Thursday, November 27, 2014

कमरा

बड़ा होने पर तो उसे रोकने वाला कोई नहीं था पर बड़ा होने तक उसे उस कमरे में कभी जाने नहीं दिया गया.वो घर का सबसे पीछे का कमरा था.वो इसलिए घर का सबसे पुराना कमरा भी था.उसे उस घर में हमेशा वो कमरा ही दिखाई देता.घर में बार बार वो चलकर उस कमरे की तरफ बढ़ जाता.और उसके छोटे से दरवाज़े से अन्दर झाँकने की कोशिश करता.कमरे में अँधेरा ही होता.कुछ देर वो वहीं ख़ड़ा रहता ताकि उसकी आँखें अँधेरे की अभ्यस्त हो सकें और उसे कुछ दिखाई दे. कुछ देर बाद उसे कमरे की लाल छत दिखती.वो छत इतनी नीचे थी कि अगर कोई वयस्क उस कमरे में जाता तो उसे झुक कर ही चीज़ें तलाशनी पड़तीं.चीज़ें उस कमरे में बहुत थीं.कमरा घर में सबसे पुराना था.वो घर से भी पुराना था.वही एक तरह से घर था.बाकी सब कुछ जैसे उसी का विस्तार. एक पुराना ताला दरवाज़े की कुण्डी के साथ ही लटका रहता ताकि कमरे को काम ख़त्म होते ही बंद किया जा सके.पर दरवाज़ा दिन में खुला ही रहता क्योंकि घर में रह रहे लोग उसके भीतर बाहर आते जाते रहते.उस कमरे से सामान कम ही बाहर आता था.ज़्यादातर सामान उसके भीतर ही जाता रहता.पर वो सिर्फ स्टोर नहीं था.एक तरह से संग्रहालय था.चीज़ों से भरा एक अव्यवस्थित संग्रहालय.सिर्फ चीज़ें ही क्यों उस कमरे में कई दिन,वार, तारीखें भी जमा थीं.समय का कभी हासिल न किया जा सकने वाला हिस्सा भी किसी खराब टेबल घडी के रूप में अन्दर कहीं ठुंसा पड़ा था.पर वो कमरा किसके लिए ये सब इकठ्ठा करता था?पिछली सात पुश्तों के लोगों को भी उसने अस्थियों के रूप में अपने भीतर जमा कर रखा था.मरने के बाद लोग अपनी हड्डियों में फॉस्फोरस की तरह यहीं किसी टांड पर कुछ अरसा चमकते रहते,फिर बुझ जाते.और घर के चले गए लोग सिर्फ रेशम की पोटली के रूप में कमरे में रह जाते.हथेली भर रेशम में सिमटे यही लोग अपने जीवन काल में कमरे के फर्श पर पांवों के निशान भी जमा कर जाते थे.कमरे के ताप में उन पद-छापों की कितनी ऊष्मा शामिल थी,कहा नहीं जा सकता.

उसे शुरू से ही इस कमरे में जाने से मना किया हुआ था.वो अन्दर जाना चाहता था पर एक डर उसके मन में पहले से ही घर किया हुआ था.असल में कमरे में एक छोटा सा तहखाना भी था.उसकी पहली ज़िद पर घर के लोगों ने उसे बताया कि तहखाने में एक जानवर रहता है.और वो जानवर कभी भी आकर उस अँधेरे कमरे के किसी कोने में बैठ जाता था.अगर उस कमरे में कोई बच्चा चला जाय तो हो सकता था कि वो जानवर उसे खा जाता.

ये कारण बहुत बड़ा था.उसने अपने बड़ा होने तक कभी उस कमरे के भीतर जाने की कोशिश ही नहीं की.पर कमरा उसे हमेशा आकर्षित करता रहता था.घर में लोग इधर उधर चलते फिरते रहते पर वो कमरे के छोटे दरवाज़े के पास बैठा रहता और उसकी आँखें टकटकी लगाए अन्दर के अँधेरे को भेदने की कोशिश करती रहतीं.अन्दर सूचीभेद्य अंधकार था.कई बार उसे लगता कमरे के अन्दर से एक जोड़ी आँखें उसे देख रही है.वो डरकर तब वहां से चला जाता.पर कई बार हिम्मत करके वो अपनी विस्फारित आँखों से सिर्फ देखता रहता.तब फिर कुछ देर बाद कमरे की लाल छत उसे दिखने लगती.उसे घूरती वे आँखें भी तब ग़ायब हो जातीं.असल में वो उस जानवर को देखने की जिद में ये हिम्मत जुटा पाता था कि कभी तो ऐसा होगा कि वो तहखाने से उस कमरे में टहल करने आया हो और उसे वो देख ले.उसने मन ही मन संभावनाएं जता रखीं थीं कि वो जानवर क्या हो सकता था.उसकी सोच थी कि वो शायद घड़ियाल हो सकता है क्योंकि कुत्ता अगर होता तो उसके गुर्राने की आवाज़ भी ज़रूर कभी न कभी सुनाई देती.

वो कमरा किम्वदंतियों से भरा था.क्या कमरे में वाकई ठोस छूने लायक चीज़ें भी थीं? या कि सिर्फ किस्से और कहानियों से ही कमरा भरा था,अटा था?या पुरानी सारी चीज़ें किम्वदंतियों में बदल गयीं थी?तब क्या कमरे में रेशम की पोटलियों में बैठे लोग भी किम्वदंतियां हो गए थे?उनकी अस्थियों ने अपना भार छोड़ दिया था और वे रेशम हो गए थे.

अपने बड़ा होने पर भी कभी कभी वो इस तरह से सोचा करता था.  
                                 
