
इस लीचड़ कीचड़ मौसम में फंगस की गुलाबी कंटीली झाडियाँ उसके शरीर में जगह जगह उग आयीं थीं.ऊपर से भगवान ने हर इंसान की तरह उसे भी नाखून बख्शे थे.मानसून में इतना परेशान वो शायद पहली बार हुआ था.पर उसकी चिंता का कारण ये मौसम हरगिज़ नहीं था. वो जानता था कि करारी धूप से भरा एक दिन उसके शरीर में सक्रिय फंगस के स्पोर्स को भी झुलसा देगा.और खुजली असल में ख़त्म करने से ज्यादा मैनेज करने की चीज़ थी. खुजाने की अदम्य लालसा को बाँध लेना ही उससे पार पाना है.
उसकी चिंता का तात्कालिक कारण तो था उसका ख़ुद को आईने में देखना. काफी गौर से वो न पहचान में आने वाले 'ख़ुद' को देख रहा था. उसकी भौंहें बड़ी बेतरतीब नज़र आ रही थीं. नाक में से बाल बाहर निकले थे.कोरियन ट्रिमर कैंची बड़े वक्त से कहीं टंगी रह गयी थी और उसका हुलिया बड़ा बेतरतीब हो गया था.कुछ और लक्षण थे जिन पर वो नए परिप्रेक्ष्य में गौर कर रहा था. सुबह के पहले पाँव इतने निश्चल होते गए थे कि जैसे बिस्तर से न निकलकर कब्र की नम और सीली मिट्टी से बड़ी जद्दोजहद से निकले हों.आँखें सुबह के रंग देर से सोख पा रहीं थीं. कानों में देर तक सन्नाटे गूंजते थे और ज़माने का शोर धीरे धीरे उनमें भर पाता था. नहीं, ये उम्र बढ़ने के लक्षण नहीं थे. मतलब इन्हें एकदम उम्र बढ़ने के साथ जोड़ना काफी सरलीकृत पाठ होगा. तीस के पेटे में ये सब कहाँ होता है. और खासकर तब जब वो और तरह के बदलाव भी अपने भीतर नोटिस कर रहा था. ऑफिस में अटेंडेंट को बेवजह बुलाना और कभी कभी उसे देख कर कहना 'सावधान'! अपने सहकर्मियों को अपनी तरफ से बच्चों के घरेलू नाम देना और उन्हें देखकर हास्यास्पद अंदाज़ में, एक लय के साथ बुलाना. या फिर उनके नामों को बेवज़ह लंबा खींच कर बोलना. पत्नी को चूमते समय आज कल वो कभी कभी हंसोड़ की तरह मुस्कुरा देता था. बेशक उस समय वो नहीं देख पाती थी उसे ऐसा करते. वो अपने हिस्से की गंभीरता में पूरी गंभीर थी.
पागल वो हरगिज़ नहीं हुआ जा रहा था. घर के हिसाब में इससे काइंया वो पहले कभी नहीं हुआ करता था. दूधवाले की अनुपस्थिति घर के वैद्यनाथ पंचांग में वो मजबूती से ठोक देता था. अखबार वाला उसके हिसाब को फ़ाइनल मानता था. पिताजी की दवाओं का हिसाब वो विलक्षण दक्षता से करने लगा था. स्कूल की टैक्सी, बिजली पानी का बिल सब कुछ चाक चौबंद था.सत्रह तरह के लोन का निर्वाह वो पूरी सावधानी से कर रहा था. जानता था कि एक भी किश्त चूकने का मतलब है पार्टी फेल ! हिसाब में महारत के लिए उसने वैदिक गणित के लैसन शुरू कर दिए थे. जल्द ही हालत ये थी कि बही खाते के पीले पन्नों से वो ड्राइंग बुक की तरह खेलने लग गया था. फिर मसला क्या था? "कुछ भी नहीं." उसने तसल्लीबख्श अंदाज़ में सोचा फिर मुस्कुरा कर कैंची हाथ में ली और सधे हाथों से मूंछों को संवारने लगा. पत्नी शायद पहली बार उसके इस तरह मुस्कराने पर बोली- " इसमें इतना हँसने की क्या बात है?"
