Thursday, December 17, 2009

प्रेमी वैम्पायर के बहाने प्रेम पर कुछ बिखरा सा


इन दिनों दो फ़िल्में देखी। सीक्वल।पहली थी ट्वाईलाईट जिसकी डीवीडी मुझे एक सहकर्मी मित्र ने दी जिनका बेटा हाल ही में विदेश से लौटा था। और दूसरी थी न्यू मून जिसे मैंने शहर के सिनेमा हॉल में देखी। मैं बहुत ज़्यादा फ़िल्में नहीं देखता और हौलीवुड की तो और भी कम पर जब ट्वाईलाईट को देखने का मौका नसीब हो ही गया औरउसके कुछ ही दिन बाद दीवारों पर इसकी सीक्वल 'न्यू मून' के पोस्टर देखे तो मन बना लिया कि इसके लिए हॉल में जाया जाये। कहानी के मूल में प्रेम कथा है पर प्रेमी वैम्पायर है यानी एक पिशाच। इसे कम खौफनाक और गले उतरने लायक बनाने के लिए उसे इंसानी खून से परहेज़ करने वाला बताया गया है और लगभग त्रिकोण बनाता एक वेरवुल्फ भी है जो भेड़िये में कायांतरित हो जाता है। खैर मैं इनकी कहानी बताने के लिए नहीं लिख रहा हूँ पर शायद इतना ज़रूरी था। यहाँ एक लड़की जो नश्वर इंसान है उसे एक पिशाच से प्रेम हो जाता है। इन दोनों फिल्मों का आधार इन्हीं नामों वाली किताबें है जिनकी कथा को लगभग वैसा का वैसा ही इस्तेमाल किया गया है।

इस तरह के पात्रों को लेकर फिल्मे खूब बनी है और बन रही है, पर इन दो फिल्मों के ज़रिये मैं अपने ग्रे मैटर की ताज़ा हलचल को आपके साथ बांटना चाहता हूँ। मामला इन फिल्मों का नहीं प्रेम का है जिसके बारे में इतना पढ़ लिया पर अपनी याद में इसका अक्स शुभ ही बना रहा। पहली बार शायद मनहूसियत के प्रतीकों को इसके साथ जुड़ता देखा है। वैसे तो वैम्पायर को वासना और शाश्वत तृष्णा के 'अशुभंकर' के रूप में लिया गया है पर यहाँ मामला निश्छल प्रेम का है। जिसे हम निर्मल और शुभ मानते आये हैं। इसमें प्रेम सिर्फ प्रेम है किसी चौहद्दी से बंधा नहीं। अपनी सीमाएं खुद बांधता या अपनी सीमाएं खुद लांघता। उन्हें अपने तरीके से विस्तार देता।
पिशाच का लड़की से प्रेम इतना वास्तविक है कि आपका उसके हक़ में बने रहने का मन करता है। वो बेहद सुंदर है जिसने यौवन को अपनी कोशाओं में बाँध लिया है। ११७ साल की उम्र में भी और जाने कितनी शताब्दियाँ और तलक। वो मृत्यु से परे है या कहें कि अमर होने को अभिशप्त है। और पराकाष्ठा देखें, लड़की जिद करती है कि वो भी उसे वैम्पायर बना दे ताकि उसका प्रेम हमेशा उपलब्ध रह सके। तमाम क्रिस्तानी नैतिकताएं उसे बाँध नहीं पाती। वो नागर से आरण्यक हो जाना चाहती है। जीवन और मृत्यु दोनों उसे नहीं लुभाते और वो हमेशा असमाप्त प्यास का वरण करती है।

यहीं पर हम फिल्मों और उसमें प्रयुक्त मिथकों को छोड़ते हैं। प्रेम की एनौटमी पर एक रौशनी या अँधेरा फेंकती है ये फिल्म। प्रेम के जिस्म का बड़ा हिस्सा वासना का है। ये वनैला है। ये शुभ-अशुभ से उदासीन है, इनके आड़े नहीं आता। असल में ये इसके क्षेत्र में नहीं आते। ये आदिम है। मौल या खोह कहीं भी पनप सकता है।
रात के अंधकार को गाढ़ा करती चमकती आँखों वाले किसी पशु की तरह इसका स्वतंत्र अस्तित्व है। अपने मौलिक रूप में इसमें मानवीय जैसा कुछ नहीं। बल्कि अपने चरम रूप में समान पाशविक सुख की कौंध इसमें निहित रहती है।
ये कतई ज़रूरी नहीं कि ये विश्लेषण इन दो फिल्मों को देखने का ही नतीज़ा हो पर इनको देखकर कुछ क्षैतिज चिंतन का अवकाश मिला और परवर्ती मंथन से ऊपर तैर आये झाग में इनकी कहानी गंध रूप में शायद विद्यमान हैं।

भूत बचपन के किस्सों का मुख्य पात्र रहा है पर उसमें मानवीय समाज से बाहर जाने की ताकत नहीं थी और अक्सर वो विदूषक की भूमिका में ही अवशिष्ट रह जाता था। जबकि फिल्मों के ये पात्र महासागरों की प्यास और पृथ्वी निगलने की भूख लिए आते हैं। इन्हें देखकर मनहूसियत तारी होने लगती है। पर प्रेम की ऊतक-संरचना को ये एक अजीब सी बैंगनी चमक प्रदान करते है।