                                         

 (फोटो गूगल करके,आभार सहित)

Friday, October 17, 2014

हाथ

उसके हाथ बेमेल थे.वे उसके व्यक्तित्व से मेल नहीं खाते थे.जहां वो सुंदर सुकुमार सा था, उसके हाथ भद्दे थे.वो अक्सर हँसता नहीं था पर अगर उसे किसी बात पर हंसी आ जाए और उस वक़्त उसे कोई देख ले तो तो यही कहेगा कि कोई बच्चा हंस रहा है.

यद्यपि वो उम्र के लिहाज़ से बच्चा नहीं था.

उम्र उसकी ढलने लग गयी थी.वह अपने पूरे आकार में कोमल प्रतीत होता था.बस उसकी हथेलियां खुरदरी थी.एक बार किसी ने उससे हाथ मिलाने के बाद कहा था कि क्या वो काफी वर्जिश वगैरह करता है.उसने इसका अनुवाद इस तरह मन ही मन में किया कि उसके हाथ मज़दूर के हाथों की तरह सख्त हैं.उसे अपने सख्त हाथों से परेशानी नहीं थी बस उसे इसी बात से तकलीफ थी कि उसके हाथ बेमेल थे. वे बाकी शरीर के साथ असंगत थे.वो कई बार एक हाथ की उँगलियों को दूसरी हथाली के पीछे फेरा करता था.ये स्पर्श उसे सबसे ख़राब प्रतीत होता था.उसे लगता, वो काठ पर पर अपना हाथ फिरा रहा है और ये उसका हाथ नहीं हो सकता.एकदम बेजान हाथ.ऐसा ही दूसरे हाथ के साथ करने पर अहसास होता.

किसी ने इसे चर्म विज्ञानी के नज़रिए से देखा और कहा चमड़ी की कोई अलर्जी है ,किसी ने समुद्र विज्ञानी के नज़रिए से देखकर कहा, ये श्रमजीवी का हाथ है.और कोई इसे कौटुम्बिक लक्षण मानता जो पीढ़ियों से चलकर उस तक आया है, और आगे भी जारी रह सकता है.एक ओझा ने कहा कि इसके मूल में कोई प्राचीन शाप है.उसका दावा था, कि वो बता सकता है कि उसके किसी पूर्वज को क्या करने पर ऐसा शाप दिया गया था और जिसे आने वाली कई संततियों तक चलना था.उसे एक बार लगा कि उसे ओझा को पूछना चाहिए कि उसके पुरखे ने ऐसा क्या कर दिया था जिसका भुगतान उसे अब इतने साल बाद,न जाने कितने साल बाद,करना पड़ रहा है.और क्या मूल शाप अपनी तीव्रता में शक्तिहीन होता गया है या वैसा का वैसा ही है.अगर शाप ने अपनी शक्ति खोयी है तो अपने मौलिक रूप में वो कितना कष्टकारी रहा होगा?वो इसमें दिलचस्पी लेता तो शायद शाप के बारे में और खुलासा हो सकता था पर बिना पूछे ही उस सिद्ध ने इतना और जोड़ दिया था कि ये शाप किसी स्त्री का दिया है. इस बात को जान लेने के बाद उसकी इस बारे में और जानने की रूचि ख़त्म हो गयी.वो किसी भी रूप में अपने दादा का उपहास नहीं होने देना चाहता था.उसकी इच्छा जब इस दिशा के उपाय में थी ही नहीं तो इसमें आगे किसी दिलचस्पी का प्रश्न भी नहीं उठता था. असल में उसे अपने हाथों या कहें हथेलियों से कोई शिकायत नहीं थी. उसकी दिक्कत थी इनकी असंगति से. उसे लगता, उसके हाथ उसके नहीं हैं.  उसके मस्तिष्क से भेजे जाने वाले संदेशों की अनुपालना करने में भी हाथ तत्पर थे,उसके सभी काम वही करते थे,उन्हीं हथेलियों में से किसी एक पर तिल देखकर उसकी प्रेमिका ने कहा था कि ये अच्छे भाग्य का प्रतीक है,इन सब के बावजूद वो अपने हाथों से खुश नहीं था. अपने हीहाथों को लेकर उसकी नाराज़गी जायज़ नहीं थी,उसकी प्रेमिका ने कभी हाथों को लेकर ऐसी टिप्पणी नहीं की थी,यद्यपि उसने ये भी कभी नहीं कहा था कि उसे उसके हाथ कुछ ही खास प्रिय हैं.उसे याद आया कि वो अपनी प्रेमिका का हाथ अपने हाथ में लेना प्रायः स्थगित करता रहा है.वो अपने हाथ उसके कन्धों पर ज़्यादा रखता है.या फिर कटिप्रदेश के गिर्द.पर ये भी तय है कि आप किसी से प्रेम करें और वो आपका हाथ अपने हाथ में न लें,ये हमेशा चलते रहना संभव नहीं है.

