Wednesday, January 3, 2018

फ़ीके रंग वाला फूल


कितने आक्रामक लगते है ये चटख रंग.
कांच के टुकड़ों की तरह आँखों में घुसे जाते हैं. गमलों में उगे कोमल और कृशकाय पौधों पर किसने इतने गहरे रंग के फूल उगा दिए? क्या जंगल में भी ऐसे ही तीखे रंगों का सैलाब उमड़ता है? या ये प्रयोगशालाओं के रसायनों से पनपे है ?
झील के किनारे फूलों की प्रदर्शनी लगी है. किनारे पर माहौल में रूमान है. हल्का संगीत पानी की सुस्त लहरों से संगत करता है. लम्बे प्रोमेनाड पर लोगों की चाल में शांति है. पता नहीं चलता कि इस बारिश में छलक उठी झील का टनों गैलन पानी अपनी डूब में आई धरती को कितना ज़ोर से भींचे हुए है. दिगंत में कोई पक्षी सांवली रेखा उकेरता उड़ता चला जाता है.
यहाँ कतारों में लगे हैं बेशुमार गमले. गमलों की मिट्टी में उगे बौने पौधे और उस पर उसके आकार और कद से कहीं ज़्यादा लगे फूल. इनका रंग हैरान करता है. चमकदार बैंगनी, लाल, रानी और गाढ़ा आसमानी.
बेरंग मिट्टी में पस्त से हरे पत्तों के बीच रक्ताभ फूल.जैसे ठंडी आग बैठी है इस गमले में.
रंगों की इस चकाचौंध का पोषणकैसे होता है? क्या एक गमले की मिट्टी काफ़ी है इस वैभव को सींचने में ?
कोई फ़ीके रंग का फूल चाहिए मुझे, भले ही वो मेरी हथेली के आकार से बहुत छोटा हो. इस लम्बी कतार में देखता हूँ शायद कही छुपा बैठा हो. वैभव के बीच उपेक्षित सा कोई हल्के रंग का फूल.

Thursday, December 21, 2017

झूला पुल

क्या कोई खिलौना ट्रांजिस्टर बज सकता है?
क्या किसी नक़ली घड़ी की सुइयां चल सकती है?

उसके लिए इसका उत्तर 'ना' में नहीं था. 'हां' में भी नहीं था. बस शक और भरोसे के बीच निलंबित सा कुछ था. बात बहुत पुरानी हो गई थी इसलिए उसे खुद इस बात का विश्वास नहीं रह गया था पर उसने एक दर्शक की हैसियत से जो देखा था उसकी धुंधली याद भी इतनी चित्रात्मक थी कि उसे वो पूरा दृश्य अपनी जगह, पृष्ठभूमि, केंद्र, परिधि, पात्रों- गौण पात्रों के साथ याद था. बस, एक जगह वो झूला पुल डगमगा रहा था. कुछ उधड़ा सा था वोपड़-चित्र. उसकी तुरपाई भी नहीं हो सकती.
वो एक लकड़ी का रेडियो था. उसके घर का छोटा आंगन था. एक पड़ौस का 'शौकिया मिस्त्रिनुमा लड़का था जो उस रेडियो को जिज्ञासावश उलट पुलट रहा था.
आखिर उस लड़के ने रेडियो को खोल दिया. रेडियो में अंदरूनी तार और मशीनों की जगह बटन और धागे थे. सफ़ेद और रंग बिरंगे धागे जो कई सारे बड़े छोटे बटन से गुज़र रहे थे.
ये बात उसे क्यों याद थी कि रेडियो खरीद कर लाए जाने के बाद एक बार बजा था. खुद उसने उसे बजते हुए सुना था. पर बटन और धागों का जटिल आयोजन फिर किसी आवाज़ को पैदा नहीं कर पाया. उसने फिर उसे कभी सुना नहीं. उस लकड़ी के पिटारे का क्या हुआ उसे नहीं मालूम.
ऐसा ही कुछ उस घड़ी के साथ भी था.
वो घड़ी पिताजी ने ट्रेन में खरीदी थी. ट्रेन में कोई आदमी ख़ूब सारी घड़ियाँ बेच रहा था. दो-पांच घड़ियाँ वो हाथ में थामे था. दो पांच घड़ियाँ उसकी कलाई से बांह तक बंधी थी. उसके पिताजी ने एक कत्थई डायल वाली घड़ी खरीदी थी. उसके वास्ते. वो पहन कर ख़ूब इतराया था. बात ये भी पुरानी थी. वो छोटा था. उसने उस घड़ी की बाकायदा नुमाइश कर स्कूल का ग्रुप फोटो खिंचवाया था.उसकी याददाश्त के मुताबिक घड़ी चलती थी. उसकी सुइयां जैसे चिकने फर्श पर बेआवाज़ सरकती थीं. बेशक वो दीवार घड़ी की तरह शोर नहीं करती थी. दीवार घड़ी के हाथ सरकते वक़्त आवाज़ करते थे. एक लय के साथ दीवार घड़ी बोलती थी जो 'घड़ीक्यम घड़ीक्यों टिटक टिटक' की तरह सुनाई देता था.

