Tuesday, March 12, 2013

जाते हुए लोग



आसमान काला है.
तिरछी गिरती बारिश की धारें
किसी नामालूम जगह से आतीं हैं

चौराहे की हाई मास्ट लाइट गुल है
ट्रैफिक कुछ और तेज़ भागता  है
लोग बदहवास लगते हैं.

आते हुए साइकिल सवार को लगता है
लोग शहर छोड़ कर भाग रहें हैं.
उसे युद्ध पर बनी कोई फिल्म याद आती है
जिसमें लोगों का पलायन
किसी अँधेरी रात में हो रही  
मूसलाधार में होता है
साइकल सवार की सोच में 
कोई सिनेमाई पृष्ठभूमि है
पर इस गुज़रते धुंए और शोर में
कई पलायन वास्तव में घटते है

इनमें से कुछ इस चौराहे पर लौट कर नहीं आते
कोई इस शहर में दाखिल नहीं होता दुबारा
उनकी साइकल के कैरियर में
कुछ भी नहीं बंधा है
इस जगह से कुछ भी ले जा नहीं रहे
पर उनके पैडल पर आघात को
इस शहर का गुरुत्व
बेअसर सा करता है.

न लौटने वालों को देखते हैं बिजली के बुझे खम्भे
थोडा उचकते हुए  
थोडा और बुझते हुए.

उस पार का एक मंदिर इस खग्रास में
किसी दिए की उम्मीद खो चुका है
एक बड़ी इमारत की छाया
उससे भी बड़ी
उससे भी डरावनी लगती है.

18 comments:

  1. कविता सिनेमा के किसी दृश्य की तरह स्लो मोशन में खुलती है...दृश्य बारिश की तरह जज़्ब हो जाते हैं. भीगती, उलझती सोचती हूँ उदासियों का ये श्वेत श्याम चलचित्र कितना खूबसूरत है.
    पलायन से उग आने वाले निर्वात को काले स्केच पेन से भरता...चुप्पी को साईकिल की घंटी से तोड़ता...कवि जैसा ज़ख्म रचता है कविता में वैसा ही दर्द पढ़ कर महसूस होता है.

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    1. इस मूल्यवान टिप्पणी के लिए शुक्रिया.

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  2. Ek badi imarat kii chaya... Ek bade jeevan se vrihad kavita.

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    1. शुक्रिया किशोर दा साथ बने रहने के लिए.

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  3. शानदार कविता. संग्रह तैयार कर लें भाई! जल्दी!

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  4. बहुत ही सुन्दर सरस कविता,आभार संजय जी.

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  5. अधंकार के आने की आशंका भय से आती है..अस्पष्ट सा लगता है सब कुछ..

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    1. जी हाँ सर कुछ ऐसा ही लगता है..

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  6. आपको पढ़ना अच्‍छा लगता है.

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    1. शुक्रिया पृथ्वी जी.आपके छपे हुए को पढना और अच्छा लगेगा.किताब की बधाई.

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  7. आसमान काला है.
    तिरछी गिरती बारिश की धारें
    किसी नामालूम जगह से आतीं हैं
    ......पर इस गुज़रते धुंए और शोर में
    कई पलायन वास्तव में घटते है
    उस पार का एक मंदिर इस खग्रास में
    किसी दिए की उम्मीद खो चुका है
    एक बड़ी इमारत की छाया
    उससे भी बड़ी
    उससे भी डरावनी लगती है.

    कुछ अजीब सा ...गहराता सा दर्द .....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....

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    1. आभार अनुपमा जी.

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  8. जीवन के विचित्र मौसम, मोड़ और मर्म पर असामान्‍य अनुभव से युक्‍त पंक्तियां। वर्षामय, रहस्‍यमय कविता।

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  9. क्या बात है!
    शहर की हर दीवार कवि के दर्द से रंगी है ....

    उस पार का एक मंदिर इस खग्रास में
    किसी दिए की उम्मीद खो चुका है
    एक बड़ी इमारत की छाया
    उससे भी बड़ी
    उससे भी डरावनी लगती है.

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  10. "न लौटने वालों को देखते हैं बिजली के बुझे खम्भे
    थोडा उचकते हुए
    थोडा और बुझते हुए. "
    आशा का टूटना सबसे दर्दनाक होता है.समय की गर्म पथरीली धरती पर ,आशा ही तो है जो कदम आगे ले जाने का हौसला देती है....लालच देती है......सुंदर सरल शब्दों में उकेरा गया दर्द ....वाह.....

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  11. Sir ji gudevening .... Mene apake khoi hui jagah lekh jansatta me pada ....mujhe pad ke bahut accha laga ...;jisaki vajah se me aapake blog par aaya aur kai nai dher sari kavitaye padane ka moka .. Mila .... Sir app bahut accha likhate he ,, me bhi kuch koshish karta likhne mene bhi kuch lekh kitabe bolti he ,,,, karke likha jise me jansatta me dena chahta hu .. App meri madat kare ki me apana lekh vaha tak kese pahucha sakta hu ... Thank you ....

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