उसकी चिंता का तात्कालिक कारण तो था उसका ख़ुद को आईने में देखना. काफी गौर से वो न पहचान में आने वाले 'ख़ुद' को देख रहा था. उसकी भौंहें बड़ी बेतरतीब नज़र आ रही थीं. नाक में से बाल बाहर निकले थे.कोरियन ट्रिमर कैंची बड़े वक्त से कहीं टंगी रह गयी थी और उसका हुलिया बड़ा बेतरतीब हो गया था.कुछ और लक्षण थे जिन पर वो नए परिप्रेक्ष्य में गौर कर रहा था. सुबह के पहले पाँव इतने निश्चल होते गए थे कि जैसे बिस्तर से न निकलकर कब्र की नम और सीली मिट्टी से बड़ी जद्दोजहद से निकले हों.आँखें सुबह के रंग देर से सोख पा रहीं थीं. कानों में देर तक सन्नाटे गूंजते थे और ज़माने का शोर धीरे धीरे उनमें भर पाता था. नहीं, ये उम्र बढ़ने के लक्षण नहीं थे. मतलब इन्हें एकदम उम्र बढ़ने के साथ जोड़ना काफी सरलीकृत पाठ होगा. तीस के पेटे में ये सब कहाँ होता है. और खासकर तब जब वो और तरह के बदलाव भी अपने भीतर नोटिस कर रहा था. ऑफिस में अटेंडेंट को बेवजह बुलाना और कभी कभी उसे देख कर कहना 'सावधान'! अपने सहकर्मियों को अपनी तरफ से बच्चों के घरेलू नाम देना और उन्हें देखकर हास्यास्पद अंदाज़ में, एक लय के साथ बुलाना. या फिर उनके नामों को बेवज़ह लंबा खींच कर बोलना. पत्नी को चूमते समय आज कल वो कभी कभी हंसोड़ की तरह मुस्कुरा देता था. बेशक उस समय वो नहीं देख पाती थी उसे ऐसा करते. वो अपने हिस्से की गंभीरता में पूरी गंभीर थी.
पागल वो हरगिज़ नहीं हुआ जा रहा था. घर के हिसाब में इससे काइंया वो पहले कभी नहीं हुआ करता था. दूधवाले की अनुपस्थिति घर के वैद्यनाथ पंचांग में वो मजबूती से ठोक देता था. अखबार वाला उसके हिसाब को फ़ाइनल मानता था. पिताजी की दवाओं का हिसाब वो विलक्षण दक्षता से करने लगा था. स्कूल की टैक्सी, बिजली पानी का बिल सब कुछ चाक चौबंद था.सत्रह तरह के लोन का निर्वाह वो पूरी सावधानी से कर रहा था. जानता था कि एक भी किश्त चूकने का मतलब है पार्टी फेल ! हिसाब में महारत के लिए उसने वैदिक गणित के लैसन शुरू कर दिए थे. जल्द ही हालत ये थी कि बही खाते के पीले पन्नों से वो ड्राइंग बुक की तरह खेलने लग गया था. फिर मसला क्या था? "कुछ भी नहीं." उसने तसल्लीबख्श अंदाज़ में सोचा फिर मुस्कुरा कर कैंची हाथ में ली और सधे हाथों से मूंछों को संवारने लगा. पत्नी शायद पहली बार उसके इस तरह मुस्कराने पर बोली- " इसमें इतना हँसने की क्या बात है?"
(Image courtesy- Martin Beek )
वाह ! आपके डीटेल्स हतप्रभ करते हैं... और जो मानसिक खिंचाव का वर्णन है ऐसा तो तकरीबन हर निम्न-मध्ध्यम वर्गीय परिवार का प्यादा (इसे नायक भी समझें, लेकिन यहाँ क्या ?) करता होगा... बेहतर... आपकी पोस्टें छोटी होती हैं लेकिन फ्रेश करने के लिए उनमें पर्याप्त शब्द होते हैं... जिसे पहली वाक्य में हमने डीटेल्स कहा है.
ReplyDeleteसागर मियाँ क्या खूब कह गए....वैसे कहने का मन तो अपना भी है लेकिन फिर बाद में...
ReplyDeleteकभी कभी सोचता हूँ कि मैं इतना क्यों सोचता हूँ :-)
कमाल की वोकेब्लरी के धनी है आप.. जो गाहे बगाहे आपकी पोस्ट में दिख ही जाता है..
ReplyDeleteखुजाने की अदम्य लालसा को बाँध लेना हीउससे पार पाना है.
क्या बात कही है.. जबरदस्त ना कहा जाए तो क्या कहे.. पत्नी की उसके हिस्से की गंभीरता.. वाह.. क्या बात कह दी हुज़ूर
खुद को आईने में ढूंढता ये आम चेहरा इतनी सिलवटो में एक सिलवट अपने गालो पर भी लाकर मुस्कुरा देता है..
अजी ठीक कहा आपने.. इसमें इतनाहँसने की क्या बात है?
शब्दों का अप्रतिम समन्वय. बहुत सुन्दर.
ReplyDeleteबहुत खूब ! क्या कहने ! हमेशा की तरह दूर तक ध्वनि देते शब्द , कई स्तरों में खुलते जाते !!