कलाई घड़ी की सुइयां समय के साथ चलती थीं ये बात आज वो कैसे कह सकता था? घड़ी का पिछला ढक्कन एक दिन खुल गया और उसने देखा उसमें कोई चकरी या गिर्री नहीं थी. बस कागज़ भरा था.निरा कागज़. वो घड़ी कैसे चल सकती थी? पर... वो जो समझता था वो सच था या नहीं? यकीन की जीन पर कसकर इसे कैसे दौडाए?
उसे याद आया उसके दादाजी सुनाते थे कि पास के गाँव जाते समय उन्होंने एक आदमी को देखा था. उनसे बात करते करते वो अचानक मिट्टी के ढूह में बदल गया.
वो बहुत हंसा था दादा की बात पर. वे नहीं हँसे थे, पर उन्होंने कोई इसरार भी नहीं किया था.
वो इस समय हैंगिंग ब्रिज पर था. दो ठोस कगारों के बीच झूलता हुआ.

Monday, December 11, 2017

मिट्टी की परात



तुम प्रेम में इतने डरे डरे क्यों हो ?

….. और इसके उत्तर में काफ़ी देर शून्य में ताकता रहा. फिर जैसे उसने बहुत गहरे कुँए से अपनी आवाज़ को खींचा और बोला-
मैं पश्चाताप का आदिपुरुष हूँ. कहीं भी कुछ ग़लत होता है मेरी आत्मा उसका प्रायश्चित करने लगती है. बरसों पहले जब मैं बहुत छोटा था. अबोध. तब पहली बार मेरी आत्मा एक निरर्थक वाक़ये के बाद ईंधन की तरह जलने लगी. मैं अपने ननिहाल में आया हुआ था. वो घर पुराना था. उस घर की मरम्मत शायद कभी नहीं हुई थी. उसके कमरे, दीवारें, दालान सब कुछ धूल मिट्टी में सने रहते. कच्चे आँगन में असंख्य दरारें थी जिनमे चींटियों की प्राचीन बस्तियां थी. दीवार के सहारे एक मिट्टी की परात खड़ी थी.बरसों से. उस परात का कोई इस्तेमाल नहीं था. बस, वो घर के भूगोल का हिस्सा भर ही थी. मैं कुछ खेलते खेलते उस परात के पास पहुंचा और अनायास ही पाँव की ठोकर से वो परात अपने बारीक संतुलन से हिल गयी. गिर गयी. और टुकड़े टुकड़े हो गयी. मैं दहशत से भर उठा. जैसे मैंने कोई हादसा अंजाम दे दिया था. मैंने जैसे घर का भूगोल ही बिगाड़ दिया था. मुझे शायद हल्की डांट पड़ी थी पर आज मैं सोचता हूँ वो नकली ही रही होगी. उस घर के लिए वो परात जैसे थी ही नहीं, उसका कोई क्या शोक मनाता. पर मैं उस मिटटी की परात को लेकर परेशान था. जब भी आने वाले दिनों में मैं उस जगह टूटे हुए टुकड़ों को देखता मैं डरने लगता, मैं अपने आप को घर का नक्शा, हुलिया बिगाड़ देने का दोषी ठहरता. आखिर घर वालों को समझ में आया और उन्होंने उन टूटे हुए टुकड़ों को वहां से बाहर फेंक दिया. परात के भौतिक अवशेषों के वहां से हटने के बाद भी मेरा मन वहां उन्हें ढूंढता रहा…

मैं पछतावे से भरा हूँ. मेरी आत्मा किसी अनाम पश्चाताप से धूंआती- सुलगती रहती है. आम दिनों में भी मैं इसकी आंच महसूस करता हूँ पर कुछ ग़लत का ज़िम्मेदार होने पर तो तो ये कपूर की तरह जलने लगती है. अब मुझे ये कई बार अच्छा भी लगता है. मैं उस दहन की गंध को सुवास की तरह  लेता हूँ.

