Wednesday, September 26, 2018

इंडियन स्पाइसेज़




(1)

वो ज़्यादातर चुप रहता था. इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता था किउसकी आदत कम बोलने की थी या उसे ज्यादा बोलना पसंद नहीं था . एक बात जो काफी भरोसे के साथ कही जा सकती थी कि उसके भीतर बोलने को लेकर कोई हिचक या संकोच जैसी बात नहीं थी. उसके चेहरे पर एक खास तरह की दृढ़ता थी. वो शर्मीला कतई नहीं लगता था. उसका चेहरा काफी बड़ा था. उसके चेहरे के भूगोल का बड़ा हिस्सा रूखा, भावहीन और सपाट था. एक निर्जन समतल मैदान की तरह. अगर किसी तरह के भाव उसके चेहरे पर होते तो वे ज़रूर दिखते और कहीं से आकर उभरते तो भी दिखते. चेहरे पर कोई भी हलचल नुमाया हुए बिना नहीं रह सकती थी. वो भावहीन चुप्पा किस्म का इन्सान था.

मैंने पहली बार उसे टिफिन सेंटर की कुर्सी पर बैठे देखा था. ये कोई कॉर्पोरेट ऑफिस नहीं था इसलिए उसकी कुर्सी और उसके गिर्द के परिवेश में कोई नफासत नहीं थी. जहाँ रोटियाँ बन रहीं थी उस जगह और सब्ज़ी दाल के बड़े भगौनों के पास का खांचा उसका ऑफिस स्पेस था. एक कुर्सी रखे जाने जितनी जगह. पर ये जगह उसने अपने लिए खुद मुक़र्रर की थी. वो ही इस टिफ़िन सेंटर का मलिक और एकमात्र मैनेजर संचालक जैसा कुछ था. इस तरह के किसी नामकरण को लेकर उसकी कोई चेष्टा नहीं थी. आसपास रहने वाले विद्यार्थी और सेल्समैन - मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव के कमरों में यहीं से टिफ़िन में खाना पहुँचाया जाता था. कई अनियमित ग्राहक यहाँ ख़ुद आकर भी खाना पैक करवाकर ले जाते थे. ये संचालक की कुछ वक़्त पहले जगी महत्वाकांक्षा लगती थी कि उसने अपने टिफ़िन सेंटर में अतिरिक्त स्पेस निकाल कर टेबलें लगवा ली थीं. ताकि ग्राहक सीधे गरमागरम खाने को उसी जगह भोग लगाने बैठ सकें. इस तरह ये टिफ़िन सेंटर और रेस्टोरेंट का हाइब्रिड मॉडल था. अपने लिए उसने इन्हीं सब वजहों से कुछ ख़ास जगह नहीं छोड़ रखी थी. उसे इसकी दरकार भी नहीं थी. उसके मिज़ाज को भी नहीं.

उसकी बगल में गैस के एक बड़े से चूल्हे पर दो एक लोग रोटी बनाने का काम करते थे और पीछे एक आदमी टिफ़िन पैक करने का काम करता था. उसके पास ही एल्युमीनियम के भगौनों में दाल और सब्जियां रखी होती थीं जिन्हें वो पॉलिथीन की थैलियों में माप के अनुसार डालने का काम करता था. रोटी दाल सब्जी के अलावा एक कम्पलीट टिफ़िन में थोडा कच्चा प्याज़, कटा हुआ आधा नीम्बू और आधा पापड़ भी शामिल था. नियमित रूप से टिफ़िन मंगवाने वाले के लिए कम पैसे में ये एक्स्ट्रा चीज़ें सेंटर मालिक की तरफ से उदार होकर दिए जाने वाले तोहफ़े थे. यहाँ अचार का ज़िक्र रह गया, वो भी टिफ़िन में उपलब्ध होने वाले तोहफों में शामिल था.

