मेरा इनसे रिश्ता तेरह साल पहले कहीं जाकर जुड़ता था। उसके बाद के इन सालों में इस रिश्ते को कई मुलाकातों से होकर और बड़ा होना था ख़ास कर तब जबकि पिछले आठ सालों से मैं इन्हीं के शहर में था। पता नहीं ऐसा क्या था कि आज से पहले मेरा इनसे सिर्फ़ एक ही बार मिलना हुआ था और ये आंकडा एक पर ही अटक गया।
१९९५ में मैं जैसलमेर में नौकरी कर रहा था। नई नई ही थी नौकरी। लगभग घर जैसा ही था जैसलमेर। भाषा, माहौल और लोग। एक जैसे। घर था बाड़मेर में और मैं था जैसलमेर में। फासला भी बहुत ज़्यादा नहीं। एक सुस्ताते शहर से दूसरे अलसाए में। इन की निद्राएं सदियों में टूटती थी।उन दिनों भी जागने को तैयार नहीं थे ये शहर।
उन्ही दिनों एक कहानी लिखने की कोशिश की थी। और आख़िर कुछ पन्नों में उसे समेट कर पहले हंस पत्रिका को भिजवाया।वापसी का लिफाफा इतना जल्द वापस आया कि लगा जैसे डाक विभाग ने ही अपने स्तर पर उस कहानी को खारिज कर दिया था। हार नहीं मान कर, उस कहानी को फ़िर से छोट मोटे परिवर्तनों के साथ फ़िर लिखकर इस बार 'चर्चा' पत्रिका के लिए सम्पादक योगेन्द्र दवे को भेज दिया। कुछ दिन बाद डाक से एक पत्र आया जिसमे योगेन्द्र जी ने कहानी की तारीफ करते हुए इसे 'चर्चा' के अगले ही अंक में छापने की बात कही। मेरे लिए ये उत्सव मनाने का अवसर था। चर्चा पत्रिका उन दिनों जोधपुर से छपने वाली एक प्रतिष्टित पत्रिका थी जिसे योगेन्द्र दवे अपने नितांत निजी प्रयासों से अनियमित रूप से निकालते थे।
इस बात को छः महीने गुज़र गए। पत्रिका का अंक आ नहीं रहा था। एक दिन जोधपुर पहुँच ही गया और अपने भाई साहब जो जोधपुर में ही रहते थे को लेकर योगेन्द्र जी के घर दरवाजा खटखटाने लगा। योगेन्द्र जी से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी।
एक दूसरे शहर से जोधपुर की इस कदीम, भूल भुलैयानुमा बसाहट में मिलने आए, इस छोरे से दिखने वाले युवक से योगेन्द्र जी जिस आत्मीयता से मिले उसका प्रभाव स्थाई था। योगेन्द्र जी का व्यक्तित्व सरल और सहज था। कोई भी उनसे दोस्ती कर सकता था। ख़ुद उनकी कई किताबे आ चुकी थी और बच्चो के लिए उनका अपना मौलिक- काम था। एक लेखक के तौर पर उनका अवदान महत्वपूर्ण गिना जा चुका था।
जब मैंने पत्रिका के प्रकाशन में देरी के विषय में पूछा तो उन्होंने उन्ही कुछ दिक्कतों के बारे में बताया जो लघुपत्रिका चलाने में आमतौर पर आती आई हैं। कुल मिलाकर पत्रिका अब सिर्फ़ योगेन्द्र दवे के एकल प्रयासों पर ही टिकी थी।
खैर, पत्रिका का वो अंक असंख्य पन्नों के रूप में उनके घर में ही पड़ा था जिसे बाईंड होना था।
मैं वहाँ से लौटा तो फ़िर से उत्साहित था। हालांकि अंक अंततः मेरे हाथ में कोई महीने दो महीने बाद ही आ पाया था।
सन २००१ में मैं जोधपुर आ गया था और अभी तक यहीं टिका हुआ हूँ। इस बीच चर्चा पत्रिका बंद हो चुकी थी। एक लेखक के रूप में अभी भी मेरे पास चर्चा में छपी कहानी ही एक बड़ी पूँजी है। ब्लॉग में लिखने से इस पूँजी का विस्तार हुआ है ऐसा भी मानता हूँ। जोधपुर आने के इन आठ सालों में मैं योगेन्द्र जी से कभी नहीं मिला। उनके बारे में भी सुना था कि आजकल वे लिखते नहीं। रेडियो में, जहाँ मैं काम करता हूँ वहाँ भी इन सालों वे कभी आए नही अन्यथा यहाँ उनके पहले के लिखे कई नाटक आज भी टेप्स में सुरक्षित है। कई बार उनसे मिलने के बारे में सोचा पर आख़िर अनिच्छा हावी हो जाती। एक ही शहर में रहते हुए न मिलना शायद आज उतना आर्श्चय न लगे पर इसे दोष मेरा ही माना जाएगा। उनका पता उनके नाम के अलावा सिर्फ़ दो शब्दों का था। फ़ोन भी किया जा सकता था। शहर अभी भी बहुत बड़ा हुआ नही था। फ़िर भी.....