‘एक और दिन की बात है. मेरे कोई रिश्तेदार अपने बच्चे को डांट रहे थे. वो बच्चा मेरा भी दोस्त था. उसने अपने ही घर में कोई चोरी की थी. कुछ पैसों की. डांटने के दौरान में भी वहां खड़ा था…’  बोलते बोलते उसकी आवाज़ में खुश्की आ गयी थी. वो आस पास पानी ढूँढने लगा पर कहीं ग्लास न पाकर उसने उसी आवाज़ में बोलना जारी रखा-

मैं भी वहां खड़ा था और डांट का असर अपने ऊपर महसूस कर रहा था. रंगे हाथों जैसे मैं ही पकड़ा गया था. मैंने उसी समय कसम खाई कि मैं कभी चोरी नहीं करूंगा यद्यपि मैंने कभी चोरी की नहीं थी. डांट में आवाज़ की सख्ती जब एक सीमा से बढ़ गयी तो मैं बोल उठा कि ये काम मैंने नहीं किया था.

उसकी प्रेमिका उसे देखे जा रही थी. उसने पूछा-
‘तुम सारे गुनाह क्यों अपने ऊपर लेते हो' ?
‘मैं गुनाहगार नहीं हूँ, पर गुनाहों का दंश मुझे फिर भी बींधता है.’
‘तो क्या ऐसे में तुम मुझसे प्रेम कर पाओगे?
‘मुझे पता नहीं पर मैं तुम्हे प्रेम दूँ तो क्या तुम मुझे अपनी करुणा दोगी? मुझे करुणा की ज़रुरत है जिससे मैं अपनी दग्ध आत्मा को शीतल कर सकूं. एक ये गुनाह मुझे करने की अनुमति दो.