वो कुछ कुछ डरने लगा.कहीं प्रेमिका उसके हाथ की वजह से उसे छोड़ न दे.अभी इसकी सम्भावना नहीं थी,बल्कि वो ऐसा सोच भी नहीं सकता था पर आगे प्रेम की सड़क में कितने बल हैं कहा नहीं जा सकता.उसने नारियल का तेल अपनी हथेलियों पर लगाना शुरू कर दिया.फिर भी उसे लगा हाथों का रूखापन गया नहीं है.हथेलियों की त्वचा पगथलियों  की चमड़ी की तरह सख्त ही बनी रही.वो झुंझला कर सोचता भगवान ने मेरी हथेलियां बनाते वक्त गाय के खुर की सामग्री तो काम में नहीं ली.वो ज्यादा मात्र में नारियल के तेल का इस्तेमाल करने लगा.कई एक बार वो जैतून का तेल भी ले आया पर उसे लगा हर लिहाज़ से नारियल का तेल ठीक है.उसकी हथेलियां अतिशय स्नेहन के कारण धूल मिटटी को चिपकाती जातीं और फिर वे गन्दी काली सी नज़र आने लगीं.पर वो हाथ धोकर फिर तेल लगाना नहीं भूलता.उसकी प्रेमिका ने भी इस बात को नोट कर लिया.काफी अरसे तक उसने इशारों इशारों में ऐसा ही कुछ इससे सम्बंधित कह दिया पर कोई औपचारिक शिकायत नहीं की.पर जब उसके सलवार और कुरते पर चीकट लगने लगी तो उसने शिकायत नहीं की,बल्कि वो जोर जोर से रोने लगी.शिकायत की स्थिति को लांघ कर सीधे ही ये आगे की अवस्था में पहुंचना था.उसके इस रुदन में उसे छोड़कर जाने का फैसला भी साफ़ सुनाई  दे रहा था.

अब तक उसके घर में नीले प्लास्टिक का ढेर लग चुका था.जहां देखो वहा नारियल के तेल की शीशियाँ.संकरे मुंह वाली,चौड़े मुंह वाली.छोटी मंझली और बड़ी.सब तरह की.पर उसके हाथ अभी भी मुलायम होने की मांग कर रहे थे.  

Sunday, September 28, 2014

फैरिस व्हील

अक्सर मेलों में उसने देखा था विशालकाय चक्करदार घेरे को.वो, जो ले जाता है लोगों को अपने में बिठा कर.ऊंचे,ख़ूब ऊंचे.इतना ऊंचे कि एकबारगी तो सबसे ऊपर पहुंचे लोग आसमान में कहीं गुम हो गए लगते हैं.पर फिर फिरता फिरता,गोल गोल घूमता,वही चकरा उन्हें नीचे ले आता है.नीचे आकर लोग फिर धीरे धीरे अपने झूलते कमरों में बैठे ऊपर उठते जाते हैं.उनके आरोह और अवरोह का ये क्रम चलता ही जाता है जब तक कि वो बड़ा सा चकरा थम नहीं जाता.ये लोहे का विशालकाय घेरा मेला परिसर में चहल-पहल से थोड़ा हटकर लगा होता है.वैसे उसने अम्यूजमेंट पार्कों में इस घेरे को स्थायी लगे हुए देखा था पर उसकी स्मृति का गोल चकरा मेले में लगा बड़ा व्हील था जो मेला उखड़ने के साथ ही उखड जाता था.कहीं और लगने को. मेले के मैदान से जब लोग शाम की तमाम खरीददारी से निवृत होकर घर लौटने को होते तो उनके साथ आये बच्चों की ज़िद उन्हें थके थके क़दमों के साथ उस विशाल चक्र की तरफ ले आती.शायद इसमें उनके अन्दर के बच्चे की जिद भी कहीं न कहीं शामिल होतीं.

बचपन से अबतक कस्बों और शहरों में मेले लगते उसने देखे हैं.मेलों की सजावट में फर्क बढ़ते देखा है.उसे ठीक ठीक याद नहीं कि उसने सबसे पहले मेलों में इस चक्करदार झूले को कब देखा था.उसे इतना ज़रूर याद है कि जब उसने इसे पहली बार देखा था तब तक वो खासा समझदार जैसा हो गया था. ये भी कोई मेला ही था जो विशाल मैदान  में लगा था.दशहरे पर रावण और उसके सहोदरों के पुतले यहीं जलाये जाते थे.पुतलों के पेट में आग लगने के बाद से कुछ देर चलने वाली आतिशबाजी से आसमान में रौशनी कोंधती रहती थी.और हवा में बारूद की गंध तो बहुत देर तक टंगी रहती.इस दिन के अलावा इस मैदान में कई बार खरीददारी के मेले लगते.वो कई बार इन मेलों में जाता था.अकेला भी.बल्कि अक्सर अकेला ही.ऐसा नहीं था कि मेले कि रौनक उसके इस मेलों में जाने के पीछे बड़ी वजह थी.शुरू में तो वो ज़रूर रौनक के चक्कर में ही जाता था पर बाद में इन मेलों में जाने के पीछे कोई और ही वजह थी.वही लोहे का गोल घेरा.मेले की रौनक से भी वो घेरा बड़ी आसानी से दिख जाता था.मेले वाले इसे लगवाते भी इसीलिए होंगे कि बाहर से आये परदेसी को भी दूर से घेरा देखकर पाता चल जाय कि खरीद का कोई मेला चल रहा है.ये कुछ कुछ बिजली के तारों से टंगे ताश के पत्तों सा था जो दूर से भी हवा में फड़फडाते दिखकर शेरू उस्ताद के गाय छाप दंतमंजन का विज्ञापन करते.गोल घेरा मेले के बिकते तमाम अंजनों-मंजनों का विज्ञापक था.

वो मेले में जाता और चकरे को देखकर खुश हो जाता.फिर तो मेले में जाने के पीछे वजह ही ये व्हील हो गयी थी.