पर एक दिन, इन्हीं दिनों
हंस पत्रिका के जुलाई अंक में उनकी लघुकथा देखी तो महसूस हुआ कि समय चाहे जितना च्युंग गम की तरह खिंच जाय इसकी आरंभिक मिठास होठों पर बनी रहती है। मुझे लगा मैं आज भी योगेन्द्र जी से उतनी ही सहजता से मिल सकता हूँ।पर अभी भी शायद, मिलने की उम्मीद से ज्यादा, ये खुशी उन्हें एक लेखक के रूप में वापस देखने की थी।
१९९५ में मैं जैसलमेर में नौकरी कर रहा था। नई नई ही थी नौकरी। लगभग घर जैसा ही था जैसलमेर। भाषा, माहौल और लोग। एक जैसे। घर था बाड़मेर में और मैं था जैसलमेर में। फासला भी बहुत ज़्यादा नहीं। एक सुस्ताते शहर से दूसरे अलसाए में। इन की निद्राएं सदियों में टूटती थी।उन दिनों भी जागने को तैयार नहीं थे ये शहर।
उन्ही दिनों एक कहानी लिखने की कोशिश की थी। और आख़िर कुछ पन्नों में उसे समेट कर पहले हंस पत्रिका को भिजवाया।वापसी का लिफाफा इतना जल्द वापस आया कि लगा जैसे डाक विभाग ने ही अपने स्तर पर उस कहानी को खारिज कर दिया था। हार नहीं मान कर, उस कहानी को फ़िर से छोट मोटे परिवर्तनों के साथ फ़िर लिखकर इस बार 'चर्चा' पत्रिका के लिए सम्पादक योगेन्द्र दवे को भेज दिया। कुछ दिन बाद डाक से एक पत्र आया जिसमे योगेन्द्र जी ने कहानी की तारीफ करते हुए इसे 'चर्चा' के अगले ही अंक में छापने की बात कही। मेरे लिए ये उत्सव मनाने का अवसर था। चर्चा पत्रिका उन दिनों जोधपुर से छपने वाली एक प्रतिष्टित पत्रिका थी जिसे योगेन्द्र दवे अपने नितांत निजी प्रयासों से अनियमित रूप से निकालते थे।
इस बात को छः महीने गुज़र गए। पत्रिका का अंक आ नहीं रहा था। एक दिन जोधपुर पहुँच ही गया और अपने भाई साहब जो जोधपुर में ही रहते थे को लेकर योगेन्द्र जी के घर दरवाजा खटखटाने लगा। योगेन्द्र जी से ये मेरी पहली मुलाक़ात थी।
एक दूसरे शहर से जोधपुर की इस कदीम, भूल भुलैयानुमा बसाहट में मिलने आए, इस छोरे से दिखने वाले युवक से योगेन्द्र जी जिस आत्मीयता से मिले उसका प्रभाव स्थाई था। योगेन्द्र जी का व्यक्तित्व सरल और सहज था। कोई भी उनसे दोस्ती कर सकता था। ख़ुद उनकी कई किताबे आ चुकी थी और बच्चो के लिए उनका अपना मौलिक- काम था। एक लेखक के तौर पर उनका अवदान महत्वपूर्ण गिना जा चुका था।
जब मैंने पत्रिका के प्रकाशन में देरी के विषय में पूछा तो उन्होंने उन्ही कुछ दिक्कतों के बारे में बताया जो लघुपत्रिका चलाने में आमतौर पर आती आई हैं। कुल मिलाकर पत्रिका अब सिर्फ़ योगेन्द्र दवे के एकल प्रयासों पर ही टिकी थी।