Friday, November 24, 2017

कैलकुलेटर

आजकल जो कैलकुलेटर उसे चीप प्लास्टिक का टुकड़ा नज़र आता था उसने उसे बरसों पहले कितना छला था! दुनिया में हो सकता है ये कैलकुलेटर सदियों पहले आ गया हो, उसने उन दिनों उसे पहली बार देखा था. वो शायद छठी या सातवीं में पढता था. क़स्बे का सिनेमाघर उसके घर से दूर था. सिनेमा लेकिन उसके दिल के करीब था. वो रोज़, चला कर पास की दर्ज़ी की दुकान तक ज़रूर जाता था. इस दुकान में सिनेमा के बेशुमार पोस्टर चिपके रहते थे. इनमें से कुछ पोस्टर क़स्बे में फिल्म लगने के लिहाज़ से बदलते भी थे.बाकी कई पोस्टर सदाबहार थे.कुछ कालातीत भी थे, बरसात के राजकपूर नर्गिस टाइप. अक्सर जो फिल्म सिनेमाघर में लगी होती थी उसका पोस्टर उस दुकान में भी चिपक जाता था. शायद ये कोई विज्ञापन जैसा तरीका था या उस दुकान वाले का सिनेमाघर वाले से कोई निजी रिश्ते जैसा मामला. जो भी हो ये तय था कि टेलर मास्टर भी फिल्मों का शौकीन था. दुकान में किसी कोने में पड़ा रेडियो विविधभारती के गाने हर वक्त चलाता रहता था. ‘वो’ उस ‘नोवेल्टी टेलर’ की दुकान के बाहर कुछ देर खड़ा रह कर फिल्मों के पोस्टर देखता रहता था. पोस्टर उसे क़स्बे में और भी कई जगह चिपके दिख जाते थे पर ये जगह उसके घर के नज़दीक थी.
पढाई में वो ख़ुद जैसा भी था, पढने का तरीका सबका एक जैसा था. किताबें पढ़ना, गृहकार्य करना, गुणा भाग, पहाड़े वगैरह. कलम और दवात के अलावा ब्लैक बोर्ड और खड़िया.
खड़िया का चूरा पूरी क्लास में उड़ता रहता था. उसने तब तक कैलकुलेटर जैसी चीज़ के बारे में सुना भी नहीं था. बल्कि सोचा भी नहीं था कि कोई ऐसी भी चीज़ हो सकती है जो गणित के गणनाएँ इस तरह हल कर सकती हैं. शकुंतला देवी के बारे में अलबत्ता उसने ज़रूर कहीं पढ़ा था और उसे बड़ी हैरत हुई थी कि कोई ऐसी महिला है जो गणित के लम्बे लम्बे गुणा- भाग बिना कॉपी- पैन के दिमाग में सोच कर हल कर सकती है और वो भी तत्क्षण ही.
कैलकुलेटर आज तकनीक में कोई ख़ास दर्ज़ा भले ही नही रखता मगर उन दिनों जब उसने पहली बार ऐसी चीज़ को देखा था उसका दिल दूना धड़कने लग गया था. उसे वो दृश्य आज भी याद था. चारों तरफ बारीक धूल थी. इक्का दुक्का पेड़ आस पास थे. वो अपने दोस्त के साथ वहां खड़ा था. उसका दोस्त बड़े इंजीनियर का बेटा था. उन दोनों में हलकी फुलकी दोस्ती थी. उस वक्त आस पास कोई नहीं था.उनके चरों ओर काफी खाली जगहे थीं. ऐसा लगता था वो पूरा परिदृश्य ख़ालीपन से भरा था. आसपास के इक्का दुक्का पेड़ों के बीच भी खूब सारी खाली जगह ठुंसी हुई थी. आसपास में उड़ते एकाध परिंदे को देखने के लिए भी कई मीलों खाली जगह को लांघना पड़ता. वो वहां क्यों था ये उसे अब ठीक ठीक याद नहीं था. तभी वहां ओवरसियर आया जो उसके दोस्त के पिताजी का मातहत था. उसने वहां आकर सीधे उसके दोस्त की ओर ही देखा और अपने जेब से कैलकुलेटर निकाल लिया. उसकी नन्ही से स्क्रीन खाली थी. ओवरसियर ने एक बटन दबाया. ध्वनि का एक मीठा सा अंश बज गया और स्क्रीन रोशन हो गई. फिर उसने दोस्त को जोड़, बाकी, गुणा भाग सब उससे करके दिखाए. उसका दोस्त रोमांचित सा उसे देख रहा था. फिर ओवरसियर ने कैलकुलेटर उसके दोस्त को थमा दिया और कहा ख़ुद करके देखो. उसका दोस्त तकनीक के उस चमत्कार से चमत्कृत था. वो स्क्रीन पर उभरते अंकों को विस्फारित नेत्रों से देख रहा. उसके कांपते हाथ उस पर धीरे धीरे चलने लगे. ओवरसियर का ध्यान उसके दोस्त की ख़ुशी पर ही केन्द्रित था और वो.. वो अपने दोस्त को इस तरह देखकर अजीब से तनाव में ऐंठता जा रहा था. वो अपने दोस्त की ख़ुशी में शरीक नहीं हो पा रहा था. वो उस कैलकुलेटर को अपने हाथ में लेने के लिए मचल गया. वो उस चमत्कार को खुद अपने हाथों से करना चाह रहा था. वो देर तक ‘एक बार मुझे, एक बार मुझे कहता गया पर उसकी चिरौरियों और मिन्नतों पर न तो उसके दोस्त ने कोई ध्यान दिया और न ही उस ओवरसियर ने. आखिर ओवरसियर कुछ देर बाद उस कैलकुलेटर को जेब के हवाले कर चलता बना. उस ओवरसियर के लिए वो वहां जैसे मौजूद ही नहीं था.
उसे याद है वो वहां से अपने घर तक डूसके भरता रोता ही रहा. उस वक़्त कोई भी भगवान उसके इस मौन करूण विलाप से पसीज सकता था. पर उसका रोना कीमती था. और उसने इस सम्पदा को किसी के सामने उदघाटित नहीं किया. कई दिनों तक उसकी सपनों में कैलकुलेटर की नन्हीं सी स्क्रीन चमकती रही. वो एक दम से जागकर उठ बैठता. सपने में अचानक कैलकुलेटर चमक उठता और उसे वो चमक फ़्लैश लाइट की तरह चौंध मारती लगती. उसकी मां उसके इस तरह अचानक जागने से घबराने लग गई. वो किसी बुरे सपने के बारे में पूछतीं और वो मना कर देता.
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‘तो.. फिर क्या हुआ? आओ तुम्हें दुनिया का सबसे महंगा सेल फ़ोन दिला देती हूँ. उसमें कैलकुलेटर भी होगा. किसी भी डिजिटल स्टोर में चलो और तुम नाम लो वो चीज़ तुम्हारी हो जाएगी.’ बरसों बाद उसकी प्रेमिका ने कहा.
‘मेरे लिए कैलकुलेटर शायद इतना मायने नहीं रखता. तब भी नहीं जब मुझे उसके सपर्श से महरूम किया गया था. मेरे बाप ने मेरे अगले जन्मदिन पर ही वो ला दिया था.’
‘फिर दिक्क़त कहाँ थी ?’
‘वो मेरी प्रतिक्रिया शायद कैलकुलेटर को लेकर उतनी नहीं थी. मेरे पिताजी ने जब मुझे कैलकुलेटर लाकर दिया तो मुझे ज्यादा ख़ुशी नहीं हुई थी.’
‘तुम ही तो उसके लिए कहते थे- चीप प्लास्टिक शिट.’
‘हां.. पता नहीं..शायद वो शायद ओवरसियर के लिए था.’