एक बार मेला देखने के बाद जब वो लौटने को था,उसकी नज़र फिर उस विशाल चकरे की तरफ चली गई.मेले में घूमने के दौरान तो उसने कई बार इसे देखा ही था.इस बार उसकी इच्छा हुई कि इसे पास से देखा जाय.वो उस जगह चला गया जहां ये घेरा लगा हुआ था.इस दैत्याकार चक्र को नज़दीक से देखकर उसके अन्दर कुछ बदल गया.उसे लगा उसके अन्दर कुछ चटक गया है.उसे यकीन था कि उसने कोई आवाज़ भी सुनी थी अपने अन्दर कुछ टूटने की.वो उस विशाल घेरे को देखता रहा.उसमें लगे कई सारे छोटे छोटे केबिन,जिनमें लोग बैठे थे.वो देर तक वहां खड़ा रहा.वो घेरा जब घूमने लगा तो उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो उसमें बैठे लोगों को आसमान की सलेटी पपड़ी तोड़ कर अन्तरिक्ष के ठन्डे अँधेरे में फेंक आएगा.पर कुछ ही देर में वो उन्हें नीचे ले आया.चकरा ऐसा ही करता रहा.वो कुछ को ऊपर से नीचे ले आता तो साथ ही साथ कुछ सवारों को अनंत ऊंचाई पर ले जाता.जब ऊपर से लोग नीचे आ जाते तो उसे राहत महसूस होती.वो प्रार्थना करता कि घेरा यहीं रुक जाय.पर वो फिर लोगों को ऊपर की ओर ले जाता.उसे इसमें संदेह भी होने लगा कि ऊपर से वापस नीचे पहुंचे लोग वही हैं जो कुछ देर पहले ही घेरे के साथ ऊपर चढ़ने लगे थे.उसका मानना तो यही था पर उसके भरोसे में ठोस जैसा कुछ नहीं था.क्या ऐसा तो नहीं हो रहा कि ऊपर जाकर ये घेरा उन लोगों को फेंक कर कोई और ही चीज़ इंसानी शक्ल में नीचे पहुंचा रहा हो?'पर इस तरह की सोच का भी कोई आधार नहीं है'-वो सोचने लगता.

उसकी बड़ी इच्छा हुई थी इस व्हील में बैठने की.पर साथ ही एक अजाना सा डर उसके अन्दर पलने लग गया था.हो न हो,उसे लगा,इस डर की वजह कहीं न कहीं उससे ज़रूर है जो उसके अन्दर कहीं बिड़क गया था.उसे लगा ये व्हील असल में उसे ललचा रहा है.ये लगाया गया ही इसलिए है कि उसे ललचा कर अपने में बिठा ले और फिर कभी वापस न ले आये.

वो चक्के में कुछ जिंदा शै देखने लग गया था.कई बार उसने कोशिश की कि मेले में घूम लेने के बाद वो उस चक्के की तरफ देखे ही ना पर बहुत दूर आ जाने के बाद जब वो पीछे मुड़ कर देखता तो वो चक्का उसे ही घूर रहा होता.वो पूरे शहर से दिखाई देता था.उसके घर की छत से भी वो दिखाई देता था.इसका परिणाम आखिर ये हुआ कि बाद में उसने, मेले के दिनों में, छत पर जाना छोड़ दिया था. फिर जब मेला आखिर मेला ही उखड गया तब जाकर वो चक्का भी उखड़ गया.


(हारुकी मुराकामी की किताब 'स्पुतनिक स्वीटहार्ट' में मियु नामकी महिला का ऐसे ही विशाल चक्र के गंडोला में रात पर फंसे रहने का ज़िक्र है.बिग व्हील उसके कैबिन के ऊपर पहुंचते ही रुक जाता है और रात भर वहीं,ऐसे ही रुका रहता है.मियु वहां से दूरबीन के ज़रिये बिलकुल सामने ही दिखते अपने फ्लैट को देखती है.फ्लैट की खुली खिड़की से जो कुछ वो देखती है,वो हतप्रभ रह जाती है.फ्लैट में वो एक वैकल्पिक यथार्थ में खुद अपने को ही ऐसे आदमी के साथ बिस्तर पर देखती है जिसे वो सख्त नापसंद करती है.वो आदमी उसे निर्वस्त्र कर उसके शरीर का भोग करता है.फ्लैट में सोई 'दूसरी वो'उसके इस कृत्य में मूक सहमति सी देती प्रतीत होती है.

फेरिस व्हील में इतने ऊपर से ही वो एक दूसरे आयाम में चलती दुनिया देख पाती है.)

Tuesday, September 2, 2014

गोलगप्पे

उसे मुंह में सुबह से ही कुछ फीका फीका सा महसूस हो रहा था.ज़बान पर एक बेस्वादी सी परत चढ़ी थी.वो जीभ को मुंह में घुमाता,गालों की अंदरूनी दीवारों पर,मसूड़ों पर, नीचे, सब जगह. पर कहीं कोई ज़ायके का अणु नहीं था.यहाँ तक कि तालू पर से भी मिठास ग़ायब थी.उसकी इच्छा हुई कि सिगरेट पी जाय.वो पीता नहीं था.बस कभी कभार ही उसने दोस्तों के साथ  छल्ले उड़ाए थे और हर बार उसे सिगरेट पसंद नहीं आई थी.देर तक सांस के साथ तमाखू की गंध लदी रहती.आज उसके मुंह के इस अजीब से फीकेपन ने ही उसे अन्यथा नापसंद सिगरेट के जैसे विकल्प की ओर सोचने को मजबूर कर दिया था.वो सिगरेट के धुंए से इस फीकेपन को जला देना चाहता था.सिगरेट के ज़रिये ही उसे अपनी स्वादहीनता से लड़ना था, बस इसी वजह से कुछ हिचक सी बाकी थी.ये झिझक कुछ देर और बनी रही और इसका परिणाम ये हुआ कि निर्णय पर पहुँचने से पहले ही उसने इस विकल्प को खारिज कर दिया.उसे लगा इससे शायद बात नहीं बनेगी.वो एक अजीब सा मिक्स बन जाएगा.फीकास में जैसा जला हुआ कोयला रगड़ दिया हो.वो बहुत उत्साहित नहीं हो पाया था और उसने ये विचार छोड़ दिया.