खैर, पत्रिका का वो अंक असंख्य पन्नों के रूप में उनके घर में ही पड़ा था जिसे बाईंड होना था।
मैं वहाँ से लौटा तो फ़िर से उत्साहित था। हालांकि अंक अंततः मेरे हाथ में कोई महीने दो महीने बाद ही आ पाया था।
सन २००१ में मैं जोधपुर आ गया था और अभी तक यहीं टिका हुआ हूँ। इस बीच चर्चा पत्रिका बंद हो चुकी थी। एक लेखक के रूप में अभी भी मेरे पास चर्चा में छपी कहानी ही एक बड़ी पूँजी है। ब्लॉग में लिखने से इस पूँजी का विस्तार हुआ है ऐसा भी मानता हूँ। जोधपुर आने के इन आठ सालों में मैं योगेन्द्र जी से कभी नहीं मिला। उनके बारे में भी सुना था कि आजकल वे लिखते नहीं। रेडियो में, जहाँ मैं काम करता हूँ वहाँ भी इन सालों वे कभी आए नही अन्यथा यहाँ उनके पहले के लिखे कई नाटक आज भी टेप्स में सुरक्षित है। कई बार उनसे मिलने के बारे में सोचा पर आख़िर अनिच्छा हावी हो जाती। एक ही शहर में रहते हुए न मिलना शायद आज उतना आर्श्चय न लगे पर इसे दोष मेरा ही माना जाएगा। उनका पता उनके नाम के अलावा सिर्फ़ दो शब्दों का था। फ़ोन भी किया जा सकता था। शहर अभी भी बहुत बड़ा हुआ नही था। फ़िर भी.....
पर एक दिन, इन्हीं दिनों
हंस पत्रिका के जुलाई अंक में उनकी लघुकथा देखी तो महसूस हुआ कि समय चाहे जितना च्युंग गम की तरह खिंच जाय इसकी आरंभिक मिठास होठों पर बनी रहती है। मुझे लगा मैं आज भी योगेन्द्र जी से उतनी ही सहजता से मिल सकता हूँ।पर अभी भी शायद, मिलने की उम्मीद से ज्यादा, ये खुशी उन्हें एक लेखक के रूप में वापस देखने की थी।
पहला कमेंट सुन्दर टेम्पलेट के लिये.. बहुत अच्छा..
ReplyDeleteबाकी पढ़ कर आता हूँ..
कहां रहते है योगेन्द्र जी.. इस रविवार या अगले रविवार मिल ही को.. कितना बड़ा है जोधपुर २० मिनिट जाने का २० मिनिट आने का.. बाकि घण्टे आपकी मुलाकात के..
ReplyDeleteएक बात और छ्प का मजा अलग ही होता है.. आज भी कतरने संभाल कर रखी है मैने भी जो १०-१२ साल पहले छपी थी...
ऐसा लगता है राजीस्थान की मिटटी में कई अच्छे ओर साहित्य से जुड़े लोगो को पैदा करने का ख़ास हुनर है ....आपका संस्मरण अच्छा लगा ...आखिरी की कुछ पंक्तिया तो संजो कर रखने जैसी है .ओर हाँ
ReplyDeleteटेम्पलेट धाँसू है.......एक दम...... ये वाला हरा रंग आँखों को सूदिंग सी देता है...