रोटियाँ बेलने और सेकने वाले लोगों और टिफ़िन पैक करने वाले स्टाफ़ के बीच भी यदा कदा ही कोई संवाद होता था. ज़्यादातर ग्राहक नियमित थे. ज़्यादातर कस्टमर ऐसे थे जो इस जगह से किसी न किसी रूप में जुड़े थे और अपरिचित नहीं रह गए थे. पर कभी कभार कोई बिलकुल नया बन्दा यहाँ आता तो संचालक से अपेक्षा थी कि वो व्यवसाय सुलभ मुस्कान से उनका स्वागत करता. पर ये बिलकुल अलग ही किस्म की मितव्ययिता थी.
वो ग्राहक के आर्डर को लगभग मशीनी अंदाज़ में लेता. ग्राहक खाने के बारे में कहता जैसे कि - ' एक खाना पैक करके दीजिये'. इस पर वो कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं देता और पीछे खड़ा आदमी उसके आर्डर पर पैकिंग शुरू कर देता. स्टाफ के लिए ग्राहक के आर्डर पर मालिक की प्रतिक्रिया से ज्यादा उसकी पवित्र उपस्थिति भर ही अनिवार्य होती थी. मालिक का काम पैसे लेने का ज़रूर होता.

मालिक, स्टाफ और उपस्थित ग्राहकों में एक हैरान कर देने वाला रिश्ता पूरे समय बना रहता था. ये सब मिलकर एक मशीन बना रहे थे जिसके पुर्जे अलग अलग समय में हिलते थे पर उनमें तारतम्य पूरा दिखाई पड़ता था.
मालिक फिर भी कुछ हद तक एक मज़ेदार आदमी था. वो कम से कम एक बार मुस्कुराया था. एक ग्राहक ने ये बात इस दावे के साथ बताई कि इसे लगभग प्रमाण के तौर पर शुमार किया जा सकता है. ग्राहक ने पैसे दिए. उसने पैसे लिए और गिने. गिनने के बाद और उसके किसी और काम में व्यस्त होने के बीच के बारीक अंतराल में ग्राहक ने धन्यवाद कहा. इस अनपेक्षित अभिवादन पर वो शिष्टाचार वश आधा अधूरा मुस्कुरा दिया था.

कुछ था यहाँ कि यहाँ एक बार आया आदमी लौट कर ज़रूर आता था.

(2)

उस लड़के का सारा खेल ठेले पर चलता था. वो चायनीज़ का ठेला था. मंचूरियन ड्राई और विथ ग्रेवी में उसे महारत जैसी हासिल थी. लोगों की फरमाइश का वो ध्यान रखता था. जैसे कोई कहता बहुत स्पाइसी बनाना तो वो आग परोसता था, कोई कहता बच्चों के हिसाब से ज्यादा तीखा नहीं तो वो उस तरह कस्टमाइज कर तैयार करता था. उसकी उम्र ज्यादा नहीं थी. और वो नेपाली नहीं था. उसके ठेले का नाम कोई स्थानीय देवी के नाम पर था. उसके साथ चायनीज़ जुड़ना थोड़ा अलग लगता था. पर नाम पर कौन गौर करता था. एक भीड़ उस लड़के के भरोसे जुटी रहती थी. शाम को उसका ठेला लगते ही लोगों का उसके ठेले पर मंडराना शुरू हो जाता था. कई वहां बैठ कर या खड़े खड़े ही ज़ायके का लुत्फ़ लेते, कई अपने बच्चों के लिए पैक करवा कर घर ले जाते. कई अपनी प्रेमिकाओं के साथ उनकी ख़ास माइश पर वहां आते.

लड़के के हाथों में ग़ज़ब की फुर्ती थी. वो एक ही काम को हज़ारों बार कर चुका था. वो रोज़ न जाने कितनी ही बार मसालों के सटीक मिश्रण और ठीक ठीक आंच की कीमियागरी के साथ बिलकुल एक जैसा ज़ायका परोसता था. गैस चूल्हा, कड़ाही, छन छन और कई पदार्थों में झपट पड़ता उसका हाथ आखिर में कड़ाही में छूटता था. उसके हाथ से कच्ची सामग्री के कड़ाही में छूटते ही छन्न की आवाज़ के साथ मसालेदार धुंए का एक छोटा बादल कडाही के गिर्द तैरने लग जाता. लोग मंत्रमुग्ध से उसे देखते थे. कई लोगों को संदेह था कि वो चीन से ट्रेनिंग लेकर आया है. ये संदेह कई लोगों के लिए दावे में बदल जाता. उसे लेकर उसके प्रशंसक अतिशयोक्तिपूर्ण दावे भी करने लगे. जैसे कुछ नियमित ग्राहकों का मानना था कि अकेले में वो चीनियों की तरह चॉप स्टिक्स से खाता है. कुछ लोग यहाँ तक भरोसा करते थे कि वो मंदारिन जानता है. तो कुछ की सनक उसे चीनी जासूस घोषित कर रही थी. खैर... ज़्यादातर का मानना था कि चीन तो दूर की कौड़ी है पर हांगकांग ज़रूर वो गया होगा. यद्यपि उसे देखकर कोई भी समझदार तो यही कहेगा कि वो इस शहर से बाहर शायद ही कभी गया होगा. और ऐसा ही था.