वो चलता जा रहा था.शहर में बिना नक्शा देखे वो कहीं से भी घर पहुँच सकता था. और घर से कहीं भी जा सकता था.शहर उसका देखाभाला था.आज,पर वो शहर में जहां चल रहा था वो उसे जानी पहचानी सड़क नहीं लग रही थी.उसे इसका कारण समझ में नहीं आया.ऐसा उसकी साथ देती याददाश्त में कभी हुआ नहीं था.पर फिलहाल उसका ध्यान इसका विश्लेषण करने पर बिलकुल नहीं था.इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि शहर में वो किस जगह या गली मोहल्ले में चल रहा है.वो कहीं से भी, कभी भी घर पहुँच सकता था.उसे फिलहाल मुंह के बिगड़े जायके से परेशानी थी.ज़बान को जैसे लकवा मार गया था.उसके सारे ऊद्दीपन ख़त्म हो गए थे.

किनारे पर थोड़ी दूर उसे गोलगप्पे का ठेला दिखाई दिया.गोलगप्पों का वो कोई फैन नहीं था.बल्कि कई बार वो इन्हें ओवररेटेड कमोडिटी कहता था.क्या था इनमें?खट्टा-नमकीन द्रव और उसे थामती एक कमज़ोर सी भित्ति.इस तीखे से पानी को स्वादिष्ट तो कैसे कहा जा सकता है?और इसके पतले खोल को भी चबा जाने के पीछे का कारण स्वाद से जुड़ा नहीं हो सकता.बल्कि इसे खाया जा सकता था इसलिए खा लिया जाता था.अगर ये रबर या प्लास्टिक का बना होता तो शायद च्युइंग गम की तरह थूक दिया जाता.
क्यों लोग फिर भी गोलगप्पों के पीछे भागते थे?वो इस तरह के सवाल इसीलिए सोच पा रहा था क्योंकि अगर उसका मुंह इस तरह फीका नहीं होता तो वो गोलगप्पे खाने के बारे में सोचता भी नहीं.गोलगप्पों को लेकर इस हालत में भी उसके मन में द्वंद्व ही था जिसकी परिणति उसके मन में इस तरह के सवालों के रूप में हो रही थी.

वो सोचता जा रहा था कि क्या वजह हो सकती है कि लोग ख़ूब तादाद में 'पानी -पतासों' के पीछे लगे रहते थे और कई बार तो ठेले वाले के आगे पहले दिए जाने को लेकर चिरौरिया तक की जातीं थीं.बहुत वाजिब और ठोस तर्क तो उसके पास नहीं था पर उसका कुल मिलाकर यही सोचना था कि गोलगप्पा मुंह में जाकर एक दम से फूट जाता था और एक तीखा सा हमलावर किस्म का स्वाद सहसा मुंह में छा जाता था.खाने वाला इसी घटना के फिर होने की स्थितिया पैदा करने के लिए एक और खाने की ओर प्रेरित होता होगा.उसके बाद फिर एकऔर.यूँ एक और एक और की स्थितियां बनती रहतीं होंगीं.ये सब स्वाद से ज़्यादा एक खेल का असर छोड़ता था.जैसे ये स्वाद के साथ एक तरह का खेला गया खेल था.

गोलगप्पों का ठेला थोडा हटकर था.ट्रैफिक से हटकर.ठेले के पास खड़े होकर ट्रैफिक को खासी दूरी से ही आवाजाही करते देखा जा सकता था.शाम का वक्त था और अँधेरा ख़ूब जमा हो गया था इसलिए वो गाड़ियों को लाल पीली धारियों में खिंचते या कभी रोशन बिन्दुओं में विखंडित होते देख रहा था.इसमें उसकी दिलचस्पी जल्द ही ख़त्म हो गयी.वो ठेले के आसपास केन्द्रित हो गया.ऊपर पीपल की झुकी हुई डालियाँ थीं.पत्तों पर कहीं से कृत्रिम प्रकाश गिर रहा था.उसने पत्तों में कुछ असामान्य देखा.ये उन पर गिर रही रौशनी की वजह से तो नहीं था.पत्तों से जैसे रंग छूट रहा था.वे जगह जगह से बेरंग हो गए थे.पत्तों पर जैसे अमूर्त सी आकृतियाँ बनी हुई थी.कुल मिलकर ये सब इतना असुंदर था कि उस तरफ देखने का मन ही नहीं करता था.आसपास कहीं भी पीपल का तना नहीं दिख रहा था.शायद पेड़ पास की पुरानी दीवार से सिर्फ टहनियों जितना ही निकला था.दौड़ते भागते हांफते शहर के पास ये जगह कितनी चुप-सी थी?ऊपर से पीपल के पत्तों से झरता सन्नाटा.पुरानी दीवार की दरारों से झांकता बियावान.ठेले वाले की मटकी प्राचीन मृदभांड की ओर इशारा कर रही थी.उसे लगा वो किसी निर्जन ढूह पर खड़ा है.दूर किसी और समय में कोई शहर अपने दिन को ख़त्म कर घर की ओर भाग रहा था.उसके पास भी कम से कम एक आदमी तो और खड़ा ही था.और ये भी कोई कम तसल्लीबख्श नहीं था.