आपकी नयी पोस्ट की प्रतीक्षा में थे कि सुखद आर्श्चय हुआ. रेगिस्तान में बरसात की तरह आये हैं. आपका संस्मरण बहुत अच्छा लगा ऐसे ही लिखते रहिये कुछ और संस्मरण आपकी प्रभावी भाषा में पढ़ने को मिलेंगे इसी आशा में आपको सुन्दर लेखन की शुभकामनाएं !
ReplyDeleteअच्छा संस्मरण!
ReplyDeleteटेम्पलेट पसंद आया.
आपका संस्मरण अच्छा लगा....
ReplyDeleteमेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
यह न मिल पाने वाली बात हमारी समझ में नहीं आयी, भाई.
ReplyDelete[हम तो मिलते भी और यदि उनकी इच्छा होती तो चर्चा को पुनरुज्जीवित करने में भागीदार भी बनते.]
@रंजन
ReplyDeleteटेम्पलेट के लिए शुक्रिया. पोस्ट लिखने के एक दिन पहले योगेन्द्र जी से मिल लिया हूँ. वही आत्मीयता.
@ डाक्साब
शब्द आपके यहाँ कितने सहज रहते है ये मैं क्या बताऊँ.शुक्रिया.
@ अनुराग शर्मा
अनुराग जी मेरे और योगेन्द्र जी में उम्र का एक बड़ा फासला है और उनसे चर्चा के माध्यम से जो कड़ी जुड़ती थी वो दुर्भाग्य से पत्रिका बंद हो जाने से टूट सी गयी थी. एक लेखक के रूप में भी वे लम्बे समय से शीत निद्रा में थे.फिर रचनात्मक लेखन में ऊब की एक बड़ी समस्या मेरे साथ रही है.
शुक्रिया दोस्तों ये कडिया हमेशा मेरे लिए हरी भरी रहे यही दुआ करता हूँ.
पोस्ट मुझे अपने आप से कहीं दूर ले जाती है सोचता हूँ कि छलाँग भर का ये फासला कितना है ? तीन सौ किलोमीटर से कम या फिर तीस किलोमीटर से ज्यादा. योगेन्द्र दवे जी की साहित्यिक प्रतिबद्धता के बारे में कौन नहीं जानता, आपकी कहानी को प्रकाशित करने के पीछे उनके कोई निजी स्वार्थ नहीं रहे होंगे ये निसंदेह रचना और प्रतिभा को सम्मान था, मेरी अल्प जानकारी के अनुसार दवे जी एक ऐसे विभाग से जुड़े रहे जो कि किसी भी दृष्टि से साहित्य का पोषक नहीं था फिर आप जब उनकी वापसी देखते हैं तो मुझे भी आर्श्चय होता है कि कैसे कोई बचा लेता है अपने आप को ? चर्चा को सम्मान की दृष्टि से देखना मजबूरी थी क्योंकि वो रोशनी दवे साहब के खून की थी.
ReplyDeleteकिताबों की दुकानों और सूचना केंद्र में साहित्य की फूंकें ठोकने वाले जोधपुर के रेलवे स्टेशन के बाहर कुलियों की तहर खड़े रहते थे कि कब दिल्ली मुम्बई से कोई ऐसा लेखक आये जो प्रकाशक भी तो उसका सामान उठाया जा सके उनके लिए सिगरेट के पैकेट्स का बंदोबस्त अपने अपने हाथ से किया जाये.
उस एक दशक में प्रख्यात आलोचक, कथाकार, और कवि जोधपुर के आतिथ्य से गदगद थे तो दवे जी जैसों के अतिरिक्त कथित बड़े जो शेष साहित्यकार हैं यानि वे जो हंस और धर्मयुग के काल में छप कर सम्मानित हो चुके हैं उनका जोधपुर के आतिथ्य भाव को बड़ा करने में महत्वपूर्ण योगदान हैं. दवे जी का योगदान विशुद्ध साहित्य सेवा मात्र है.
मैं दवे जी से कभी नहीं मिला हाँ जिन दिनों अखबार में काम करता था तब जोधपुर के साहित्य अखाड़े की कुछ खबरें टटोल लेता था मेरी इस रूचि ने ही मुझे कभी कोई ख़ुशी नहीं दी, ब्रह्मपुरी में एक और कथाकार रहते हैं कभी उनको भी टटोलिये, मन में कई लहरें उठेंगी. आनंद आएगा और मेरे जैसे पाठकों की मौज भी हो जायेगी.