उसका काम सिर्फ कुछ न कुछ बनाना ही था. पैकिंग का काम एक दूसरा लड़का करता था. एक बार आर्डर जितना बनाने के बाद वो दूसरे आर्डर पर लग जाता, फिर तीसरे और बाद में चौथे. इस तरह अपने आप को हर बार दोहराता था. उसका व्यक्तित्व आर्डर लेने की प्रतिक्रिया से बनता था फिर हर आर्डर पर अपने को दोहराता था. उसे किसी ने बोलते हुए सुना नहीं था. उसके आस पास से कोई आवाज़ आती थी तो वो छन् की आवाज़ थी. वो मसालों की तीखी गंध वाले धुंए में लिपटा रहता था. आस पास खड़े लोगों के नथुनों की श्लेष्मा झिल्ली को रगड़ता तीक्ष्ण धूम्र ही उसका कुल व्यक्तित्व था.

आप उसकी तारीफ नहीं कर सकते. 'कुछ अच्छा बना है' कहने से न तो वो खुश होता था, न ही नाराज़. कोई नई बात नहीं थी ये कहना कि तुम एक उम्दा कारीगर हो.

3

उस जगह ख़ासी चहल पहल थी. ये फ़ास्ट फ़ूड का एक जटिल संकुल सा था जो शहर के एक बेहद जाने पहचाने चौराहे से कुछ ही दूर था. चौराहे पर एक बड़ा गोलाकार पार्क बना हुआ था जहां शाम के समय बच्चे जिद करके अपने परिवारों को लाया करते थे. वे सब उस पार्क में एकाध घंटे बिताकर वहां से वापसी करते. वापसी का ये रास्ता सीधे घर की ओर नहीं जाता था, बल्कि आग गंध और स्वाद के इस बेतरतीब भीड़भरे लेकिन मादक जंगल से उलझता हुआ घरों की ओर लौटता था.

चायनीज़ सबकी पहली पसंद था. मुम्बैया पंजाबी और साउथ इंडियन भी पसंद में होड़ लेते थे. चायनीज़ के नाम पर जो कुछ भी दिया जाता था वो बीजिंग में परोसे जाने वाले वेज जंक से कितना मिलता था, मिलता भी था या नहीं ये सब सवाल बेमानी ही थे. इस तरह के सवाल अगर होते भी थे या किये भी जा सकते थे तो उसकी जगह फेसबुक थी.

खूब सारी टेबल्स और प्लास्टिक की कुर्सियां फ़ास्ट फ़ूड की कई सारी दुकानें.
जय भोले चायनीज़ से मुंबई जंक्शन तक. नामों में कहीं इनोवेशन लगता तो कहीं चलताऊ रवैया सामने आता था..

तेज़ रौशनी चुभती सी और यहाँ वहां उड़ते कीट.

