Tuesday, July 8, 2014

सड़क और बिजली के खम्भे

चौराहे से चौराहे तक सीधी सड़क थी.सड़क के बीच डिवाइडर पर बिजली के खम्भे थे जिनसे सड़क के दोनों ओर रात को रौशनी गिरती थी.ये खम्भे उन्नीसवीं सदी के किसी यूरोपीय शहर में लगे लैंप पोस्ट का लुक देते थे.खम्भों का लोहा ऐसी पॉलिश किये हुए था जिससे लगता था वो कुछेक सदियों से ठीक इसी सड़क पर हज़ार बारिशों में नहा चुके थे.पर ये सब दिखावटी था.सड़क की पूरी लम्बाई में खम्भे कुछ महीनों पहले ही लगाये गए थे.नगर के चुने हुए प्रतिनिधियों की संस्था का मानना था कि ये इस ऐतिहासिक शहर को हेरिटेज लुक देते हैं जबकि कुछ और लोग इसे प्रतिनिधी संस्था के सदस्यों के घर चूरमे का इंतजाम भर मानते थे. जो भी हो,ये कहा जा सकता है कि इस तरह की व्यवस्थाओं से शहर की सुन्दरता बढ़ती है. बाहर से आए किसी नए आदमी को तो ये सब और भी सुन्दर लगता है. ख़ासकर तब जब ट्रैफिक सड़क के साथ चौराहे तक एक आरामदायक प्रवाह में चल रहा हो.गाड़ियों की आती और जाती धाराएं कोलतार पर जैसे फिसल रहीं हों.

पर इस सड़क के साथ ऐसा नहीं था.यहाँ ट्रैफिक का प्रवाह सहज नहीं था.बल्कि वो,कह सकते हैं, कई जगहों से अराजक था.वो जगह जगह पर पानी में चूने की तरह फूटता था.खदबदाता था.

लोग इस सड़क को कई जगहों से लम्बवत काटते थे.वे सड़क को आड़ा,तिरछा, समकोण,न्यून कोण, हर कोण से काटते थे.वे सड़क के एक किनारे से दूसरे किनारे तक,डिवाइडर पर चढ़ते हुए,पहुँच जाते थे.बीच का डिवाइडर बिना रेलिंग लगे था और उसे आसानी से लांघा जा सकता था.लोग इसका फायदा उठाते थे और बेखौफ सड़क के दोनों अर्द्ध पार कर जाते थे. और ऐसा करते हुए वे तेज़ गति से आती गाड़ियों के टायरों को चीखते और लगभग रुकते,धीमा पड़ते देखते.गाड़ियों की गति में इस असहज क्रम-भंग के बावजूद सड़क पर झगड़ा-वगड़ा कम ही होता.किसी पैदल को चोट वगैरा भी कम ही लगती.कभी लगती भी तो सब कुछ इतनी जल्दी और इतनी आसानी से सीन पर से पौंछ दिया जाता कि सड़क की,बल्कि किसी की भी स्मृति में ये सब दर्ज़ ही नहीं होता था.पर किसी तमाशे के अभाव के बावजूद लोगों के सड़क के विरुद्ध चलने से सड़क की सुन्दरता बाधित होती थी.सड़क पर इस तरह की अराजकता उसके राजसी वैभव को ठेस पहुंचाती थी.असल में सड़क का भरपूर हुस्न देखना हो तो रात बारह से सुबह छः बजे के बीच ही इसके चौराहे से देखना चाहिए.उसी एक अवधि में सड़क रौशनी के खुमार में डूबी किसी सुंदरी सी लगती थी.

दिन में सड़क पर लगभग उस हाट मेले का माहौल रहता जिसमें ज़्यादातर  अफरातफरी मची रहती हो.ये पता करना मुश्किल था कि सड़क से आड़े तिरछे गुज़रते लोगों में से कितने लोगों के लिए इस सड़क पर चलना रोज़ का क्रम था.कोई बेहद चतुर जासूस जो महीनों इस सड़क को घंटों देखता रहे वही नोट करेगा कि एक आदमी रोज़ दिन में कई कई बार इस सड़क को डिवाइडर लांघकर पार करता है. वो आदमी स्टेशनरी की दूकान पर काम करता है और दुकान के सामने सड़क के उस पार एलआईसी शाखा के पास के खाली प्लाट के कोने में वो कई बार लघुशंका निवारण के जाता है.दुकान से जाते समय उसकी चाल में सुस्ती रहती है और आराम से चलते चलते ही वो कान पर जनेऊ खींच कर लपेट देता है.वापस आते समय वो आदमी थोड़ा अधिक सतर्क है.दुकान पर नए ग्राहक आ गए हैं.
इसी लाइन में पोस्ट ऑफिस के डब्बे से लगी चाय की थडी पर एक लड़का कप प्लेट धोता है.उसे सड़क के ट्रैफिक से मतलब नहीं हैं.वो टीवी पर आने के सपने देखता है.पास में ही वैष्णव ढाबा है.इसकी चिमनी से निकलता धुआं आसमान में कालिख जमा करता है.अगले चौराहे से कुछ पहले सरकारी हस्पताल है.इस वजह से इधर की  पूरी सड़क पर मरीजों और उनके परिजनों के आने जाने का दृश्य ही स्थाई रहता है.हस्पताल के बाहर दवाइयों की दुकानें हैं और उनसे लगते फ्रूट के ठेले.फ्रूट के ठेलों पर ज़्यादातर मुसम्मियों के ढेर लगे हैं.

सड़क दिन भर इन्हीं सब में खोयी रहती.उसके डिवाइडर पर लगे बिजली के खम्भे उनके दोनों ओर सड़क का पता बताने की कोशिश करते.

8 comments:

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  2. शहर एक से गाँव एक से.....

    पता नहीं क्यों ये गीत याद आया..... मनमोहक शब्दचित्र।

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  3. ब्लॉग बुलेटिन आज की बुलेटिन, रेल बजट की कुछ खास बातें - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. बहुत कुछ देखती बुझती है सड़क..

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  5. सड़क की चाल-चरित्र पर पैनी नजर।

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  6. इन उम्र से लम्बी सड़कों को, मन्ज़िल पे पहुँचते देखा नहीं
    बस दौड़ती फिरती रहती हैं, हम ने तो ठहरते देखा नहीं!!
    ऐसे में इन सड़कों को रुककर देखना, उनकी ख़ामोश ज़ुबान सुनना, उनके किस्से बयान करना, उन्हें अपनी बात का मौजू बनाना... सब का सब पहली लाइन से आख़िरी लाइन तक मेस्मेराइज़ करता है!
    संजय जी बधाई! रात को अपनी बालकनी से जब टाँगें पसारे हुये सड़कों को देखूँगा तो इसे ज़रूर याद करूँगा!

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