संस्मरण की खूबी है एक नेक इंसान... अभी जोधपुर में और भी हैं इसलिए छलांगे मारने का साहस जुटाते रहिये. आपको और योगेन्द्र जी को नमस्ते.
संस्मरण अच्छा लगा.
ReplyDeleteसंस्मरण अच्छा लगा.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर जी। मुझे तो वह दिन याद आ गया जब हिन्दुस्तान टाइम्स में मेरा सम्पादक के नाम पत्र छपा था। मैं सत्रह साल का रहा हूंगा!
ReplyDeleteपर प्रिण्ट माध्यम का ग्लैमर ज्यादा चला नहीं मुझ पर।
रेलगाड़ी हांकने में सब झुरा गया! :)
खूबसूरत संस्मरण आपने तो मुझे मेरे घर की याद दिला दी...राजस्थान के कोने कोने में माँ सरस्वती की असीम कृपा है और अपने दम पर साहित्यिक पत्र पत्रिकाए निकालने का जोखिम उठाते वाले साहसी लोग भी. आभार!
ReplyDeleteहौसला अफजाई करने के लिये धन्यवाद
ReplyDeleteशानदार पोस्ट
योगेन्द्र दवे जी के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी पर आपसे जान कर अच्छा लगा.आपका संस्मरण पढ़ कर खो सा गया.योगेन्द्र जी की एक ऐसी तस्वीर मस्तिष्क में उमड़ने लगी मानों एक अकेला व्यक्ति कोई मशाल जलाए अंधेरों में बढ़ा चला जा रहा है. मन ही मन उनके और उनके कार्य के प्रति गहरे सम्मान का भाव उपजा.और आपसे शिकायत भी हुई...वजह चाहे कोई रही हो आप जैसे लोग तो कम से कम उनके आस पास रहते!
ReplyDeleteहालांकि आपने संस्मरण में जिस तरह से उनके बारे में लिखा है उससे यह उलाहना थोडा नर्म पड़ जाता है.
पूरा लेख बहुत रोचक शैली में लिखा है.वह तो आपकी खासियत है!
आपका नया टेम्पलेट बहुत सुन्दर है.आपने अभी भी मुझे नहीं बताया कि इतना सुन्दर टेम्लेट कहाँ से मारा है..?
बधाई ..!
Sanjay ji, read your post and also the comments very carefully.
ReplyDeleteI remember the only time my writing was published in Women's era, it was a joyful moment. I must have been 17.
All these days, my creative part was buried and I became too busy as a wife and a mother.Now my blog has again brought out the hidden part.
Sometimes the distance which may be only a stone's throw away, can never be bridged...whether the distance is physical or emotional. I loved your post and the title.
A great tribute to Yogendraji.
bus ye chalaang lagaane ke liye kayee bar sadee guzar jaati hai. kabhi samay gujarta hai to kahee samay thahar jata hai.
ReplyDeleteaapki lekhnee main ek swabhwik nasha hai.
toh aap is nayee template main vidhanik chetaawni laga sakte hin ki
"Nasha Swasthya ke liye laabhprad hai" :)
apka sansmaran acha laga.....achi tarah apne apni yadon ko samet rakha hai..
ReplyDeleteसंस्मरण बहुत अच्छा है . कुछ याद दिलाता सा !!
ReplyDeleteआपको योगेन्द्र दवे मिले खुशनसीबी आपकी ! सबको कहाँ मिलते है कोई योगेन्द्र दवे !!
आपकी पुनः मुलाकात न कर सकने कि कसक ने ही सही हमें माननीय योगेन्द्र दवे जी से संक्षिप्त रूप से परिचित तो करवा ही दिया.
ReplyDeleteउम्मीद है आप विस्तार से इस कर्मठ और जुझारू व्यक्ति से जरूर परिचित करायेंगें.
उम्मीद के सहारे...................