वे दोनों मेरे पास वाली टेबल पर आमने सामने बैठे थे. लड़के ने खूब दाढ़ी उगा रखी थी जो उसके चेहरे पर ठीक ठाक लग रही थी और उसके बेतकल्लुफ होने को और मजबूती से सामने लाती थी. लड़की कुछ ओवरवेट थी. माफ़ करें अगर ये कहना गुस्ताखी लगे. अगर आप मानते हैं कि आजकल ओवरवेट के लिए प्लम लफ्ज़ इस्तेमाल होना चाहिए तो मैं अपना शब्द वापस लेकर कहूँगा कि वो लड़की खाते पीते खानदान से ताल्लुक रखती थी. उसका चेहरा गोल और बड़ा था.
वे दोनों कुछ देर से आमने सामने चुप बैठे थे. वे बड़ी देर तक चुप बैठे रहे. कोई एक दूसरे की तरफ़ भी नहीं देख रहा था. किसी के चेहरे पर रंज़ या गुस्सा नहीं. शायद वे दोनों प्रेमी थे. बहुत थोड़ी सम्भावना उनके ठीक ठाक दोस्त होने की भी थी. पर सिर्फ दोस्त होने में जो बेतकल्लुफी होती है वो उनके बीच नहीं थी. स्थगित संवाद के बावजूद मन ये मानता था कि वे आपस में प्रेम में थे. वे अपने अपने काम से थक कर आये हो सकते थे. बल्कि ऐसा ही था. लड़की के सुंदर चेहरे पर थकान साफ़ दिख रही थी. लड़के के चेहरे पर दाढ़ी ने बेशक उसे छुपा रखा था पर वो जिस तरह से टेबल के नीचे पाँव पसार कर बैठा था उससे साफ़ था कि वो भी थका हुआ था. वे दोनों इतने थके हुए थे कि कुछ भी बोलना उनके लिए और थकाने वाला काम था. लड़के ने वेटर के इस बार फिर पूछने पर कुछ आर्डर दिया. थोड़ी देर बाद वेटर आर्डर रखकर चला गया. वे दोनों खाने लगे. खाने को लेकर कोई गहरा राग उनमें नहीं था. उनके आसपास रौनक थी. हर कोई अपनी पसंद की चीज़ें खाने में व्यस्त था. बच्चे खासे खुश. उनके मां बाप भी एक अच्छे दिन के शानदार समापन में लगे थे. खुशियों के बीच वे दोनों अपनी थकान के दायरे में थे. वे चुपचाप खा रहे थे. वे एकाध बार एक दूसरे की ओर देख रहे थे. उन दोनों का एक दूसरे की ओर देखना अलग अलग समय में हो रहा था. लड़की जब दाढ़ी वाले लड़के की ओर देखती तो वो लड़का नीचे नज़र किये खा रहा होता. लड़का जब लड़की की ओर देखता तो लड़की 'कहीं ओर देखती पर कहीं नहीं देखती' धीरे धीरे मुंह हिला रही होती. इससे दोनों को कोई शिकायत नहीं थी. इससे किसी को कोई शिकायत नहीं थी. न आसपास के लोगों को. वे पास बैठकर ही संतोष में थे शायद. कुछ कहने बोलने की ज़रुरत महसूस नहीं की जा रही थी.
अब मुझे ये विश्वास हो गया था कि वे असल में गहरे प्रेम में थे. मेरे इस विश्वास के बहुत बाद लड़की ने लड़के को एक भरपूर नज़र से देखा. और उसके बहुत बाद लड़के ने पैसे चुकाए और वे दोनों वहां से साथ साथ निकल गए.

                                               ( इमेज साभार गूगल )

Wednesday, January 3, 2018

फ़ीके रंग वाला फूल


कितने आक्रामक लगते है ये चटख रंग.
कांच के टुकड़ों की तरह आँखों में घुसे जाते हैं. गमलों में उगे कोमल और कृशकाय पौधों पर किसने इतने गहरे रंग के फूल उगा दिए? क्या जंगल में भी ऐसे ही तीखे रंगों का सैलाब उमड़ता है? या ये प्रयोगशालाओं के रसायनों से पनपे है ?
झील के किनारे फूलों की प्रदर्शनी लगी है. किनारे पर माहौल में रूमान है. हल्का संगीत पानी की सुस्त लहरों से संगत करता है. लम्बे प्रोमेनाड पर लोगों की चाल में शांति है. पता नहीं चलता कि इस बारिश में छलक उठी झील का टनों गैलन पानी अपनी डूब में आई धरती को कितना ज़ोर से भींचे हुए है. दिगंत में कोई पक्षी सांवली रेखा उकेरता उड़ता चला जाता है.
यहाँ कतारों में लगे हैं बेशुमार गमले. गमलों की मिट्टी में उगे बौने पौधे और उस पर उसके आकार और कद से कहीं ज़्यादा लगे फूल. इनका रंग हैरान करता है. चमकदार बैंगनी, लाल, रानी और गाढ़ा आसमानी.
बेरंग मिट्टी में पस्त से हरे पत्तों के बीच रक्ताभ फूल.जैसे ठंडी आग बैठी है इस गमले में.
रंगों की इस चकाचौंध का पोषणकैसे होता है? क्या एक गमले की मिट्टी काफ़ी है इस वैभव को सींचने में ?
कोई फ़ीके रंग का फूल चाहिए मुझे, भले ही वो मेरी हथेली के आकार से बहुत छोटा हो. इस लम्बी कतार में देखता हूँ शायद कही छुपा बैठा हो. वैभव के बीच उपेक्षित सा कोई हल्के रंग का फूल.