Thursday, August 7, 2014

छविकार

मैं हमेशा उसे राह चलते देखा करता था.वो एक फोटोग्राफर था.मेन रोड पर उसकी दुकान थी.दुकान पर साइड में एक डेस्क के पीछे वो खासी आरामदायक कुर्सी पर बैठा रहता.उसे मैं हमेशा वहीं बैठे देखा करता था.उसे यही मुद्रा सूट करती थी.उसका कद दरम्याना था पर उसमें जो बात ध्यान खींचती थी वो उसका मोटापा था.वो खासा मोटा था.पर उसका मुटल्लापन ठाठदार था.कुछ कुछ कपूर ख़ानदान जैसा.या नुसरत फ़तेह अली ख़ान की तरह. भव्य.

वो अक्सर रेशमी कुरता पहने होता था.ये पूरे भरोसे के साथ नहीं कहा जा सकता कि उस आदमी की तरफ ध्यान खींचने के लिए सिर्फ उसकी देह का प्रसार-भराव ही ज़िम्मेदार था.शायद इसमें कुछ योगदान उन दिनों फोटोग्राफी के ठाठ का भी था.कैमरा थामने वाला हर शख्स कुछ ख़ास ही लगता था और उसके जैसे लोग अपने भरे पूरे शरीर के साथ कैमरे वाले होकर और भी फबते थे.उसकी दुकान के बाहर एक लम्बे पैनल में बहुत सारे रंगीन और श्वेत श्याम फ़ोटोज़ लगे थे जिनमें मुस्कुराते हुए लोग उसके हुनर की गवाही देते लगते थे.उन चित्रों में कई लडकियां भी होतीं थीं और वे किन्हीं दूर देशों से आईं लगतीं थीं.उनका सौन्दर्य गज़ब का था पर वे इतनी अप्राप्य लगतीं कि उन्हें उस भूगोल का होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था.कुछेक फ़ोटोज़ में 'लोकल' लड़के लड़कियां भी दिखाई देते जो दुकान के किसी मुश्किल कोण में बैठे हुए होते,जहां बहुत आसानी से नज़र नहीं जाती.ये देसी छैले और ललनाएं-छलनाएँ वहां 'आउट ऑफ़ प्लेस'लगते थे.उनकी मुस्कान में पीड़ा थी. और उनकी आँखों में हैरत. उनकी ठुड्डीयां बाहर को निकलीं,फ्रेम से बाहर आतीं लगतीं.वे छायाचित्रों की दुनिया के थे ही नहीं.पर डिस्प्ले में लगे बाकी ज़्यादातर फ़ोटोज़ दुकान का कुशल विज्ञापन करते थे.उससे भी ज़्यादा डेस्क के पीछे बैठे महोदर का.हो सकता था और जिसकी ज़्यादा सम्भावना थी कि वे सुंदर पोर्ट्रेट फोटोज़ उस स्थूल-भद्र के कैमरा कौशल का परिणाम थे ही नहीं,शायद वे किसी और ही शहर से ख़रीदे हुए थे,पर उन चित्रों ने वहां लग कर यही जताया था कि यही छविकार इन सब चित्रों का प्रथम और मौलिक छायाकार है.उस आदमी की दुकान एक छोटी सी जुदा सृष्टि महसूस होती.एक ऐसी सृष्टि जिसमें अगली पांत के लोग उस दुनिया को बेहद दिलकश और हसीन बनाते थे. इन सबने उस स्थानीय फोटोग्राफर को लार्जर देन लाइफ इमेज प्रदान कर दी थी.मेरे लिए तो कम से कम वो इन्सान न होकर खुद अपना ही एक बेहतर फोटो था जिसे उस सड़क पर आते जाते हर बार डेस्क के पीछे देखने की इच्छा होती थी.

कई बार उसे कांच के गिलास में चाय पीते देखा करता था.कांच का गिलास उसके हाथ में आते ही क्रिस्टल का कोई भव्य गिलास दिखने लग जाता था.और चाय उसमें चाय न लगकर देवताओं का कोई पेय लगती थी जो हम लोगों के लिए हमेशा अलभ्य थी.मैं कई बार उसकी दुकान में इस तरह उसे देख घर जाकर कांच के गिलास में चाय पीता था, कुछ कुछ उसकी विशिष्ट मुद्रा में ही.बावजूद इसके चाय पीने के मेरे उस अनुभव में किसी भी प्रकार की दिव्यता नहीं महसूस हो पाती थी.मैं भरसक सावधानी बरतता था.कांच का गिलास.उसमें भरी चाय.उतनी ही मात्रा.यानि पूरी भरी होने से ज़रा कम.रंग से कड़क.उसी तरह बांये हाथ में थामने की क्रिया. इन सबके बावजूद सब कुछ पार्थिव ही बना रहता.