(चित्र विकिपीडिया से साभार)

Sunday, December 6, 2009

कुछ भी शाश्वत नही


शहर के बाहरी छोर पर बने कैफेटेरिया से, अपने दोस्त के साथ एक बेहद आत्मीय सम्बन्ध का औपचारिक समापन कर वो वापस लौट रहा था. दोनों ने वहीं मिलना तय किया था . एक एक कॉफ़ी और समापन की औपचारिक घोषणा. बड़ी विचित्र बात थी कि हाथ मिलाने की औपचारिकताओं से शुरू हुआ ये रिश्ता ऐसी ही औपचारिकताओं से ख़त्म भी हो गया.हाँ इन दो छोरों के बीच कभी बहुत कुछ था, सब कुछ था. तरल,पारदर्शी,स्वच्छ.पर कुछ समय पहले बीच का तरल विस्तार सूखने लग गया था और जल्द इस सम्बन्ध का जीवन-द्रव सूखे भुरभुरे बंजर में बाकी रह गया.

बहुत ज़रूरी था इस सच को स्वीकार करना और भार से हल्का होना.
'मैं तुम्हे मुक्त करता हूँ' दोनों ने जैसे एक दूसरे को कहा.
कॉफ़ी का आखिरी घूँट बड़ा था.दोनों के चेहरों पर हलकी मुस्कान उभरी. किसी ने नही कहा कि पिछला साझा वक्त हमेशा याद रहेगा पर उस मुस्कान में कृतज्ञता का भाव ज़रूर था.
'तुम जियो हमेशा क्योंकि मेरे लिए मरना नहीं है'. घिसी पिटी किंतु अमर पंक्तियाँ. कहने की ज़रूरत नहीं थी पर उस मौन में ऐसा ही कुछ ध्वनित हुआ. दोनों कॉफ़ी के दौरान एक जैसा बोल रहे थे, मौन में भी.असल में ये स्वीकारोक्तियां थी. कैफेटेरिया से बाहर बाइक पर बैठते ही उसे तेज़ ठण्ड का अहसास हुआ।दिसंबर की कोई
रात थी,और इन दिनों में यहाँ ठण्ड के तेवर कड़क ही रहते थे.पिछले दो दिन से पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ गिर रही थी और ठण्ड के झपट्टे यहाँ अच्छी तरह महसूस हो रहे थे। बाइक चलाते समय उसे ठण्ड का अहसास और तेज़ होने लगा .वो शहर की तरफ जा रहा था और उसे शहर की रौशनी दूरस्थ आभा की तरह भी दिख रही थी पर फासला खगोलीय दूरियों में तय होता लग रहा था. पूरा रास्ता अँधेरे से एकाकार था.ऊपर आसमान भी गहरा काला था जो ठण्ड में और गाढ़ा हो गया था.बाइक अब ब्रह्माण्ड के सर्द अवकाश में चल रही थी.ठण्ड उसकी आत्मा को परम शून्य ताप में धकेल रही थी. एक रिश्ते की गर्मी ख़त्म होने से इसका कोई सम्बन्ध था या नहीं ये सोचने का फिलहाल उसके पास वक्त नहीं था.

शहर की रौशनी अब कुछ और नज़दीक रही थी। उसकी जीभपर कॉफ़ी का खारापन अभी भी मौजूद था। और ये शहर में दाखिल होते ही जाता रहेगा ये भी उसे मालूम था.एक जगह बाइक रोक कर उसने कांपते हाथों से सिगरेट सुलगाई और आसमान की ओर देखा। सितारे ब्रह्मांडीय ठण्ड में मुर्दा रौशनी फेंक रहे थे।इनमें से कुछेक करोड़-दो करोड़ साल और गर्म रहने की कोशिश करेंगे फिर दम तोड़ देंगे।एक रिश्ता भी इसी तरह अपनी चमक खोकर उसके आकाश से विदा हो चुका था।

वो फिर से बाइक पर था।ठण्ड उसे चीर कर गुज़रती रही.वो एक गति से शहर की ओर भाग रहा था.आखिर एकजगह उसे लगाकि वो रिश्ते के साथ ठण्ड को भी पीछे छोड़ता जा रहा था।दिन के उजाले में जो किला शहर के हर कोने से एक अकड़,ऐंठ के साथ दिखता था इस समय बिजली की चिमनियों में उसकी चमकती हुई पीलाभ बुर्जों का दिखना उसे सुकून दे गया। ये संकेत था कि वो सच में शहर की ओर ही जा रहा था. अब तक तो जैसे वो किसी निर्जीव आकाश गंगा की धूल उड़ाता अलक्ष्य ही दौड़ रहा था.

शहर के चौराहे पर बहुत ऊँचाई से रौशनी फेंकता हाई मास्ट जो दिन में जासूसी करता लगता था अब उसके स्वागत में खड़ा था.घर पहुँचने की उसे जल्दी नहीं थी. आखिर उसे वहीं जाना था पर इससे पहले वो शहर की आंच को सोख लेना चाहता था.परिचित चाय वाले को देख कर उसने बाइक वहीं खड़ी कर दी.
photo courtesy- sarabbit