Thursday, December 21, 2017

झूला पुल

क्या कोई खिलौना ट्रांजिस्टर बज सकता है?
क्या किसी नक़ली घड़ी की सुइयां चल सकती है?

उसके लिए इसका उत्तर 'ना' में नहीं था. 'हां' में भी नहीं था. बस शक और भरोसे के बीच निलंबित सा कुछ था. बात बहुत पुरानी हो गई थी इसलिए उसे खुद इस बात का विश्वास नहीं रह गया था पर उसने एक दर्शक की हैसियत से जो देखा था उसकी धुंधली याद भी इतनी चित्रात्मक थी कि उसे वो पूरा दृश्य अपनी जगह, पृष्ठभूमि, केंद्र, परिधि, पात्रों- गौण पात्रों के साथ याद था. बस, एक जगह वो झूला पुल डगमगा रहा था. कुछ उधड़ा सा था वोपड़-चित्र. उसकी तुरपाई भी नहीं हो सकती.
वो एक लकड़ी का रेडियो था. उसके घर का छोटा आंगन था. एक पड़ौस का 'शौकिया मिस्त्रिनुमा लड़का था जो उस रेडियो को जिज्ञासावश उलट पुलट रहा था.
आखिर उस लड़के ने रेडियो को खोल दिया. रेडियो में अंदरूनी तार और मशीनों की जगह बटन और धागे थे. सफ़ेद और रंग बिरंगे धागे जो कई सारे बड़े छोटे बटन से गुज़र रहे थे.
ये बात उसे क्यों याद थी कि रेडियो खरीद कर लाए जाने के बाद एक बार बजा था. खुद उसने उसे बजते हुए सुना था. पर बटन और धागों का जटिल आयोजन फिर किसी आवाज़ को पैदा नहीं कर पाया. उसने फिर उसे कभी सुना नहीं. उस लकड़ी के पिटारे का क्या हुआ उसे नहीं मालूम.
ऐसा ही कुछ उस घड़ी के साथ भी था.
वो घड़ी पिताजी ने ट्रेन में खरीदी थी. ट्रेन में कोई आदमी ख़ूब सारी घड़ियाँ बेच रहा था. दो-पांच घड़ियाँ वो हाथ में थामे था. दो पांच घड़ियाँ उसकी कलाई से बांह तक बंधी थी. उसके पिताजी ने एक कत्थई डायल वाली घड़ी खरीदी थी. उसके वास्ते. वो पहन कर ख़ूब इतराया था. बात ये भी पुरानी थी. वो छोटा था. उसने उस घड़ी की बाकायदा नुमाइश कर स्कूल का ग्रुप फोटो खिंचवाया था.उसकी याददाश्त के मुताबिक घड़ी चलती थी. उसकी सुइयां जैसे चिकने फर्श पर बेआवाज़ सरकती थीं. बेशक वो दीवार घड़ी की तरह शोर नहीं करती थी. दीवार घड़ी के हाथ सरकते वक़्त आवाज़ करते थे. एक लय के साथ दीवार घड़ी बोलती थी जो 'घड़ीक्यम घड़ीक्यों टिटक टिटक' की तरह सुनाई देता था.

कलाई घड़ी की सुइयां समय के साथ चलती थीं ये बात आज वो कैसे कह सकता था? घड़ी का पिछला ढक्कन एक दिन खुल गया और उसने देखा उसमें कोई चकरी या गिर्री नहीं थी. बस कागज़ भरा था.निरा कागज़. वो घड़ी कैसे चल सकती थी? पर... वो जो समझता था वो सच था या नहीं? यकीन की जीन पर कसकर इसे कैसे दौडाए?
उसे याद आया उसके दादाजी सुनाते थे कि पास के गाँव जाते समय उन्होंने एक आदमी को देखा था. उनसे बात करते करते वो अचानक मिट्टी के ढूह में बदल गया.
वो बहुत हंसा था दादा की बात पर. वे नहीं हँसे थे, पर उन्होंने कोई इसरार भी नहीं किया था.
वो इस समय हैंगिंग ब्रिज पर था. दो ठोस कगारों के बीच झूलता हुआ.

Monday, December 11, 2017

मिट्टी की परात



तुम प्रेम में इतने डरे डरे क्यों हो ?