मैं अगर सड़क के दूसरी ओर होता तो उसकी दुकान दूसरी ओर लगभग पचास फीट दूर होती थी.और वापसी में मैं सड़क के दूसरी ओर से आ रहा होता तो उसकी दुकान के ठीक पास से तमाम फोटुओं को देखता गुज़रता था.उस वक्त मेरी चाल धीमे हो जाती थी पर उस आदमी को एकदम नज़दीक से देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था.मुझे पास से चलते वक्त भी यही लगता था कि वो आदमी अपने काले चश्मे से मुझे घूर रहा है और शायद उसे मेरा इस तरह दुकान को या उसे देखना पसंद नहीं है.मैं इसी झिझक के साथ धीरे धीरे चलता रहता और बिना सीधे उसकी ओर देखे अलग अलग पलों में  अलग अलग खूबसूरत लड़कियों के फोटो देखता रहता.वे फोटो अपने चटख रंगों के साथ मुझे लुभाने लगते.साथ ही उनमें कुछ ऐसा भी था कि लगता ये किन्हीं वास्तविक लड़कियों के फोटो नहीं है.उनकी सुन्दरता में कुछ ऐसा था जो विलायती ही नहीं विजातीय भी था.वे मुझे किसी गैर इंसानी शै के चित्र लगने लग जाते.और तब मुझे वो स्टूडियो का मालिक जादूगर लगने लगता.भले ही मैं अपने को समझाता कि ये फोटो इस आदमी ने शायद खींचे ही नहीं है पर दुसरे ही पल मैं सोचता कि ये मेरा अंदाज़ा ग़लत भी हो सकता है.फोटो उसके खींचे भी हो सकते है.हो सकता है पहले वो किसी और शहर में रहता हो या उसकी दुकान किसी और जगह रही हो जहां उसने ये फोटो लिए होंगे.और ये बात दिमाग में आते ही वो फिर जादूगर लगने लगता.जादूगर भी हाथ की सफाई से मजमा लगाने वाला नहीं.सच का.और उस दुनिया का जिसमें राजकुमारियां और तोते वगैरा होते है.इन सब ख्यालों के आते ही मैं कुछ कुछ घबराता जल्दी से आगे बढ़ जाने की कोशिश करता.जैसे वो आदमी अभी मुझे पल भर में किसी बड़े चौकोर साइज़ के फोटो में बदल देगा.हालांकि ये ख़याल भी अपने आप में कम आकर्षक नहीं था.

Tuesday, July 8, 2014

सड़क और बिजली के खम्भे

चौराहे से चौराहे तक सीधी सड़क थी.सड़क के बीच डिवाइडर पर बिजली के खम्भे थे जिनसे सड़क के दोनों ओर रात को रौशनी गिरती थी.ये खम्भे उन्नीसवीं सदी के किसी यूरोपीय शहर में लगे लैंप पोस्ट का लुक देते थे.खम्भों का लोहा ऐसी पॉलिश किये हुए था जिससे लगता था वो कुछेक सदियों से ठीक इसी सड़क पर हज़ार बारिशों में नहा चुके थे.पर ये सब दिखावटी था.सड़क की पूरी लम्बाई में खम्भे कुछ महीनों पहले ही लगाये गए थे.नगर के चुने हुए प्रतिनिधियों की संस्था का मानना था कि ये इस ऐतिहासिक शहर को हेरिटेज लुक देते हैं जबकि कुछ और लोग इसे प्रतिनिधी संस्था के सदस्यों के घर चूरमे का इंतजाम भर मानते थे. जो भी हो,ये कहा जा सकता है कि इस तरह की व्यवस्थाओं से शहर की सुन्दरता बढ़ती है. बाहर से आए किसी नए आदमी को तो ये सब और भी सुन्दर लगता है. ख़ासकर तब जब ट्रैफिक सड़क के साथ चौराहे तक एक आरामदायक प्रवाह में चल रहा हो.गाड़ियों की आती और जाती धाराएं कोलतार पर जैसे फिसल रहीं हों.

पर इस सड़क के साथ ऐसा नहीं था.यहाँ ट्रैफिक का प्रवाह सहज नहीं था.बल्कि वो,कह सकते हैं, कई जगहों से अराजक था.वो जगह जगह पर पानी में चूने की तरह फूटता था.खदबदाता था.

लोग इस सड़क को कई जगहों से लम्बवत काटते थे.वे सड़क को आड़ा,तिरछा, समकोण,न्यून कोण, हर कोण से काटते थे.वे सड़क के एक किनारे से दूसरे किनारे तक,डिवाइडर पर चढ़ते हुए,पहुँच जाते थे.बीच का डिवाइडर बिना रेलिंग लगे था और उसे आसानी से लांघा जा सकता था.लोग इसका फायदा उठाते थे और बेखौफ सड़क के दोनों अर्द्ध पार कर जाते थे. और ऐसा करते हुए वे तेज़ गति से आती गाड़ियों के टायरों को चीखते और लगभग रुकते,धीमा पड़ते देखते.गाड़ियों की गति में इस असहज क्रम-भंग के बावजूद सड़क पर झगड़ा-वगड़ा कम ही होता.किसी पैदल को चोट वगैरा भी कम ही लगती.कभी लगती भी तो सब कुछ इतनी जल्दी और इतनी आसानी से सीन पर से पौंछ दिया जाता कि सड़क की,बल्कि किसी की भी स्मृति में ये सब दर्ज़ ही नहीं होता था.पर किसी तमाशे के अभाव के बावजूद लोगों के सड़क के विरुद्ध चलने से सड़क की सुन्दरता बाधित होती थी.सड़क पर इस तरह की अराजकता उसके राजसी वैभव को ठेस पहुंचाती थी.असल में सड़क का भरपूर हुस्न देखना हो तो रात बारह से सुबह छः बजे के बीच ही इसके चौराहे से देखना चाहिए.उसी एक अवधि में सड़क रौशनी के खुमार में डूबी किसी सुंदरी सी लगती थी.