ReplyDeleteआपकी निगाह बड़ी गहराई तक बेधती है !
reflection of my current lifetrack... almost cent percent.
ReplyDeletethanks for writing such a nice post..
can i request you to pen down more frequently.
Manoj K
जीवन का प्रतिबिम्ब।
ReplyDeleteसुबह सुबह आईने में असली सूरत देखना कष्टदायक है ......
ReplyDeleteजानते है हम वही बने रहना चाहते है .२० २५ के बीच वाले......ओर तमाम तरकीबे लड़ाते है की दुनिया भी उसी चश्मे से देखे .....
i consider it one of your best.....
संजय भाई इसे पढ़ते हुए मैंने बहुत आनंद उठाया. जिन चीजों की मैं हर बार तारीफ करता आया हूँ वे और बेहतर है. इस बार सहजता अधिक प्रभावित करती है. वैसे मैं इसके बारे में अधिक लिखूंगा तो भी वह नहीं कह पाऊंगा जो मैंने इसे पढ़ते हुए जीया है. बधाई.
ReplyDeleteयह ज़िन्दगी जैसे सदियों से चली आ रही कोशिशों से भी *ट्रिम* नहीं हो पाएगी. मेरी भी कोरियन कैंची ज़ंग खा गई है. .... अच्छा लगा यह पोस्ट.
ReplyDeleteIt was perfect... all I can say is ... "If Hindi news papers in our area(wednesday,friday editions specifically ) had been decorated with these kind of articles.. ppl like me wouldn't have lost interest in them .... "
ReplyDeleteआज दिनांक 14 सितम्बर 2010 के दैनिक जनसत्ता में हिन्दी दिवस के दिन संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्तंभ में आपकी यह पोस्ट अन्याय के दरवाजे शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्कैनबिम्ब देखने के लिए जनसत्ता पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।
ReplyDeletebadhai ho ... :) ... btw its on page no. 4 :)
ReplyDeleteसंजय जी
ReplyDeleteनमसकर !
जन सत्ता में आप का आलेख पढ़ा था ,
साधुवाद !
सुन्दर .... सुगठित ....वैचारिक...शैलीगत...अतिसुन्दर.... बात बनी है...शुभकामनाएं
ReplyDeleteजीवन क्या है?
ReplyDeleteयही तो है ----------
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteअर्थ के अलावा आपके ये शब्द एक वातावरण भी निर्मित करते हैं. (यह शायद मैं पहले भी कह चुका हूं किसी अन्य पोस्ट पर). इसके अलावा हर चित्रण में एक तनावयुक्त सन्नाटा रहता है. ......"अवसन्न-" सा कुछ !
ReplyDeleteइस रचना का शिल्प बेहद आकर्षक है ।
ReplyDeleteक्या कहूँ पढ़ते वक्त अखिलेश जी की एक कहानी याद आती रही देर तलक..मगर इसका आसर बहुत बाद तक बना रहता है..अगरबत्ती के धुएँ की तरह..अदृश्य..ऊपर से ज्यादा दुनियादार होते जाना अंदर से कहीं कुछ छीजते जाना भी है..अस्तित्व का कोई टुकड़ा जो कहीं गुम हो जाता है..मगर जेहन मे देर तलक अटका रहता है..कैंची से बावस्ता मुस्कराहट और कानों मे गूँजते सन्नाटों के बीच कहीं कुछ होता है.,,कुछ खोया सा..जो आइने को भी नजर नही आता..और इसी हैरत के बीच चेहरे की दीवार के किसी टूटे हुए हिस्से को दूसरों से छिपा लेने के लिये उसी जगह पर वह मुस्कराहट का फटा पोस्टर टाँग दे्ता हैं..महर वह क्या है..पोस्ट बार-बार पढ़ने के बाद भी फिसल जाता है हाथ से..अबोध जिज्ञासा सी...मगर खुजली खत्म करने से ज्यादा मैनेज करने की चीज होती है..नही क्या?
ReplyDeleteअन्गुलीयोन ने मस्तिष्क का एक्स रे सुइ की नोक से लिखा है संजय जी ये टेक्नोलोजी सिर्फ़ आपकी अन्गुलियोन को ही नसीब् है...
ReplyDeleteबार बार आकर लौट रहे हैं. अगली पोस्ट की प्रतीक्षा है. कृपया सूचित भी कर दें.
ReplyDeleteआपकी भाषा अनुकरणीय है|
ReplyDeleteबहुत सुन्दर शिल्प में गुंथा अनुपम आलेख पढ़कर मन प्रसन्न हुआ.
ReplyDeleteबहुत ख़ुशी हुई आपके ब्लॉग पर आकर....आभार
दीपपर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