….. और इसके उत्तर में काफ़ी देर शून्य में ताकता रहा. फिर जैसे उसने बहुत गहरे कुँए से अपनी आवाज़ को खींचा और बोला-
मैं पश्चाताप का आदिपुरुष हूँ. कहीं भी कुछ ग़लत होता है मेरी आत्मा उसका प्रायश्चित करने लगती है. बरसों पहले जब मैं बहुत छोटा था. अबोध. तब पहली बार मेरी आत्मा एक निरर्थक वाक़ये के बाद ईंधन की तरह जलने लगी. मैं अपने ननिहाल में आया हुआ था. वो घर पुराना था. उस घर की मरम्मत शायद कभी नहीं हुई थी. उसके कमरे, दीवारें, दालान सब कुछ धूल मिट्टी में सने रहते. कच्चे आँगन में असंख्य दरारें थी जिनमे चींटियों की प्राचीन बस्तियां थी. दीवार के सहारे एक मिट्टी की परात खड़ी थी.बरसों से. उस परात का कोई इस्तेमाल नहीं था. बस, वो घर के भूगोल का हिस्सा भर ही थी. मैं कुछ खेलते खेलते उस परात के पास पहुंचा और अनायास ही पाँव की ठोकर से वो परात अपने बारीक संतुलन से हिल गयी. गिर गयी. और टुकड़े टुकड़े हो गयी. मैं दहशत से भर उठा. जैसे मैंने कोई हादसा अंजाम दे दिया था. मैंने जैसे घर का भूगोल ही बिगाड़ दिया था. मुझे शायद हल्की डांट पड़ी थी पर आज मैं सोचता हूँ वो नकली ही रही होगी. उस घर के लिए वो परात जैसे थी ही नहीं, उसका कोई क्या शोक मनाता. पर मैं उस मिटटी की परात को लेकर परेशान था. जब भी आने वाले दिनों में मैं उस जगह टूटे हुए टुकड़ों को देखता मैं डरने लगता, मैं अपने आप को घर का नक्शा, हुलिया बिगाड़ देने का दोषी ठहरता. आखिर घर वालों को समझ में आया और उन्होंने उन टूटे हुए टुकड़ों को वहां से बाहर फेंक दिया. परात के भौतिक अवशेषों के वहां से हटने के बाद भी मेरा मन वहां उन्हें ढूंढता रहा…

मैं पछतावे से भरा हूँ. मेरी आत्मा किसी अनाम पश्चाताप से धूंआती- सुलगती रहती है. आम दिनों में भी मैं इसकी आंच महसूस करता हूँ पर कुछ ग़लत का ज़िम्मेदार होने पर तो तो ये कपूर की तरह जलने लगती है. अब मुझे ये कई बार अच्छा भी लगता है. मैं उस दहन की गंध को सुवास की तरह  लेता हूँ.

‘एक और दिन की बात है. मेरे कोई रिश्तेदार अपने बच्चे को डांट रहे थे. वो बच्चा मेरा भी दोस्त था. उसने अपने ही घर में कोई चोरी की थी. कुछ पैसों की. डांटने के दौरान में भी वहां खड़ा था…’  बोलते बोलते उसकी आवाज़ में खुश्की आ गयी थी. वो आस पास पानी ढूँढने लगा पर कहीं ग्लास न पाकर उसने उसी आवाज़ में बोलना जारी रखा-

मैं भी वहां खड़ा था और डांट का असर अपने ऊपर महसूस कर रहा था. रंगे हाथों जैसे मैं ही पकड़ा गया था. मैंने उसी समय कसम खाई कि मैं कभी चोरी नहीं करूंगा यद्यपि मैंने कभी चोरी की नहीं थी. डांट में आवाज़ की सख्ती जब एक सीमा से बढ़ गयी तो मैं बोल उठा कि ये काम मैंने नहीं किया था.

उसकी प्रेमिका उसे देखे जा रही थी. उसने पूछा-
‘तुम सारे गुनाह क्यों अपने ऊपर लेते हो' ?
‘मैं गुनाहगार नहीं हूँ, पर गुनाहों का दंश मुझे फिर भी बींधता है.’
‘तो क्या ऐसे में तुम मुझसे प्रेम कर पाओगे?
‘मुझे पता नहीं पर मैं तुम्हे प्रेम दूँ तो क्या तुम मुझे अपनी करुणा दोगी? मुझे करुणा की ज़रुरत है जिससे मैं अपनी दग्ध आत्मा को शीतल कर सकूं. एक ये गुनाह मुझे करने की अनुमति दो.