दिन में सड़क पर लगभग उस हाट मेले का माहौल रहता जिसमें ज़्यादातर  अफरातफरी मची रहती हो.ये पता करना मुश्किल था कि सड़क से आड़े तिरछे गुज़रते लोगों में से कितने लोगों के लिए इस सड़क पर चलना रोज़ का क्रम था.कोई बेहद चतुर जासूस जो महीनों इस सड़क को घंटों देखता रहे वही नोट करेगा कि एक आदमी रोज़ दिन में कई कई बार इस सड़क को डिवाइडर लांघकर पार करता है. वो आदमी स्टेशनरी की दूकान पर काम करता है और दुकान के सामने सड़क के उस पार एलआईसी शाखा के पास के खाली प्लाट के कोने में वो कई बार लघुशंका निवारण के जाता है.दुकान से जाते समय उसकी चाल में सुस्ती रहती है और आराम से चलते चलते ही वो कान पर जनेऊ खींच कर लपेट देता है.वापस आते समय वो आदमी थोड़ा अधिक सतर्क है.दुकान पर नए ग्राहक आ गए हैं.
इसी लाइन में पोस्ट ऑफिस के डब्बे से लगी चाय की थडी पर एक लड़का कप प्लेट धोता है.उसे सड़क के ट्रैफिक से मतलब नहीं हैं.वो टीवी पर आने के सपने देखता है.पास में ही वैष्णव ढाबा है.इसकी चिमनी से निकलता धुआं आसमान में कालिख जमा करता है.अगले चौराहे से कुछ पहले सरकारी हस्पताल है.इस वजह से इधर की  पूरी सड़क पर मरीजों और उनके परिजनों के आने जाने का दृश्य ही स्थाई रहता है.हस्पताल के बाहर दवाइयों की दुकानें हैं और उनसे लगते फ्रूट के ठेले.फ्रूट के ठेलों पर ज़्यादातर मुसम्मियों के ढेर लगे हैं.

सड़क दिन भर इन्हीं सब में खोयी रहती.उसके डिवाइडर पर लगे बिजली के खम्भे उनके दोनों ओर सड़क का पता बताने की कोशिश करते.

Sunday, June 1, 2014

किताब का जादू

वो एक लम्बे अरसे से इस किताब को पढ़ रहा था।किताब जैसे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा हो गयी थी। किताब उस आदमी में कुछ भी अतिरिक्त जोड़ती न थी। न कम ही करती थी। पर इस गणित से वो बेपरवाह था। किताब उसके पास रहती थी। ऐसा नहीं था कि किताब उससे किसी अदृश्य अस्थि-जोड़ से बंधी थी और वो उससे उदासीन हो गया था,बल्कि कई बार तो वो उसमें खोया रहता था। शायद उसने कई बार इसे पढ़ लिया था।पर तब भी कई बार वो एक ही शब्द या पंक्ति में दिन भर अटका रहता। इसमें किसी तरह की झुंझलाहट उसे नहीं होती थी।बल्कि ये एक किस्म का सम्मोहन था। वो उस एक शब्द या लाइन के बारे में सोचता रहता। फिर सोचने से हट कर उसके ख़ुमार में आ जाता।

वो किताब के जादू से बिंधा था।

किताब पढ़ते पढ़ते ऐसा अक्सर होता कि वो बुकमार्क डालकर उसे बंद कर देता। इस तरह वो हमारी दुनिया में लौट आता। फिर कुछ देर बाद वो फिर किताब के ज़रिये एक और ही दुनिया में चला जाता।किताब उसके लिए वो दरवाज़ा बन गयी थी जिसके ज़रिये वो दो मुख़्तलिफ़ दुनियाओं में आ जा सकता था।

किताब लिखने वाले की दुनिया से कुछ अलग होती थी वो दुनिया जिसमें वो किताब के ज़रिये प्रवेश करता था।असल में वो उसकी अपनी दुनिया होती थी भले ही जिसका आकार,किनारे,लम्बाई चौड़ाई वगैरह किताब में पहले से ही तय की हुई थी। पर उसके रंग, उसकी चमक और इस तरह की कई चीज़ें उसकी अपनी थीं जिनमें परिवर्तन का अधिकार उसके पास था।इस अलग और बहुत हद तक उसकी अपनी दुनिया के समंदर की नीलाभा कुछ अलग चमक लिए होती थी। उसकी नदियों के घाट कुछ अलग रंग के पत्थरों के बने होते थे और उनसे नदी में उतरती सीढ़ियां मोहक घुमाव लिए होतीं थीं। ऐसा भी होता था कि  वो अपनी इस दुनिया के रंग बदलता रहता था,उसके उभार बनाता बिगाड़ता रहता था और इस तरह किताब के दरवाज़े से जब भी वो अंदर की दुनिया में आता वो पिछली कई दुनियाओं से अलग होती थीं।

किताब के पास नाम थे,वो उन नामों को चेहरे देता। कई बार उन चेहरे के पीछे के लोग उसके बिलकुल पास के होते। महल्ले के। प्रेम करने वाली लड़की उसके कॉलेज की ही होती जिसे वो बरसों पहले,कॉलेज के आखरी दिन आखरी बार मिला था।ये बहुत मज़ेदार भी था। किताब  में आये जर्मन नाम वाली लड़की उसके महल्ले में ही रहती थी और बार का मालिक उसके पिछवाड़े में रहता सनकी अधेड़ होता था। उसमें आया क़िला उसकी नज़र के ठीक सामने दीखता मध्यकालीन जर्जर दुर्ग था पर किताब का चर्च उसकी देखी सत्तर के दशक की किसी फिल्म के गिरजे से से मिलता जुलता था। असल में उसने चर्च कभी देखा नहीं था। मतलब इस दुनिया में। फिल्मों में ज़रूर पुर्तगालियों के बनाए कुछ चर्च उसने देखे थे जिनमें से एक को उसने अपनी और किताब की दुनिया में जगह दे दी थी।

किताब और उसकी मिली जुली दुनिया जीवन से इतनी भरी थी कि एक बार बेहद ऊंचे पहाड़ी क़स्बे पर जब उसे सांस लेने में दिक्कत हुई थी और वो हांफने लगा था तो उसने किताब के पन्नों से ढेर सारी ऑक्सीजन खींच ली थी।