्रम करने को तैयार हो गए. हिन्द युग्म, जो किशोर जी का ये कथा-संग्रह आपके सामने ला रहा है बधाई और धन्यवाद का पात्र है.शैलेश जी के अथक प्रयत्न हमारे सामने हैं,आने वाले हैं.विशेष आभार शैलेश जी.

ये मेरा परम सौभाग्य है कि किशोर जी ने कहानियों पर जो दुबारा काम किया, जो जोड़ा घटाया उसे शब्दशः मुझे मेल द्वारा बताया,जिसकी वैसे कतई ज़रुरत नहीं थी क्योंकि मैं उनके गणितीय परफेक्शन में क्या और गुणात्मक जोड़ पाता?

बस मैं इतनी ही कामना जोड़ रहा हूँ कि चौराहे पर सीढियांकथा संग्रह भरपूर पढ़ा जाय.उसकी खूब चर्चा हो और आगामी कई ऐसे संग्रहों के ज़रिये किशोर जी की कहानियां हमें पढने को मिलतीं रहें.

हिन्द-युग्म से प्रकाशित हो रही इस कथा पुस्तक की कीमत सिर्फ ९५ रुपये है.इसे यहाँ से विशेष छूट के साथ मंगवाया जा सकता है.